केन्द्र की रिपोर्ट में हुआ खुलासा, 2.44 लाख आवेदन निरस्त
भोपाल। अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम (एफआरए), 2006 के तहत वनाधिकार पट्टे हासिल करने की जंग लड़ रहे आदिवासियों के हक अब भी प्रशासनिक फाइलों में दबे पड़े हैं। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय राज्यसभा में दी प्रगति रिपोर्ट ने राज्य में वनाधिकारों के निपटारे की धीमी रफ्तार पर मुहर लगा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, लंबित दावों के मामले में मध्यप्रदेश पूरे देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है, जहां 2.73 लाख से अधिक आदिवासियों व पारंपरिक वन निवासियों के दावे अटके हुए हैं।
ज्नजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा दी जानकारी के अनुसार 30 जून 2026 तक की स्थिति के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो प्रदेश में वन अधिकारों की जमीनी हकीकत सामने आती है। प्रदेष में कुल प्राप्त दावों की संख्या व्यक्तिगत स्तर पर 7,66,430 और सामुदायिक स्तर पर 40,975 थी। इस तरह कुल दावों की संख्या 8,07,405 थी। इसमें से 2,44,487 आवेदनों को नियमों और दस्तावेजों की कमी या अन्य प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर अस्वीकृत कर दिया गया। वर्तमान में 2,73,457 दावे विभागों और समितियों के चक्कर काट रहे हैं और प्रक्रियाधीन हैं। प्रदेश में अब तक केवल 2,89,461 पट्टे (2,60,707 व्यक्तिगत और 28,754 सामुदायिक) ही बांटे जा सके हैं।
लाखों दावों का खारिज होना और पौने तीन लाख से अधिक मामलों का अधर में लटके रहना यह दर्शाता है कि वन ग्रामों में रहने वाले परिवारों को उनका विधिक अधिकार दिलाने के लिए मैदानी स्तर पर त्वरित और संवेदनशील निपटारे की सख्त दरकार है।
देश में तेलंगाना के बाद प्रदेश सबसे ऊपर
वनाधिकार कानून को लागू करने और इसकी निगरानी की मुख्य जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, जबकि केंद्रीय मंत्रालय राज्यों से मिलने वाली रिपोर्ट को संकलित करता है। आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में वर्तमान में 10,45,970 दावे लंबित हैं और 18,13,232 आवेदन निरस्त किए जा चुके हैं। देशभर में सर्वाधिक 3,29,367 लंबित दावों के साथ तेलंगाना पहले स्थान पर है, जबकि 2,73,457 लंबित मामलों के साथ मध्यप्रदेश देश में दूसरे नंबर पर बना हुआ है।

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