मंगलवार, 10 जून 2025

कांग्रेस का युवा दांव, अधूरा ना रह जाए सपना

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राजेन्द्र पाराशर 

प्रदेश कांग्रेस में युवा नेतृत्व को आगे लाने की पहल पार्टी के लिए एक साहसी और निर्णायक कदम है, लेकिन यह ’युवा प्रयोग’ तभी सफल हो पाएगा जब पार्टी आंतरिक एकता बनाए रखे और वरिष्ठ नेताओं का समर्थन भी मिले। अनुभवहीनता और गुटबाज़ी जैसी पुरानी समस्याएं अगर हावी रहीं, तो यह बदलाव का दावा केवल एक दिखावटी हलचल बनकर रह जाएगा। कांग्रेस पहले ही लंबे समय से गुटबाज़ी और आंतरिक खींचतान से जूझती रही है, जिससे उसकी ज़मीनी पकड़ लगातार कमजोर होती गई है। अब जब नेतृत्व युवा चेहरों को सौंपा जा रहा है, तो उन पर यह दबाव होगा कि वे न केवल खुद को साबित करें, बल्कि आपसी मतभेदों को भी पाटें। यदि नए नेता सभी धड़ों को साथ लेकर चलने में सफल होते हैं, तो यह कदम 2028 के चुनाव से पहले कांग्रेस को एक नई ताकत दे सकता है। वरना यह ‘युवा प्रयोग’ एक और अधूरा सपना बनकर रह जाएगा।

राहुल के लंगड़े घोड़ों को तलाश नहीं कर पाई कांग्रेस 

राहुल गांधी के “लंगड़े घोड़े“ वाले बयान से प्रदेश कांग्रेस में हलचल मच गई है। हाल ही में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कांग्रेस नेताओं को तीन श्रेणियों में बांटा रेस का घोड़ा, बारात का घोड़ा और लंगड़ा घोड़ा। उन्होंने कहा कि “लंगड़े घोड़े“, यानी निष्क्रिय, गुटबाज और पार्टी पर बोझ बन चुके नेताओं को अब रिटायर कर दिया जाएगा। यह बयान कांग्रेस की आंतरिक निष्क्रियता और गुटबाजी पर एक तीखा प्रहार माना जा रहा है। हालांकि, इससे पार्टी के कई नेता असहज महसूस कर रहे हैं। क्या यह बयान राहुल गांधी द्वारा संगठन की कमजोरी और अंदरूनी कलह की स्वीकारोक्ति है? यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि वे लंगड़े घोड़े कौन हैं, जिन्हें दिल्ली में राहुल गांधी की टीम ने चिन्हित किया है। कांग्रेस के भीतर इसका प्रभाव साफ देखा जा रहा है। नेताओं को अब इंतजार है लंगड़े खोड़े के नामों का।
सत्ता संतुलन का संदेश या शिवराज का अपना दर्द?
हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का एक बयान चर्चा में है। सीहोर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि कोई कयास मत लगाना, मोहन यादव मेरे मुख्यमंत्री हैं और हम सभी उनके साथ खड़े हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि पार्टी का आदेश उनके लिए ब्रह्मवाक्य है और वे चाहते हैं कि मोहन यादव उनसे बेहतर काम करें। इस बयान को कई लोग मुख्यमंत्री मोहन यादव के प्रति चौहान की निष्ठा के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे शिवराज के मन की पीड़ा या भीतर चल रही उथल-पुथल से भी जोड़ रहे हैं। साथ ही, इसे भाजपा के भीतर सत्ता संतुलन बनाए रखने की रणनीति भी माना जा रहा है, ताकि सभी बड़े नेता एकजुट रहें। सवाल यह उठता है कि क्या यह वक्तव्य केवल एक वरिष्ठ नेता की प्रतिबद्धता है, या इसके पीछे कुछ और भावनाएं भी छिपी हैं? इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।
मंत्री, अफसरों के बीच तालमेल के अभाव में अटकी तबादला सूची
प्रदेश में तबादलों की आखिरी तारीख 10 जून है, लेकिन कई अहम विभागों की तबादला सूची अब तक अटकी हुई है। कारण बताया जा रहा है कि मंत्री, प्रमुख सचिव और आयुक्तों के बीच समन्वय की कमी है। फाइलें मंत्री बंगलों और अधिकारियों की टेबल पर घूम रही हैं, लेकिन मुहर किसी की नहीं लग पा रही। राजस्व, वन, परिवहन, ऊर्जा, महिला एवं बाल विकास, पंचायत, खाद्य और उच्च शिक्षा सहित कई विभागों की सूचियां अधर में लटकी हैं। वित्त मंत्री के अधीन आबकारी और कमर्शियल टैक्स जैसे विभागों में भी संशय बना हुआ है। सूत्रों की मानें तो कुछ स्थानांतरण राजनीतिक सिफारिशों और पसंदीदा अधिकारियों को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि तारीख बढ़ेगी या आखिरी वक्त पर तबादला सूचियां जारी होंगी। 

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