बुधवार, 23 नवंबर 2016

बिखराव के चलते हारी कांग्रेस

शहडोल और नेपानगर उपचुनाव ेमें कांग्रेस को एक बार फिर बिखराव के चलते हार का सामना करना पड़ा.वहीं भाजपा नेताओं की एकजुटता का भाजपा प्रत्याशी को यहां पर फायदा मिला है.
उपचुनाव के आए परिणामों ने एक बार फिर कांग्रेस को चिंता में डाल दिया है. प्रयास के बावजूद एक बार फिर कांग्रेस के नेता इन चुनावों में एकजुट नजर नहीं आए. वे चुनाव प्रचार के लिए मैदान में तो उतरे, मगर एकजुट होकर मैदान में दिखाई नहीं दिए. शहडोल में जरुर कांग्रेस के चारों नेता दिग्विजयसिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया एवं सुरेश पचौरी चुनाव प्रचार के लिए तो पहुंचे, मगर इनमें से कमलनाथ एवं पचौरी ने नेपानगर में दूरी बनाए रखी. दोनों स्थानों पर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी मोहन प्रकाश एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव जरुर दोनों ही स्थानों पर चुनाव प्रचार करते रहे, मगर वे कार्यकर्ताओं एवं स्थानीय पदाधिकारियों को संगठित नहीं कर पाए. कांग्रेस का संगठन यहां पर पूरी तरह से बिखरा रहा.
दूसरी ओर भाजपा ने यहां पर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के भरोसे चुनाव जीता. चौहान के साथ केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर फिर साथ नजर आए. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के अलावा प्रदेश संगठन महामंत्री सुहास भगत लगातार कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का फायदा भाजपा को यहां मिला. इसके अलावा स्थानीय नेताओं पर भाजपा ने जिस तरह से भरोसा जताया वह भी उसकी जीत में उसे फायदा दिला गई. भाजपा को शहडोल के अलावा नेपानगर में भी संगठनात्मक रुप से चुनाव लड़ने का फायदा मिला. यहां पर भाजपा की खण्डवा, बुरहानपुर जिला इकाई के अलावा इंदौर संभाग के पदाधिकारियों की सक्रियता ने जीत को मजबूती प्रदान की.
गोंगपा ने भाजपा शहडोल में दिलाया फायदा
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हीरासिंंह मरकाम यहां पर गोंगपा के प्रत्याशी थे. वे इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे. कांग्रेस की हार का मूल कारण वे भी एक रहे. मरकाम के अलावा छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की यहां हुई सभाओं ने कांग्रेस को और भी कमजोर किया. शहडोल संसदीय क्षेत्र में आदिवासियों के बीच हीरासिंंह के अलावा अजीत जोगी की भी खासा पैठ है. जोगी यहां पर कलेक्टर रहे हैं. जोगी का गोंगपा के साथ आना प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को भविष्य में भी नुकसान पहुंचा सकता है.

