मंगलवार, 16 जून 2026

कांग्रेस प्रभारियों की परंपरा रही समाधान कम, विवाद ज्यादा

गुटीय संघर्ष, असंतोष और आरोपों के बीच हुआ कार्यकालों का अंत


भोपाल। प्रदेश कांग्रेस में संगठन को धार देने और अंदरूनी कलह को शांत करने के इरादे से दिल्ली से भेजे जाने वाले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रभारी खुद विवादों के भंवर में फंसते रहे हैं। सूबे के कद्दावर क्षत्रपों के साथ तालमेल बिठाने में नाकाम रहे ये नेता कई बार खुद ही नई गुटबाजी की वजह बन गए। इसके बाद प्रदेष से उनकी विदाई भी होती रही है।
प्रदेश कांग्रेस की राजनीति का मिजाज ऐसा है कि यहां दिल्ली का रौब नहीं, बल्कि स्थानीय क्षत्रपों के साथ सामंजस्य काम आता है। जब-जब प्रभारियों ने अपनी मर्जी थोपने या दिग्गजों को बाईपास करने की कोशिश की, संगठन मजबूत होने के बजाय खुद प्रभारी ही विवादों की भेंट चढ़ गए। वर्तमान प्रभारी हरीश चौधरी से लेकर बी.के. हरिप्रसाद तक, इतिहास गवाह है कि जिसने भी यहां के सियासी दिग्गजों से सीधे टकराने या उन्हें नजरअंदाज करने की कोशिश की, उसे अपमानजनक कड़वे अनुभवों के साथ विदा होना पड़ा। हाल ही में राज्यसभा चुनाव की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होना वर्तमान प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी के लिए संकट खड़ा करता नजर आ रहा है।
नए-पुराने नेताओं के बीच नहीं बन सके सेतु
वर्तमान प्रभारी हरीश चौधरी को सूबे में नए और पुराने नेताओं के बीच सेतु बनने की जिम्मेदारी मिली थी, लेकिन राज्यसभा चुनाव ने उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। चुनाव के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन तकनीकी खामियों के चलते रद्द हो गया। इस सियासी संकट पर जब पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भोपाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे, तब हरीश चौधरी ने उन्हें बीच में ही टोकते हुए रूखे लहजे में कहा हम संभाल लेंगे। भरे मीडिया के सामने इस बर्ताव से आहत दिग्विजय सिंह ने हाथ जोड़ लिए और आगे कुछ भी बोलने से मना कर दिया। सरेआम टोकने की इस सियासत का वीडियो वायरल होते ही प्रभारी और सीनियर लीडरशिप का मनमुटाव एक बार फिर सड़क पर आ गया है।
टिकट वितरण की आग और अधिकारों की जंग
साल 2023 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जेपी अग्रवाल को हटाकर अचानक रणदीप सिंह सुरजेवाला को कमान सौंपी गई थी। सुरजेवाला का पूरा कार्यकाल टिकट वितरण में मचे घमासान और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के साथ अधिकार क्षेत्र की लड़ाई में बीता। टिकट कटने से नाराज कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ कमलनाथ और दिग्विजय के बंगलों बल्कि सुरजेवाला के सामने भी प्रदर्शन किया। चुनाव में कांग्रेस की करारी हार का ठीकरा केंद्रीय रणनीति और प्रभारी की कार्यप्रणाली पर फूटा, जिसके बाद आलाकमान को उन्हें हटाना पड़ा।
गुटबाजी के आगे मूकदर्शक बने रहे दिल्ली के नुमाइंदे
सुरजेवाला से पहले जेपी अग्रवाल प्रभारी थे। उनके कार्यकाल में संगठन के भीतर समन्वय का घोर अभाव दिखा। अग्रवाल पर आरोप लगे कि वे कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे बड़े क्षत्रपों के फैसलों के आगे महज मूकदर्शक बने रहे। वे जमीनी कार्यकर्ताओं और जिला प्रभारियों की शिकायतों को आलाकमान तक सही ढंग से पहुंचा ही नहीं पाए। संगठन में निष्क्रियता और गुटबाजी न रोक पाने के कारण चुनाव से ऐन पहले उन्हें पद से मुक्त कर दिया गया।
असंतोष की आग को भांपने में रहे नाकाम, गंवा दी सरकार
मुकुल वासनिक का कार्यकाल प्रदेश कांग्रेस के इतिहास के सबसे बड़े सियासी भूकंप का गवाह बना। उनके समय ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ-दिग्विजय गुट के बीच टकराव चरम पर था। सिंधिया समर्थकों का सीधा आरोप था कि प्रभारी रहते हुए वासनिक ने उनके गुट की उपेक्षा की और कमलनाथ सरकार के समय उपजे असंतोष को समय रहते हल नहीं किया। इसी अनदेखी का नतीजा 2020 में कांग्रेस सरकार गिरने के रूप में सामने आया।
चहेतों को उपकृत करने के आरोप
मोहन प्रकाश का कार्यकाल सबसे लंबा और ज्यादा गुटीय खींचतान वाला रहा। दिग्विजय, कमलनाथ और सिंधिया के बीच की अंदरूनी कलह को रोकने में वे नाकाम रहे। उन पर दिल्ली के समीकरणों के तहत चुनिंदा गुटों को शह देने के आरोप लगे। चुनावों में जमीनी नेताओं को नजरअंदाज कर पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट देने के कारण उनके खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। तत्कालीन अध्यक्ष अरुण यादव से भी उनकी पटरी नहीं बैठी। आखिरकार, लगातार हो रहे विरोध के चलते  उन्हें हटाया गया।
कद्दावर नेताओं से पटरी न बैठने और बयानों ने बिगाड़ा खेल
गुजरात से आए दीपक बावरिया को राहुल गांधी का करीबी माना जाता था। 2018 के चुनाव से पहले आए बावरिया की कमलनाथ और सिंधिया से कभी पटरी नहीं बैठी। जब सूबे में कांग्रेस सरकार बनी, तब भी वे विवाद नहीं संभाल पाए। सिंधिया ने जब द्वारा अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने की चेतावनी दी और कमलनाथ ने तो उतर जाएं कहा, तब बावरिया इस तनाव को संभालने में पूरी तरह विफल रहे। इस खींचतान के बाद कद्दावर नेताओं की नाराजगी के कारण उन्हें हटा दिया गया।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें