भोपाल। प्रदेश की सियासत में एक पुरानी और बेहद सटीक कहावत है जिसने मालवा जीता, सत्ता उसके कदम चूमती है। पिछले चुनाव में इसी अंचल में करारी शिकस्त झेलने के बाद अब कांग्रेस अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने के लिए पूरी ताकत से जुट गई है। पार्टी ने इस बार अपनी चुनावी और संगठनात्मक रणनीति के केंद्र में मालवा-निमाड़ अंचल की 22 अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीटों को रखा है।
कांग्रेस का मानना है कि आदिवासियों का भरोसा जीतकर ही प्रदेश की सत्ता का ताला दोबारा खोला जा सकता है। इसी रणनीति के तहत इन दिनों मालवा-निमाड़ के अलग-अलग जिलों में कांग्रेस के विशेष प्रशिक्षण शिविरों का दौर चल रहा है। संगठन में नई जान फूंकने के लिए खुद प्रदेश कांग्रेस प्रभारी हरीश चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मैदानी मोर्चा संभाला है। राजनीतिक दृष्टि से मालवा-निमाड़ क्षेत्र प्रदेश का सबसे बड़ा पॉवर सेंटर माना जाता है।
आदिवासी मतदाता की सरकार बनाने में अह्म भूमिका
इस अंचल में कुल 66 विधानसभा सीटें आती हैं। इन 66 सीटों में से 22 सीटें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जिनमें से 17 सीटें विशुद्ध रूप से कोर आदिवासी बेल्ट का हिस्सा हैं। इतिहास गवाह है कि इस अंचल का आदिवासी मतदाता जिस भी दल के साथ खड़ा हुआ, प्रदेष में उसी की सरकार बनी। पिछले दो दशकों में कांग्रेस का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन 2018 में रहा था, जब पार्टी ने इस अंचल की 66 में से 38 सीटें जीती थीं। उस समय इस सफलता का मुख्य आधार यही आदिवासी सीटें थीं, जहां कांग्रेस ने 12 सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज की थी और कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनाई थी।
कब किसके पाले में गईं आदिवासी सीटें
पिछले चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि मालवा-निमाड़ अंचल की 17 मुख्य आदिवासी सीटों पर दोनों दलों के बीच कैसी कांटे की टक्कर रही है। आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 17 सीटों में से भाजपा को 2003 में 12 और कांग्रेस को 5 सीटें हासिल हुई। इसी तरह 2008 में भाजपा को 11 कांग्रेस को 6, 2013 में भाजपा को 15 और कांग्रेस को 2 सीटें हासिल हुई। जबकि 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 5 और कांग्रेस को 12 सीटें हासिल हुई। इस बार इन्हीं सीटें के बल पर कांग्रेस ने कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनाई। इसके बाद 2023 के चुनाव में भाजपा को 9 और कांग्रेस को 7 सीटें हासिल हुई। जबकि एक सीट पर बाप पार्टी के कमलेष्वर डोडियार को जीत हासिल हुई थी।
प्रशिक्षण शिविरों के जरिए कार्यकर्ताओं को नया रोडमैप
2023 के चुनाव में भाजपा ने अंचल की 66 में से 48 सीटें जीतकर कांग्रेस (18 सीटें) को बैकफुट पर धकेल दिया था। इस हार से सबक लेते हुए जीतू पटवारी और हरीश चौधरी की जोड़ी अब ब्लॉक, मंडल और नगर अध्यक्षों को सीधे तौर पर प्रशिक्षित कर रही है। इन शिविरों के जरिए कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए जा रहे हैं कि जल, जंगल, जमीन और स्थानीय आदिवासी मुद्दों पर सरकार को घेरना, बूथ स्तर पर निष्क्रिय चेहरों को हटाकर आक्रामक और युवा कार्यकर्ताओं को आगे लाना, अंचल में उभरती हुई भारत आदिवासी पार्टी जैसी ताकतों के बीच अपने पारंपरिक आदिवासी वोट बैंक को बिखरने से रोकना है।

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