मंगलवार, 3 मार्च 2026

 गोंगपा में ’विद्रोह’ की आहट, क्या बिखर जाएगा दादा हीरा सिंह मरकाम का सपना?

प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तेकाम को हटाने के लिए नेतृत्व को 9 मार्च तक का अल्टीमेटम, 22 मार्च को सामूहिक इस्तीफे की चेतावनी

राजेन्द्र पाराशर

भोपाल। मध्यप्रदेश में आदिवासियों की अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) एक बार फिर गहरे राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ी है। पार्टी के भीतर असंतोष की आग इस कदर भड़क चुकी है कि महाकौशल क्षेत्र के दिग्गज नेताओं ने वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तेकाम के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया है।

बीते 2 मार्च को सिवनी जिले की छपारा तहसील स्थित बंजारी हॉल में एक महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। 6 घंटे तक चली इस मैराथन बैठक में सिवनी, छिंदवाड़ा, बैतूल, बालाघाट और मंडला सहित कई जिलों के वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हुए। बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तेकाम की कार्यप्रणाली पर ’अविश्वास’ जताया गया। पदाधिकारियों का सीधा आरोप है कि तेकाम पार्टी संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं। बिना जिला और ब्लॉक इकाइयों की सहमति के नियुक्तियां करना और विरोध करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को निष्कासन की धमकी देना उनके ’तानाशाही’ रवैये को दर्शाता है।

मांगें नहीं मानी तो होगा सामूहिक इस्तीफा

विद्रोही गुट ने राष्ट्रीय अध्यक्ष विधायक तुलेश्वर मरकाम और राष्ट्रीय महासचिव श्याम सिंह मरकाम के सामने दो टूक मांगें रखी हैं। 9 मार्च 2026 तक कमलेश तेकाम को प्रदेश अध्यक्ष पद से तत्काल मुक्त किया जाए। छिंदवाड़ा या सिवनी के किसी अनुभवी नेता को सर्वसम्मति से नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया जाए। नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि 9 मार्च तक फैसला नहीं हुआ, तो 22 मार्च 2026 को सिवनी जिला मुख्यालय में एक विशाल सम्मेलन कर हजारों कार्यकर्ता सामूहिक इस्तीफा दे देंगे। इसके बाद पार्टी के संस्थापक दादा हीरा सिंह मरकाम के सपनों को पूरा करने के लिए एक नई राजनीतिक दिशा तय की जाएगी।

 2003 के शिखर से पतन की ओर

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का यह अंतर्कलह नया नहीं है, लेकिन इसने समर्थकों की चिंता बढ़ा दी है। गौर करने वाली बात है कि स्वर्ण काल साल 2003 के विधानसभा चुनाव में गोंगपा ने प्रदेश की राजनीति में तहलका मचा दिया था, जब उसके 3 विधायक निर्वाचित हुए थे। उस समय पार्टी राज्य में एक तीसरी शक्ति के रूप में उभरी थी। 2003 की उस बड़ी जीत के बाद से ही पार्टी लगातार आंतरिक गुटबाजी और बिखराव का शिकार रही है। समय-समय पर पार्टी कई धड़ों में विभाजित हुई, जिसका सीधा असर इसके जनाधार पर पड़ा। कभी सत्ता की चाबी अपने पास रखने का माद्दा रखने वाली पार्टी आज अपनों के ही विरोध के कारण अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही है। यदि पार्टी आलाकमान ने 9 मार्च तक इस विद्रोह को शांत नहीं किया, तो 22 मार्च का दिन गोंगपा के इतिहास में एक और बड़े विभाजन के रूप में दर्ज हो सकता है।