गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

पचमढ़ी ने देखा नाना का अभिनय, भोपाल ने उनकी ‘राजनीति’

तीन फिल्मों की शूटिंग ने मध्यप्रदेश को जोड़ा अभिनेता के यादगार सिनेमाई सफर से

राजेन्द्र पाराशर 

भोपाल। कुछ कलाकार सिर्फ पर्दे पर नहीं होते, वे उन जगहों की स्मृतियों में भी बस जाते हैं, जहां उन्होंने अपने किरदारों को जिया होता है। नाना पाटेकर भी ऐसे ही अभिनेता थे। उनकी आवाज, संवाद अदायगी और किरदार को भीतर तक पकड़ लेने वाली शैली हिंदी सिनेमा की पहचान बनी। 8 अक्टूबर को 75 वर्ष की उम्र में उनके निधन की खबर के साथ देशभर में उनकी फिल्मों की यादें ताजा हैं। मध्यप्रदेश के पास भी नाना को याद करने की अपनी कहानी है पचमढ़ी की वादियों से लेकर भोपाल के राजनीतिक मंच तक, तीन फिल्मों की शूटिंग ने उनके सिनेमाई सफर को इस प्रदेश से जोड़ा।

नाना पाटेकर का मध्यप्रदेश से शुरुआती फिल्मी जुड़ाव 1990 की ‘थोड़ा सा रूमानी हो जाएं’ से माना जाता है। अमोल पालेकर निर्देशित इस फिल्म में नाना पाटेकर, अनीता कंवर और विक्रम गोखले प्रमुख भूमिकाओं में थे। फिल्म की शूटिंग मध्यप्रदेश के पचमढ़ी में हुई थी।  फिल्म में नाना का किरदार नटवरलाल का था। यह उनके करियर के उस दौर की फिल्म थी, जब वे मुख्यधारा की चमक-दमक से अलग अपनी अभिनय क्षमता के कारण पहचान बना रहे थे। पचमढ़ी की प्राकृतिक पृष्ठभूमि में शूट हुई इस फिल्म ने नाना के मध्यप्रदेश कनेक्शन की पहली तस्वीर तैयार की।

‘तर्कीब’ में फिर लौटे पचमढ़ी, पहुंचे भोपाल

‘थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ’ की  शूटिंग के करीब एक दशक बाद नाना पाटेकर फिर मध्यप्रदेश आए। इस बार फिल्म थी ‘तर्कीब’। फिल्म में उन्होंने सीबीआई इंस्पेक्टर जसराज़ पटेल की भूमिका निभाई थी और उनके साथ तब्बू, शिल्पा शेट्टी, आदित्य पंचोली, मिलिंद सोमन जैसे कलाकार थे। इस फिल्म की शूटिंग का एक अहम हिस्सा ’भोपाल और पचमढ़ी’में हुआ। नाना का पचमढ़ी से बना रिश्ता एक फिल्म तक सीमित नहीं रहा। कुछ वर्षों के अंतराल के बाद नाना फिर उसी पहाड़ी शहर की लोकेशन पर लौटे और इस बार भोपाल भी उनकी शूटिंग यात्रा का हिस्सा बना।

भोपाल में ‘राजनीति’ और हजारों की भीड़

नाना पाटेकर की मध्यप्रदेश से जुड़ी सबसे चर्चित फिल्म रही प्रकाश झा की ‘राजनीति’। 2009 में भोपाल में फिल्म की शूटिंग के दौरान नाना पाटेकर के साथ अजय देवगन, रणबीर कपूर, नसीरुद्दीन शाह, अर्जुन रामपाल, मनोज बाजपेयी, कैटरीना कैफ और विवेक ओबेरॉय जैसे कलाकार शहर में मौजूद थे। अपर लेक के किनारे भी फिल्म की शूटिंग हुई थी। ‘राजनीति’ की शूटिंग के दौरान भोपाल सचमुच फिल्मी शहर बन गया था। फिल्म के राजनीतिक दृश्यों के लिए मध्यप्रदेश के अलग-अलग शहरों से करीब पांच हजार रंगमंच कलाकारों को जुटाया गया था। जबरदस्त भीड़ के बीच राजनीतिक रैलियों के दृश्य फिल्माए गए और नाना पाटेकर समेत फिल्म के प्रमुख कलाकार इन दृश्यों का हिस्सा बने। 

