शहडोल और नेपानगर उपचुनाव ेमें कांग्रेस को एक बार फिर बिखराव के चलते हार का सामना करना पड़ा.वहीं भाजपा नेताओं की एकजुटता का भाजपा प्रत्याशी को यहां पर फायदा मिला है.
उपचुनाव के आए परिणामों ने एक बार फिर कांग्रेस को चिंता में डाल दिया है. प्रयास के बावजूद एक बार फिर कांग्रेस के नेता इन चुनावों में एकजुट नजर नहीं आए. वे चुनाव प्रचार के लिए मैदान में तो उतरे, मगर एकजुट होकर मैदान में दिखाई नहीं दिए. शहडोल में जरुर कांग्रेस के चारों नेता दिग्विजयसिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया एवं सुरेश पचौरी चुनाव प्रचार के लिए तो पहुंचे, मगर इनमें से कमलनाथ एवं पचौरी ने नेपानगर में दूरी बनाए रखी. दोनों स्थानों पर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी मोहन प्रकाश एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव जरुर दोनों ही स्थानों पर चुनाव प्रचार करते रहे, मगर वे कार्यकर्ताओं एवं स्थानीय पदाधिकारियों को संगठित नहीं कर पाए. कांग्रेस का संगठन यहां पर पूरी तरह से बिखरा रहा.
दूसरी ओर भाजपा ने यहां पर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के भरोसे चुनाव जीता. चौहान के साथ केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर फिर साथ नजर आए. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के अलावा प्रदेश संगठन महामंत्री सुहास भगत लगातार कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का फायदा भाजपा को यहां मिला. इसके अलावा स्थानीय नेताओं पर भाजपा ने जिस तरह से भरोसा जताया वह भी उसकी जीत में उसे फायदा दिला गई. भाजपा को शहडोल के अलावा नेपानगर में भी संगठनात्मक रुप से चुनाव लड़ने का फायदा मिला. यहां पर भाजपा की खण्डवा, बुरहानपुर जिला इकाई के अलावा इंदौर संभाग के पदाधिकारियों की सक्रियता ने जीत को मजबूती प्रदान की.
गोंगपा ने भाजपा शहडोल में दिलाया फायदा
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हीरासिंंह मरकाम यहां पर गोंगपा के प्रत्याशी थे. वे इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे. कांग्रेस की हार का मूल कारण वे भी एक रहे. मरकाम के अलावा छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की यहां हुई सभाओं ने कांग्रेस को और भी कमजोर किया. शहडोल संसदीय क्षेत्र में आदिवासियों के बीच हीरासिंंह के अलावा अजीत जोगी की भी खासा पैठ है. जोगी यहां पर कलेक्टर रहे हैं. जोगी का गोंगपा के साथ आना प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को भविष्य में भी नुकसान पहुंचा सकता है.
उपचुनाव के आए परिणामों ने एक बार फिर कांग्रेस को चिंता में डाल दिया है. प्रयास के बावजूद एक बार फिर कांग्रेस के नेता इन चुनावों में एकजुट नजर नहीं आए. वे चुनाव प्रचार के लिए मैदान में तो उतरे, मगर एकजुट होकर मैदान में दिखाई नहीं दिए. शहडोल में जरुर कांग्रेस के चारों नेता दिग्विजयसिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया एवं सुरेश पचौरी चुनाव प्रचार के लिए तो पहुंचे, मगर इनमें से कमलनाथ एवं पचौरी ने नेपानगर में दूरी बनाए रखी. दोनों स्थानों पर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी मोहन प्रकाश एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव जरुर दोनों ही स्थानों पर चुनाव प्रचार करते रहे, मगर वे कार्यकर्ताओं एवं स्थानीय पदाधिकारियों को संगठित नहीं कर पाए. कांग्रेस का संगठन यहां पर पूरी तरह से बिखरा रहा.
दूसरी ओर भाजपा ने यहां पर मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के भरोसे चुनाव जीता. चौहान के साथ केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर फिर साथ नजर आए. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के अलावा प्रदेश संगठन महामंत्री सुहास भगत लगातार कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का फायदा भाजपा को यहां मिला. इसके अलावा स्थानीय नेताओं पर भाजपा ने जिस तरह से भरोसा जताया वह भी उसकी जीत में उसे फायदा दिला गई. भाजपा को शहडोल के अलावा नेपानगर में भी संगठनात्मक रुप से चुनाव लड़ने का फायदा मिला. यहां पर भाजपा की खण्डवा, बुरहानपुर जिला इकाई के अलावा इंदौर संभाग के पदाधिकारियों की सक्रियता ने जीत को मजबूती प्रदान की.
गोंगपा ने भाजपा शहडोल में दिलाया फायदा
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हीरासिंंह मरकाम यहां पर गोंगपा के प्रत्याशी थे. वे इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे. कांग्रेस की हार का मूल कारण वे भी एक रहे. मरकाम के अलावा छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की यहां हुई सभाओं ने कांग्रेस को और भी कमजोर किया. शहडोल संसदीय क्षेत्र में आदिवासियों के बीच हीरासिंंह के अलावा अजीत जोगी की भी खासा पैठ है. जोगी यहां पर कलेक्टर रहे हैं. जोगी का गोंगपा के साथ आना प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को भविष्य में भी नुकसान पहुंचा सकता है.