मंगलवार, 10 जून 2025

खूनी हनीमूनः एक विवाह और एक षड्यंत्र की त्रासदी


इंदौर के नामचीन ट्रांसपोर्ट कारोबारी राजा रघुवंशी की शादी की खुशियाँ अभी सजीव थीं, शहनाइयों की गूँज अभी थमी नहीं थी कि एक हृदयविदारक खबर ने सबको झकझोर कर रख दिया। यह शादी, जो 11 मई 2025 को सोनम से हुई थी, कुछ ही दिनों में एक भयावह त्रासदी में बदल गई। राजा की रहस्यमयी मौत ने न सिर्फ उनके परिवार बल्कि पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। मेघालय पुलिस ने इस दिल दहला देने वाले मामले को “ऑपरेशन हनीमून” नाम दिया, और जो कहानी सामने आई, वह किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं थी।

प्रेम, धोखा और सुपारीः हत्या की नींव

शुरुआती जांच में सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ, जब पता चला कि राजा की हत्या का मास्टरमाइंड कोई और नहीं, बल्कि उनकी नई नवेली पत्नी सोनम रघुवंशी ही थी। सोनम का रिश्ता पहले से ही राज कुशवाहा नामक युवक से चल रहा था, जो राजा की ही फैक्ट्री में कार्यरत था। इस अवैध रिश्ते ने एक भयावह मोड़ तब लिया, जब दोनों ने राजा को रास्ते से हटाने की साजिश रची। हत्या के लिए दस लाख रुपये की सुपारी दी गई थी। यह भयावह तथ्य सामने आया कि सोनम और राज की योजना थी कि शादी के तुरंत बाद ही राजा को खत्म कर दिया जाए।

हनीमून पर मौत की स्क्रिप्ट

20 मई को राजा और सोनम हनीमून पर मेघालय रवाना हुए। यह वही यात्रा थी, जिसे सोनम ने पूरी योजना के साथ चुना था। 23 मई को दोनों लापता हो गए। लगातार प्रयासों के बाद 2 जून को राजा का शव चेरापूंजी की एक गहरी खाई से मिला। शव की हालत और प्राप्त सबूतों से यह स्पष्ट हुआ कि राजा पर पहले क्रूरता से हमला किया गया, उसकी सोने की चेन और अंगूठी छीनी गई और फिर उसे खाई में फेंक दिया गया। आशंका है कि जब राजा को खाई में फेंका गया, वह तब भी जीवित था। यह नृशंसता एक ऐसे अपराध की ओर इशारा करती है, जिसमें मानवीयता का कोई स्थान नहीं बचा।

पुलिस की कार्यवाही और गिरफ्तारियाँ

मेघालय पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए सोनम, उसके प्रेमी राज कुशवाहा और तीन भाड़े के हत्यारों दृ आकाश राजपूत, विशाल और आनंद कुर्मी दृ को गिरफ्तार किया। सोनम ने अंततः 9 जून को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में आत्मसमर्पण कर दिया। उसे शिलांग ले जाकर पूछताछ की जा रही है। इस मामले में तीन राज्यों  मध्य प्रदेश, मेघालय और उत्तर प्रदेश का आपराधिक कनेक्शन सामने आया, जो इस अपराध की जटिलता और पूर्व-नियोजन को दर्शाता है।

परिवार का दर्द और न्याय की गुहार

राजा की माँ, उमा रघुवंशी, इस त्रासदी से उबर नहीं पा रही हैं। वे कहती हैं, “सोनम के कहने पर ही राजा शिलांग गया था। सोनम ने जानबूझकर वापसी की बुकिंग नहीं करवाई थी। सब पहले से तय था।“ परिवार की ओर से यह मांग की जा रही है कि इस जघन्य अपराध में शामिल सभी दोषियों को फाँसी दी जाए, ताकि राजा को सच्चा न्याय मिल सके।

रिश्तों की सतह के नीचे छुपा खतरा

यह घटना एक बार फिर यह प्रश्न उठाती है कि क्या हम अपने रिश्तों को सही से पहचान पा रहे हैं? “खूनी हनीमून“ की यह दास्तान बताती है कि जब रिश्ते धोखे और लालच के गर्त में डूब जाएँ, तो उनका अंजाम कितना खौफनाक हो सकता है।

समाज के लिए चेतावनी भी

राजा रघुवंशी की हत्या केवल एक व्यक्ति की जान लेने का मामला नहीं है; यह उन अनगिनत कहानियों में से एक है जो बताती हैं कि विश्वासघात और लालच मिलकर इंसान को किस हद तक गिरा सकते हैं। “ऑपरेशन हनीमून“ जैसे मामलों की सच्चाई सामने लाना और अपराधियों को सज़ा दिलाना केवल एक परिवार को न्याय दिलाना नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी बनाना भी है। उम्मीद है कि इस केस में न्याय होगा और राजा को वह इंसाफ मिलेगा, जिसकी उसकी आत्मा पुकार कर रही है।


कांग्रेस का युवा दांव, अधूरा ना रह जाए सपना

खबरों  की खबर
राजेन्द्र पाराशर 

प्रदेश कांग्रेस में युवा नेतृत्व को आगे लाने की पहल पार्टी के लिए एक साहसी और निर्णायक कदम है, लेकिन यह ’युवा प्रयोग’ तभी सफल हो पाएगा जब पार्टी आंतरिक एकता बनाए रखे और वरिष्ठ नेताओं का समर्थन भी मिले। अनुभवहीनता और गुटबाज़ी जैसी पुरानी समस्याएं अगर हावी रहीं, तो यह बदलाव का दावा केवल एक दिखावटी हलचल बनकर रह जाएगा। कांग्रेस पहले ही लंबे समय से गुटबाज़ी और आंतरिक खींचतान से जूझती रही है, जिससे उसकी ज़मीनी पकड़ लगातार कमजोर होती गई है। अब जब नेतृत्व युवा चेहरों को सौंपा जा रहा है, तो उन पर यह दबाव होगा कि वे न केवल खुद को साबित करें, बल्कि आपसी मतभेदों को भी पाटें। यदि नए नेता सभी धड़ों को साथ लेकर चलने में सफल होते हैं, तो यह कदम 2028 के चुनाव से पहले कांग्रेस को एक नई ताकत दे सकता है। वरना यह ‘युवा प्रयोग’ एक और अधूरा सपना बनकर रह जाएगा।

राहुल के लंगड़े घोड़ों को तलाश नहीं कर पाई कांग्रेस 

राहुल गांधी के “लंगड़े घोड़े“ वाले बयान से प्रदेश कांग्रेस में हलचल मच गई है। हाल ही में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कांग्रेस नेताओं को तीन श्रेणियों में बांटा रेस का घोड़ा, बारात का घोड़ा और लंगड़ा घोड़ा। उन्होंने कहा कि “लंगड़े घोड़े“, यानी निष्क्रिय, गुटबाज और पार्टी पर बोझ बन चुके नेताओं को अब रिटायर कर दिया जाएगा। यह बयान कांग्रेस की आंतरिक निष्क्रियता और गुटबाजी पर एक तीखा प्रहार माना जा रहा है। हालांकि, इससे पार्टी के कई नेता असहज महसूस कर रहे हैं। क्या यह बयान राहुल गांधी द्वारा संगठन की कमजोरी और अंदरूनी कलह की स्वीकारोक्ति है? यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि वे लंगड़े घोड़े कौन हैं, जिन्हें दिल्ली में राहुल गांधी की टीम ने चिन्हित किया है। कांग्रेस के भीतर इसका प्रभाव साफ देखा जा रहा है। नेताओं को अब इंतजार है लंगड़े खोड़े के नामों का।
सत्ता संतुलन का संदेश या शिवराज का अपना दर्द?
हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का एक बयान चर्चा में है। सीहोर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि कोई कयास मत लगाना, मोहन यादव मेरे मुख्यमंत्री हैं और हम सभी उनके साथ खड़े हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि पार्टी का आदेश उनके लिए ब्रह्मवाक्य है और वे चाहते हैं कि मोहन यादव उनसे बेहतर काम करें। इस बयान को कई लोग मुख्यमंत्री मोहन यादव के प्रति चौहान की निष्ठा के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे शिवराज के मन की पीड़ा या भीतर चल रही उथल-पुथल से भी जोड़ रहे हैं। साथ ही, इसे भाजपा के भीतर सत्ता संतुलन बनाए रखने की रणनीति भी माना जा रहा है, ताकि सभी बड़े नेता एकजुट रहें। सवाल यह उठता है कि क्या यह वक्तव्य केवल एक वरिष्ठ नेता की प्रतिबद्धता है, या इसके पीछे कुछ और भावनाएं भी छिपी हैं? इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।
मंत्री, अफसरों के बीच तालमेल के अभाव में अटकी तबादला सूची
प्रदेश में तबादलों की आखिरी तारीख 10 जून है, लेकिन कई अहम विभागों की तबादला सूची अब तक अटकी हुई है। कारण बताया जा रहा है कि मंत्री, प्रमुख सचिव और आयुक्तों के बीच समन्वय की कमी है। फाइलें मंत्री बंगलों और अधिकारियों की टेबल पर घूम रही हैं, लेकिन मुहर किसी की नहीं लग पा रही। राजस्व, वन, परिवहन, ऊर्जा, महिला एवं बाल विकास, पंचायत, खाद्य और उच्च शिक्षा सहित कई विभागों की सूचियां अधर में लटकी हैं। वित्त मंत्री के अधीन आबकारी और कमर्शियल टैक्स जैसे विभागों में भी संशय बना हुआ है। सूत्रों की मानें तो कुछ स्थानांतरण राजनीतिक सिफारिशों और पसंदीदा अधिकारियों को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि तारीख बढ़ेगी या आखिरी वक्त पर तबादला सूचियां जारी होंगी। 