तीन फिल्में, दो शहर और नाना की याद

नाना पाटेकर के मध्यप्रदेश से जुड़े इस फिल्मी सफर को देखें तो तीन अलग-अलग तस्वीरें सामने आती हैं 1990 में पचमढ़ी, 1999 में भोपाल-पचमढ़ी और 2009 में भोपाल। एक फिल्म में पचमढ़ी की वादियां थीं, दूसरी में अपराध की कहानी के बीच भोपाल और पचमढ़ी की लोकेशन और तीसरी में भोपाल की सियासी जमीन। किरदार बदलते रहे, कहानियां बदलती रहीं, लेकिन मध्यप्रदेश उनके अभिनय सफर की पृष्ठभूमि बनता रहा। इसके अलावा नाना की मालवा अंचल और ग्वालियर चंबल अंचल में कुछ फिल्मों की शूूटिंग हुई है। 


बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

समग्र विकास से सिद्धी

-अखिलेश जैन, सीए
मोदी जी के 25 वर्षों के शासनकाल की भारत
की यात्रा वास्तव में समग्र विकास से 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए प्रयासों की यात्रा है। 

अपरिवर्तनशील वास्तविकता है कि सूर्य पूर्व में ही उगता है उसी तरह शाश्वत सत्य है कि मोदी जी के नेतृत्व में भारत निराशा, भाई भतीजावाद, जातिवाद, परिवारवाद, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कालेधन, जमाखोरी, आयात पर निर्भरता, तुष्टीकरण, संस्कृति का अपमान, गुलामी के प्रतीकों जैसी तमाम बेड़ियों को तोड़कर सुन्दर, सुखद, भविष्य के निर्माण हेतु रात-दिन एक करके, बिना रुके-बिना थके, बिना दाँये-बिना बाँये देखे कठिन से कठिन अग्नि परीक्षा जैसी चुनौतियों को पार करके भविष्य निर्माण में जुटा हुआ है। आज भारत का लक्ष्य, ध्येय, सपना, नारा, वचन तथा एक ही दशरथ नन्दन प्रभु श्री रामचन्द्र जी के श्री चरणों में प्रार्थना है- ''विकसित भारत@2047"।

 ''विकसित भारत@2047" लक्ष्य की गहराई को जानने वाले ही, लक्ष्य की गंभीरता को जान सकते हैं। नारा आसान है, लक्ष्य गंभीर है, ''विकसित भारत@2047" के लक्ष्य सिद्धी के लिए उससे भी बड़ा तप करना पड़ेगा जितना तप महाराज भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर उतारने के लिए किया था। महाराज भगीरथ के कठोर तप से प्रसन्न होकर ब्रम्हा जी ने गंगा को पृथ्वी पर उतरने का वरदान दिया था, महाराज भगीरथ का तप तो केवल एक सिद्धी गंगा को पृथ्वी पर उतारने के लिए था पर मोदी जी के नेतृत्व में भारत का तप तो ''विकसित भारत@2047" के लिए है, इस सिद्धि को पाने के पहले तमाम सिद्धियां पार करना पड़ेंगी, तमाम बाधाओं को पार पाना पड़ेगा जो मुख्य सिद्धि के मार्ग में बाधा हैं, बाधाओं को दूर करने के साथ-साथ बाधाओं को दूर करने की गति को भी गति देना पड़ेगी।

मोदी जी के नेतृत्व में भारत तेजी से आगे बढ़ चुका है,12वीं अर्थव्यवस्था से विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था के कदम बढ़ा रहा है। महिलाएं नीति निर्णय में भागीदार बन रही हैं, अर्थव्यवस्था की मजबूती व स्थायित्व में महिलाओं का योगदान लाने में भारत सफल हो रहा है, 2014 से भ्रष्टाचार की खबरों को मसाला न मिलने के कारण जनता में उत्साह का संचार करने में सरकार को बहुत बड़ी सफलता मिली है, इसके सकारात्मक परिणाम बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में हैं, देश की सीमाएँ सुरक्षित हैं, परिन्दा भी पर नहीं मार पाता क्योंकि सरकार व सेना की कार्यवाहियों का लेखा जोखा नेत्रहीन भी तुरन्त पढ़ लेता है। सरकार का आतंकवाद विरोधी निर्णय देश में स्थिरता, शांति व प्रगति लाने में सहायक हुआ है।

आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, वैकल्पिक ऊर्जा संसाधनों की खोज व विकास, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, सनातन संस्कृति की रक्षा व संरक्षण, शिक्षण, प्रशिक्षण व रोजगार की संभावनाएं, करों का सरलीकरण, हर व्यक्ति का बैंक में खाता, गरीब को चिकित्सा सुविधा, आवास, पेयजल, स्वच्छता, स्वच्छ ईंधन, शौचालय, दिल्ली से चली राशि बिना किसी कट के सीधे हितग्राहियों के खाते में बराबर व तुरन्त पहुंचना, 40 देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों ने आर्थिक प्रगति में जो योगदान दिया है उसी कारण विदेशी निवेश भारत के दरवाजे पर लाईन लगा कर खड़ा है, जीडीपी, जीएसटी व आयकर शिखर पर, 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर, अगर सफलता की गति बरकरार रहती है तो 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था व '' विकसित भारत @ 2047" की सिद्धी पाने में भारत शीघ्र सफलता पाएगा।

(लेखक भाजपा मप्र के कोषाध्यक्ष हैं)

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

वनाधिकार पट्टों का अटका सफर, 2.73 लाख आदिवासियों के हक फाइलों में बंद

केन्द्र की रिपोर्ट में हुआ खुलासा, 2.44 लाख आवेदन निरस्त

भोपाल। अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम (एफआरए), 2006 के तहत वनाधिकार पट्टे हासिल करने की जंग लड़ रहे आदिवासियों के हक अब भी प्रशासनिक फाइलों में दबे पड़े हैं। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय राज्यसभा में दी प्रगति रिपोर्ट ने राज्य में वनाधिकारों के निपटारे की धीमी रफ्तार पर मुहर लगा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, लंबित दावों के मामले में मध्यप्रदेश पूरे देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है, जहां 2.73 लाख से अधिक आदिवासियों व पारंपरिक वन निवासियों के दावे अटके हुए हैं।

ज्नजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा दी जानकारी के अनुसार 30 जून 2026 तक की स्थिति के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो प्रदेश में वन अधिकारों की जमीनी हकीकत सामने आती है। प्रदेष में कुल प्राप्त दावों की संख्या व्यक्तिगत स्तर पर 7,66,430 और सामुदायिक स्तर पर 40,975 थी। इस तरह कुल दावों की संख्या 8,07,405 थी। इसमें से  2,44,487 आवेदनों को नियमों और दस्तावेजों की कमी या अन्य प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर अस्वीकृत कर दिया गया। वर्तमान में 2,73,457 दावे विभागों और समितियों के चक्कर काट रहे हैं और प्रक्रियाधीन हैं। प्रदेश में अब तक केवल 2,89,461 पट्टे (2,60,707 व्यक्तिगत और 28,754 सामुदायिक) ही बांटे जा सके हैं।

लाखों दावों का खारिज होना और पौने तीन लाख से अधिक मामलों का अधर में लटके रहना यह दर्शाता है कि वन ग्रामों में रहने वाले परिवारों को उनका विधिक अधिकार दिलाने के लिए मैदानी स्तर पर त्वरित और संवेदनशील निपटारे की सख्त दरकार है।

देश में तेलंगाना के बाद प्रदेश सबसे ऊपर

वनाधिकार कानून को लागू करने और इसकी निगरानी की मुख्य जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, जबकि केंद्रीय मंत्रालय राज्यों से मिलने वाली रिपोर्ट को संकलित करता है। आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में वर्तमान में 10,45,970 दावे लंबित हैं और 18,13,232 आवेदन निरस्त किए जा चुके हैं। देशभर में सर्वाधिक 3,29,367 लंबित दावों के साथ तेलंगाना पहले स्थान पर है, जबकि 2,73,457 लंबित मामलों के साथ मध्यप्रदेश देश में दूसरे नंबर पर बना हुआ है।


मंगलवार, 16 जून 2026

कांग्रेस प्रभारियों की परंपरा रही समाधान कम, विवाद ज्यादा

गुटीय संघर्ष, असंतोष और आरोपों के बीच हुआ कार्यकालों का अंत


भोपाल। प्रदेश कांग्रेस में संगठन को धार देने और अंदरूनी कलह को शांत करने के इरादे से दिल्ली से भेजे जाने वाले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रभारी खुद विवादों के भंवर में फंसते रहे हैं। सूबे के कद्दावर क्षत्रपों के साथ तालमेल बिठाने में नाकाम रहे ये नेता कई बार खुद ही नई गुटबाजी की वजह बन गए। इसके बाद प्रदेष से उनकी विदाई भी होती रही है।
प्रदेश कांग्रेस की राजनीति का मिजाज ऐसा है कि यहां दिल्ली का रौब नहीं, बल्कि स्थानीय क्षत्रपों के साथ सामंजस्य काम आता है। जब-जब प्रभारियों ने अपनी मर्जी थोपने या दिग्गजों को बाईपास करने की कोशिश की, संगठन मजबूत होने के बजाय खुद प्रभारी ही विवादों की भेंट चढ़ गए। वर्तमान प्रभारी हरीश चौधरी से लेकर बी.के. हरिप्रसाद तक, इतिहास गवाह है कि जिसने भी यहां के सियासी दिग्गजों से सीधे टकराने या उन्हें नजरअंदाज करने की कोशिश की, उसे अपमानजनक कड़वे अनुभवों के साथ विदा होना पड़ा। हाल ही में राज्यसभा चुनाव की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होना वर्तमान प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी के लिए संकट खड़ा करता नजर आ रहा है।
नए-पुराने नेताओं के बीच नहीं बन सके सेतु
वर्तमान प्रभारी हरीश चौधरी को सूबे में नए और पुराने नेताओं के बीच सेतु बनने की जिम्मेदारी मिली थी, लेकिन राज्यसभा चुनाव ने उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। चुनाव के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन तकनीकी खामियों के चलते रद्द हो गया। इस सियासी संकट पर जब पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भोपाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे, तब हरीश चौधरी ने उन्हें बीच में ही टोकते हुए रूखे लहजे में कहा हम संभाल लेंगे। भरे मीडिया के सामने इस बर्ताव से आहत दिग्विजय सिंह ने हाथ जोड़ लिए और आगे कुछ भी बोलने से मना कर दिया। सरेआम टोकने की इस सियासत का वीडियो वायरल होते ही प्रभारी और सीनियर लीडरशिप का मनमुटाव एक बार फिर सड़क पर आ गया है।
टिकट वितरण की आग और अधिकारों की जंग
साल 2023 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जेपी अग्रवाल को हटाकर अचानक रणदीप सिंह सुरजेवाला को कमान सौंपी गई थी। सुरजेवाला का पूरा कार्यकाल टिकट वितरण में मचे घमासान और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के साथ अधिकार क्षेत्र की लड़ाई में बीता। टिकट कटने से नाराज कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ कमलनाथ और दिग्विजय के बंगलों बल्कि सुरजेवाला के सामने भी प्रदर्शन किया। चुनाव में कांग्रेस की करारी हार का ठीकरा केंद्रीय रणनीति और प्रभारी की कार्यप्रणाली पर फूटा, जिसके बाद आलाकमान को उन्हें हटाना पड़ा।
गुटबाजी के आगे मूकदर्शक बने रहे दिल्ली के नुमाइंदे
सुरजेवाला से पहले जेपी अग्रवाल प्रभारी थे। उनके कार्यकाल में संगठन के भीतर समन्वय का घोर अभाव दिखा। अग्रवाल पर आरोप लगे कि वे कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे बड़े क्षत्रपों के फैसलों के आगे महज मूकदर्शक बने रहे। वे जमीनी कार्यकर्ताओं और जिला प्रभारियों की शिकायतों को आलाकमान तक सही ढंग से पहुंचा ही नहीं पाए। संगठन में निष्क्रियता और गुटबाजी न रोक पाने के कारण चुनाव से ऐन पहले उन्हें पद से मुक्त कर दिया गया।
असंतोष की आग को भांपने में रहे नाकाम, गंवा दी सरकार
मुकुल वासनिक का कार्यकाल प्रदेश कांग्रेस के इतिहास के सबसे बड़े सियासी भूकंप का गवाह बना। उनके समय ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ-दिग्विजय गुट के बीच टकराव चरम पर था। सिंधिया समर्थकों का सीधा आरोप था कि प्रभारी रहते हुए वासनिक ने उनके गुट की उपेक्षा की और कमलनाथ सरकार के समय उपजे असंतोष को समय रहते हल नहीं किया। इसी अनदेखी का नतीजा 2020 में कांग्रेस सरकार गिरने के रूप में सामने आया।
चहेतों को उपकृत करने के आरोप
मोहन प्रकाश का कार्यकाल सबसे लंबा और ज्यादा गुटीय खींचतान वाला रहा। दिग्विजय, कमलनाथ और सिंधिया के बीच की अंदरूनी कलह को रोकने में वे नाकाम रहे। उन पर दिल्ली के समीकरणों के तहत चुनिंदा गुटों को शह देने के आरोप लगे। चुनावों में जमीनी नेताओं को नजरअंदाज कर पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट देने के कारण उनके खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। तत्कालीन अध्यक्ष अरुण यादव से भी उनकी पटरी नहीं बैठी। आखिरकार, लगातार हो रहे विरोध के चलते  उन्हें हटाया गया।
कद्दावर नेताओं से पटरी न बैठने और बयानों ने बिगाड़ा खेल
गुजरात से आए दीपक बावरिया को राहुल गांधी का करीबी माना जाता था। 2018 के चुनाव से पहले आए बावरिया की कमलनाथ और सिंधिया से कभी पटरी नहीं बैठी। जब सूबे में कांग्रेस सरकार बनी, तब भी वे विवाद नहीं संभाल पाए। सिंधिया ने जब द्वारा अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने की चेतावनी दी और कमलनाथ ने तो उतर जाएं कहा, तब बावरिया इस तनाव को संभालने में पूरी तरह विफल रहे। इस खींचतान के बाद कद्दावर नेताओं की नाराजगी के कारण उन्हें हटा दिया गया।

