ईदगाह की मस्जिद से हुई इसकी शुरूआत
भोपाल। राजधानी की मस्जिदों में अब मुस्लिम महिलाएं भी नमाज अदा कर सकेंगी। महिलाओं के मस्जिद में सजदा करने की यह रिवायत 94 साल पहले खत्म हो चुकी थी। इसकी शुरुआत बीते शुक्रवार यानी 30 अगस्त को जुमे की नमाज अदा करने के साथ की गई।
मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में जाकर नमाज अदा करने के लिए राजधानी की ईदगाह की नजमुल मस्जिद में तमाम खास इंतजाम किए गए। बीते शुक्रवार 30 अगस्त को महिलाओं ने मस्जिद में नमाज अदा की। इसे लेकर ऑल इंडिया वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाहिस्ता अंबर ने कहा है, भोपाल में महिलाओं की नमाज अदायगी पूरे हिंदुस्तान के लिए पैगाम है। इसके बाद आम नमाजों में भी इसकी शुरुआत की जाएगी। आने वाले शुक्रवार को होने वाली जुमे की नमाज शहर की महिलाओं के लिए खास होगी। मस्जिद की प्रबंधन कमेटी से जुड़े लोगों का कहना है कि यहां नमाज पढ़ने आने वाली महिलाओं के लिए पर्दे के साथ अलग फ्लोर पर इंतजाम किए गए हैं। महिलाओं के वुजू और वॉशरूम का भी अलग से इंतजाम किया गया है। मस्जिद नजमुल में जुमे की नमाज का खुतबा दोपहर एक बजे शुरू होता है। यहां आने वाली महिलाएं एक अलग फ्लोर पर खुतबा भी सुन पाएंगी। साथ ही इमाम द्वारा पढ़ाई जाने वाली नमाज में जमात के साथ शामिल हो सकेंगी।
नवाबों के शासन में महिलाएं मस्जिद में पढ़ती थी नमाज
भोपाल की रियासत अक्सर बेगमों के हाथ में रही है। उस जमाने में महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने की पूरी इजाजत थी। बकायदा मस्जिद में नमाज के लिए उनको अलग से सुविधाएं मुहैया कराई जाती थी। भोपाल की कुलसुम बिया, मस्जिद मांजी साहिबा, मस्जिद नन्हीं बिया जैसी कई मस्जिदें महिलाओं के ही नाम पर हैं। जब तक बेगमों का शासन रहा तब तक महिलाओं का मर्दों की तरह मस्जिदों में नमाज अदा करना आम बात थी। हालांकि, भोपाल में स्थित एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद ताजुल मसाजिद में महिलाओं के नमाज पढ़ने की अलग से व्यवस्था है।
बेगमों का दौर खत्म हुआ तो महिलाओं सीमित कर दिए दायरे
भोपाल में साल 1930 में नवाब सुल्तान जहां बेगम का जब निधन हुआ, उसके बाद ही समाज में कायम रिवाजों में बदलाव आने शुरू हुए। साल 1950 आते-आते महिलाओं ने मस्जिदों में नमाज पढ़ना बंद कर दिया। हालांकि, यह किसी फतवे या मर्दों के द्वारा चलाई गई मुहिम के कारण नहीं हुआ था, बल्कि बेगमों का दौर खत्म होते ही महिलाओं ने अपने दायरे सीमित कर लिए थे।
मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में जाकर नमाज अदा करने के लिए राजधानी की ईदगाह की नजमुल मस्जिद में तमाम खास इंतजाम किए गए। बीते शुक्रवार 30 अगस्त को महिलाओं ने मस्जिद में नमाज अदा की। इसे लेकर ऑल इंडिया वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाहिस्ता अंबर ने कहा है, भोपाल में महिलाओं की नमाज अदायगी पूरे हिंदुस्तान के लिए पैगाम है। इसके बाद आम नमाजों में भी इसकी शुरुआत की जाएगी। आने वाले शुक्रवार को होने वाली जुमे की नमाज शहर की महिलाओं के लिए खास होगी। मस्जिद की प्रबंधन कमेटी से जुड़े लोगों का कहना है कि यहां नमाज पढ़ने आने वाली महिलाओं के लिए पर्दे के साथ अलग फ्लोर पर इंतजाम किए गए हैं। महिलाओं के वुजू और वॉशरूम का भी अलग से इंतजाम किया गया है। मस्जिद नजमुल में जुमे की नमाज का खुतबा दोपहर एक बजे शुरू होता है। यहां आने वाली महिलाएं एक अलग फ्लोर पर खुतबा भी सुन पाएंगी। साथ ही इमाम द्वारा पढ़ाई जाने वाली नमाज में जमात के साथ शामिल हो सकेंगी।
नवाबों के शासन में महिलाएं मस्जिद में पढ़ती थी नमाज
भोपाल की रियासत अक्सर बेगमों के हाथ में रही है। उस जमाने में महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने की पूरी इजाजत थी। बकायदा मस्जिद में नमाज के लिए उनको अलग से सुविधाएं मुहैया कराई जाती थी। भोपाल की कुलसुम बिया, मस्जिद मांजी साहिबा, मस्जिद नन्हीं बिया जैसी कई मस्जिदें महिलाओं के ही नाम पर हैं। जब तक बेगमों का शासन रहा तब तक महिलाओं का मर्दों की तरह मस्जिदों में नमाज अदा करना आम बात थी। हालांकि, भोपाल में स्थित एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद ताजुल मसाजिद में महिलाओं के नमाज पढ़ने की अलग से व्यवस्था है।
बेगमों का दौर खत्म हुआ तो महिलाओं सीमित कर दिए दायरे
भोपाल में साल 1930 में नवाब सुल्तान जहां बेगम का जब निधन हुआ, उसके बाद ही समाज में कायम रिवाजों में बदलाव आने शुरू हुए। साल 1950 आते-आते महिलाओं ने मस्जिदों में नमाज पढ़ना बंद कर दिया। हालांकि, यह किसी फतवे या मर्दों के द्वारा चलाई गई मुहिम के कारण नहीं हुआ था, बल्कि बेगमों का दौर खत्म होते ही महिलाओं ने अपने दायरे सीमित कर लिए थे।

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