नहीं मिल रही मजदूरी

* आदिवासी अंचलों में नोटबंदी ने बढ़ाया संकट

नोट बंदी का खासा असर राज्य के आदिवासी अंचलों में दिखाई पड़ रहा है. यहां आदिवासी किसान से लेकर मजदूर वर्ग तक परेशान नजर आ रहा है. मजदूर को मजदूरी करने के बाद रुपए नहीं मिल रहे हैं, तो किसानी करने वाले आदिवासियों के सामने उनकी फसल मक्का के दाम अचानक गिर जाने से संकट आ खड़ा हुआ है.
राज्य के आदिवासी अंचलों खासकर बैतूल एवं खण्डवा जिले के आदिवासी ग्रामों में मजदूर वर्ग और वे आदिवासी जो किसानी कर रहे हैं उनके सामने सबसे बड़ा संकट नोट बंदी ने खड़ा कर दिया है. आदिवासी किसानों ने इस सीजन में मक्का की फसल ली थी, इसकी कीमत 12 रुपए प्रति किलो बाजार में थी, मगर नोट बंदी के बाद यह 8 रुपए प्रतिकिलों बिक रही है. आदिवासी किसान मजबूरी में अपनी इस फसल को औने-पौने दामों पर बेच रहा है.आदिवासी किसान के सामने आए इस संकट ने उसके परिवार के लिए समस्या खड़ी कर दी है. किसानी करने वालों को रुपए के अभाव में खाद-बीज के संकट से भी दो-चार होना पड़ रहा है.
समाजवादी जनपरिषद के अनुराम मोदी ने बताया कि आदिवासी अंचलों में मजदूरी करने वालों को दिनभर मजदूरी करने के बाद मजदूरी नहीं मिल रही है. जिनके यहां वे मजदूरी करने जाते हैं, वहां पर वे काम तो करते हैं, मगर शाम को लौटते वक्त उन्हें मजदूरी नहीं दी जा रही है. मोदी ने मांग की है कि मुख्यमंत्री को इस मामले को गंभीरता लेना चाहिए और आदिवासी अंचलों में नोट बदलवाने की व्यवस्था करने के साथ-साथ यह तय किया जाए कि आदिवासी मजदूर को मजदूरी समय पर मिल जाया करे. सजप के ही कार्यकर्ता बसंत टेकाम ने बताया कि बैतूल जिले के शाहपुर ब्लाक के डोढरमौउ के 25 मजदूर सीहोर जिले के बाड़ी-बख्तरा में धान कटाई के लिए मजदूरी करने गए थे, वहां पर कटाई का काम होने के बाद मजदूरों को यह कहकर किसानों ने वापस लौटा दिया कि उनके पास रुपए नहीं है, इस वजह से रुपए बाद में दे देंगे. इस स्थिति में परेशान मजदूर वापस लौट आए. उन्होंने बताया कि शाहपुर ब्लाक के  आदिवासी ग्रामों में हर घर से एक-दो नौजवान मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं, उनका परिवार मजदूरी पर ही आश्रित है. आज उनके सामने घर का खर्च उठाने का संकट खड़ा हो गया है. बैंकों में उनके अकाउंट नहीं है, कुछ लोग आदिवासी मजदूरों को यह कहकर मजदूरी नहीं दे रहे है कि उनके पास रुपए नहीं है, वे चेक देना चाहते हैं. इस स्थिति में अकाउंट के अभाव में मजदूर रुपए लेकर क्या करेगा? उन्होंने बताया कि यह समस्या केवल शाहपुर ब्लाक आदिवासी ग्रामों की नहीं है, बल्कि प्रदेश के आदिवासी अंचल में इसी तरह आदिवासी मजदूर परेशान हो रहे हैं. उनके सामने अब परिवार के लालन-पालन का संकट खड़ा हो रहा है.
आदिवासी नेता राजेन्द्र गढ़वाल ने बताया कि राज्य के खण्डवा जिले के आदिवासी ग्रामों में आदिवासी मजदूर नोटबंदी के बाद रोजी रोटी को लेकर परेशान हो गया है. मजदूरों के पास जो पुराने नोट हैं, उन्हें बदलने के लिए शहरों में जाना पड़ रहा है. डाकघरों में व्यवस्था नहीं की गई है. इस स्थिति में मजदूर हजार, दो हजार रुपए बदलवाने के लिए मजदूरी छोड़कर बैंकों में दिनभर लाइन में लगा रहता है.
आदिवासी मंत्री भी हैं खफा
नोट बंदी के बाद राज्य के आदिवासी मजदूरों के अलावा किसानों को जो समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है उससे प्रदेश के मंत्री भी खफा नजर आ रहे हैं. राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शाह ने कहा कि नोट बंदी अच्छा कदम है, मगद आदिवासी अंचलों में मजदूरों की परेशानी को देखते हुए कुछ इस तरह के कदम उठाने चाहिए ताकि मजदूर परेशान न हो.मजदूरों के पास ज्यादा संख्या में 5 सौ के नोट नहीं है, मगर उन्हें कम नोट होने के बावजूद बदलवाने में परेशानी हो रही है. डाक घरों पर तुरंत नोट बदलवाने की व्यवस्था की जानी चाहिए. वहीं खाघ मंत्री ओम प्रकाश धुर्वे भी नोट बंदी के बाद किसानों और आदिवासियों की परेशानी से चिंतित है. उन्होंने अपनी बात मंगलवार को कैबिनेट बैठक में उठानी भी चाही, मगर मुख्यमंत्री शिवराजसिंंह चौहान ने उन्हें रोक दिया.