शुक्रवार, 5 जून 2026

कांग्रेस में दिग्गज युग के अंत की शुरुआत !

संगठन के प्रति समर्पण तय करेगा नेताओं का सियासी कद  


भोपाल। प्रदेश कांग्रेस में दशकों से चली आ रही सल्तनत वाली सियासत और क्षत्रपों के एकाधिकार पर आखिरकार दिल्ली दरबार ने आखिरी कील ठोक दी है। दिग्विजय सिंह की खाली हो रही राज्यसभा सीट पर पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन की ताजपोशी महज एक चुनावी फैसला नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश कांग्रेस में दिग्गज युग के अंत का खुला ऐलान है। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि अब पार्टी में रसूख की नहीं, बल्कि खामोश निष्ठा की कद्र होगी।

प्रदेश  कांग्रेस का इतिहास गवाह है कि यहां टिकट से लेकर सांगठनिक नियुक्तियों तक, सब कुछ बड़े नेताओं के कोटे से तय होता था। इस बार भी दिग्विजय सिंह की सीट खाली होते ही पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, अरुण यादव केे खेमे अपने-अपने गोटियां बैठा रहे थे। दिल्ली में डेरे डाले गए, रसूख का वास्ता दिया गया और अंदरूनी तौर पर दबाव की राजनीति का पुराना नुस्खा आजमाया गया, लेकिन, राहुल गांधी की नई रणनीति ने इस पूरे गुटीय चक्रव्यूह को एक झटके में ध्वस्त कर दिया। मठाधीश देखते रह गए और बिना किसी तामझाम के, जमीन पर काम करने वाली मीनाक्षी नटराजन बाजी मार ले गईं।

बंद कमरे की राजनीति के दिन लदे, अब काम ही कसौटी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला उन नेताओं के चेहरे पर करारा तमाचा है जो जनता और कार्यकर्ताओं से कटकर सिर्फ बंद कमरों में रणनीति बनाते हैं। मीनाक्षी नटराजन का चयन यह संदेश देता है कि अब दिल्ली दरबार के चक्कर काटने से कोई नेता बड़ा नहीं बनेगा। भारत जोड़ो यात्रा से लेकर वैचारिक अभियानों तक, जिन्होंने बिना किसी शोर-शराबे और मीडिया चमकाने के संगठन का झंडा उठाए रखा, नेतृत्व अब केवल उन्हीं पर दांव खेलेगा।

बदलाव का कड़ा संदेश

मध्यप्रदेश  कांग्रेस में अब कोटा सिस्टम और नेताओं की जी-हुज़ूरी का दौर खत्म हो चुका है। अब नेता की पहचान उसके गुट से नहीं, बल्कि राहुल गांधी की कसौटी पर उसकी सांगठनिक वफादारी से होगी। इस अप्रत्याशित फैसले ने मप्र कांग्रेस की पूरी आंतरिक कुंडली बदल दी है। दिग्गजों को दरकिनार कर हाईकमान ने साफ कर दिया है कि 2028 के विधानसभा चुनाव की बिसात नए चेहरों और नई ऊर्जा के साथ बिछाई जाएगी। पुराने चेहरे जो अब पार्टी के लिए श्एसेटश् कम और लायबिलिटी ज्यादा बन चुके हैं, उन्हें कड़ा संदेश है कि या तो वे अपनी जमीन सुधारें या फिर नेपथ्य में जाने के लिए तैयार रहें। मप्र कांग्रेस की इस नई शुरुआत ने सूबे के बड़े नेताओं की नींद उड़ा दी है, क्योंकि खामोश निष्ठा का यह नया पैमाना कई बड़े सियासी गढ़ों को ढहाने वाला साबित होने जा रहा है।


बुधवार, 3 जून 2026

आदिवासियों के सहारे सत्ता की खोई चाबी ढूंढने में जुटी कांग्रेस

मालवा-निमाड़ में खोई जमीन वापस पाने पटवारी, चौधरी ने संभाली कमान

भोपाल। प्रदेश की सियासत में एक पुरानी और बेहद सटीक कहावत है जिसने मालवा जीता, सत्ता उसके कदम चूमती है। पिछले चुनाव में इसी अंचल में करारी शिकस्त झेलने के बाद अब कांग्रेस अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने के लिए पूरी ताकत से जुट गई है। पार्टी ने इस बार अपनी चुनावी और संगठनात्मक रणनीति के केंद्र में मालवा-निमाड़ अंचल की 22 अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीटों को रखा है। 

कांग्रेस का मानना है कि आदिवासियों का भरोसा जीतकर ही प्रदेश की सत्ता का ताला दोबारा खोला जा सकता है। इसी रणनीति के तहत इन दिनों मालवा-निमाड़ के अलग-अलग जिलों में कांग्रेस के विशेष प्रशिक्षण शिविरों का दौर चल रहा है। संगठन में नई जान फूंकने के लिए खुद प्रदेश कांग्रेस प्रभारी हरीश चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मैदानी मोर्चा संभाला है। राजनीतिक दृष्टि से मालवा-निमाड़ क्षेत्र प्रदेश का सबसे बड़ा पॉवर सेंटर माना जाता है। 

आदिवासी मतदाता की सरकार बनाने में अह्म भूमिका

इस अंचल में कुल 66 विधानसभा सीटें आती हैं। इन 66 सीटों में से 22 सीटें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जिनमें से 17 सीटें विशुद्ध रूप से कोर आदिवासी बेल्ट का हिस्सा हैं। इतिहास गवाह है कि इस अंचल का आदिवासी मतदाता जिस भी दल के साथ खड़ा हुआ, प्रदेष में उसी की सरकार बनी। पिछले दो दशकों में कांग्रेस का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन 2018 में रहा था, जब पार्टी ने इस अंचल की 66 में से 38 सीटें जीती थीं। उस समय इस सफलता का मुख्य आधार यही आदिवासी सीटें थीं, जहां कांग्रेस ने 12 सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज की थी और कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनाई थी।

कब किसके पाले में गईं आदिवासी सीटें

पिछले चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि मालवा-निमाड़ अंचल की 17 मुख्य आदिवासी सीटों पर दोनों दलों के बीच कैसी कांटे की टक्कर रही है।  आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 17 सीटों में से भाजपा को 2003 में 12 और कांग्रेस को 5 सीटें हासिल हुई। इसी तरह 2008 में भाजपा को 11 कांग्रेस को 6, 2013 में भाजपा को 15 और कांग्रेस को 2 सीटें हासिल हुई। जबकि 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 5 और कांग्रेस को 12 सीटें हासिल हुई। इस बार इन्हीं सीटें के बल पर कांग्रेस ने कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनाई। इसके बाद 2023 के चुनाव में भाजपा को 9 और कांग्रेस को 7 सीटें हासिल हुई। जबकि एक सीट पर बाप पार्टी के कमलेष्वर डोडियार को जीत हासिल हुई थी। 


प्रशिक्षण शिविरों के जरिए कार्यकर्ताओं को नया रोडमैप

2023 के चुनाव में भाजपा ने अंचल की 66 में से 48 सीटें जीतकर कांग्रेस (18 सीटें) को बैकफुट पर धकेल दिया था। इस हार से सबक लेते हुए जीतू पटवारी और हरीश चौधरी की जोड़ी अब ब्लॉक, मंडल और नगर अध्यक्षों को सीधे तौर पर प्रशिक्षित कर रही है। इन शिविरों के जरिए कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए जा रहे हैं कि जल, जंगल, जमीन और स्थानीय आदिवासी मुद्दों पर सरकार को घेरना, बूथ स्तर पर निष्क्रिय चेहरों को हटाकर आक्रामक और युवा कार्यकर्ताओं को आगे लाना, अंचल में उभरती हुई भारत आदिवासी पार्टी जैसी ताकतों के बीच अपने पारंपरिक आदिवासी वोट बैंक को बिखरने से रोकना है। 


मंगलवार, 3 मार्च 2026

 गोंगपा में ’विद्रोह’ की आहट, क्या बिखर जाएगा दादा हीरा सिंह मरकाम का सपना?

प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तेकाम को हटाने के लिए नेतृत्व को 9 मार्च तक का अल्टीमेटम, 22 मार्च को सामूहिक इस्तीफे की चेतावनी

राजेन्द्र पाराशर

भोपाल। मध्यप्रदेश में आदिवासियों की अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) एक बार फिर गहरे राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ी है। पार्टी के भीतर असंतोष की आग इस कदर भड़क चुकी है कि महाकौशल क्षेत्र के दिग्गज नेताओं ने वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तेकाम के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया है।

बीते 2 मार्च को सिवनी जिले की छपारा तहसील स्थित बंजारी हॉल में एक महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। 6 घंटे तक चली इस मैराथन बैठक में सिवनी, छिंदवाड़ा, बैतूल, बालाघाट और मंडला सहित कई जिलों के वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हुए। बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तेकाम की कार्यप्रणाली पर ’अविश्वास’ जताया गया। पदाधिकारियों का सीधा आरोप है कि तेकाम पार्टी संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं। बिना जिला और ब्लॉक इकाइयों की सहमति के नियुक्तियां करना और विरोध करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को निष्कासन की धमकी देना उनके ’तानाशाही’ रवैये को दर्शाता है।

मांगें नहीं मानी तो होगा सामूहिक इस्तीफा

विद्रोही गुट ने राष्ट्रीय अध्यक्ष विधायक तुलेश्वर मरकाम और राष्ट्रीय महासचिव श्याम सिंह मरकाम के सामने दो टूक मांगें रखी हैं। 9 मार्च 2026 तक कमलेश तेकाम को प्रदेश अध्यक्ष पद से तत्काल मुक्त किया जाए। छिंदवाड़ा या सिवनी के किसी अनुभवी नेता को सर्वसम्मति से नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया जाए। नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि 9 मार्च तक फैसला नहीं हुआ, तो 22 मार्च 2026 को सिवनी जिला मुख्यालय में एक विशाल सम्मेलन कर हजारों कार्यकर्ता सामूहिक इस्तीफा दे देंगे। इसके बाद पार्टी के संस्थापक दादा हीरा सिंह मरकाम के सपनों को पूरा करने के लिए एक नई राजनीतिक दिशा तय की जाएगी।

 2003 के शिखर से पतन की ओर

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का यह अंतर्कलह नया नहीं है, लेकिन इसने समर्थकों की चिंता बढ़ा दी है। गौर करने वाली बात है कि स्वर्ण काल साल 2003 के विधानसभा चुनाव में गोंगपा ने प्रदेश की राजनीति में तहलका मचा दिया था, जब उसके 3 विधायक निर्वाचित हुए थे। उस समय पार्टी राज्य में एक तीसरी शक्ति के रूप में उभरी थी। 2003 की उस बड़ी जीत के बाद से ही पार्टी लगातार आंतरिक गुटबाजी और बिखराव का शिकार रही है। समय-समय पर पार्टी कई धड़ों में विभाजित हुई, जिसका सीधा असर इसके जनाधार पर पड़ा। कभी सत्ता की चाबी अपने पास रखने का माद्दा रखने वाली पार्टी आज अपनों के ही विरोध के कारण अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही है। यदि पार्टी आलाकमान ने 9 मार्च तक इस विद्रोह को शांत नहीं किया, तो 22 मार्च का दिन गोंगपा के इतिहास में एक और बड़े विभाजन के रूप में दर्ज हो सकता है।