गुरुवार, 5 जून 2025

इलेक्टेड जनप्रतिनिधि पर हावी हो रहे सिलेक्टेड

फिर छलका भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य का दर्द 


भोपाल। भाजपा में विधायकों की नाराजगी का दौर थम नहीं रहा है। संगठन और सरकार चाहकर भी उसे रोक नहीं पा रहे हैं। विधायकों की नाराजगी एक-एक कर लगातार खुलकर सामने आ रही है। आज एक और भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि संगठन और सरकार में इलेक्टेड जनप्रतिनिधि की बात नहीं सुनी जा रही है, सिलेक्टेड भारी हो गए हैं।
भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य का यह दर्द आज उस वक्त छलका जब वे गुना में पर्यावरण दिवस के अवसर पर निकाली गई रैली को हरी झंडी दिखाकर रवाना कर रहे थे। गुना विधायक पन्नालाल शाक्य ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अनदेखी की बात कही है। इसी दौरान भाजपा विधायक ने कहा कि जनता ने उन्हें भारी मतों से जिताकर तो भेज दिया है, लेकिन इलेक्टेड जनप्रतिनिधि की बात नहीं सुनी जा रही है, सिलेक्टेड हावी हो रहे हैं। इससे पहले विधायक ने गुना को नगर निगम बनाने के दौरान सामने आ रही बाधाओं का जिक्र किया। जिसमें उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे कई गांव नगर निगम में शामिल होने का विरोध करने लगे हैं। विधायक पन्नालाल शाक्य ने यह भी कहा कि उन्होंने गुना में रिंग रोड और विवेक कॉलोनी से बायपास तक सड़क बनाने की मांग सरकार के सामने रखी थी, उसे भी राजनीतिक कारणों के चलते खटाई में डाल दिया गया है। दरअसल, पन्नालाल शाक्य का इशारा उन नेताओं की तरफ था जो अपने वर्चस्व वाली ग्राम पंचायतों को नगर निगम में शामिल नहीं होने देना चाहते हैं और इसके लिए लगातार प्रयास भी कर रहे हैं।
 
पहले भी कर चुके हैं अपना दर्द बयां
भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य द्वारा यह कोई पहली बार नहीं हुआ है जब उन्होंने संगठन  और अपनी ही सरकार को घेरा हो। उन्होंने बीते मई माह में भी गुना को नगर निगम बनाने की प्रक्रिया के बीच विधायक अपनी सरकार से नाराजगी जताई थी। पन्नालाल शाक्य ने कहा कि वह आरक्षित सीट के प्रतिनिधि हैं, इसलिए हमारी कोई नहीं सुन रहा है। यहां तक की उन्होंने इस दौरान चेतावनी भी दी थी कि यदि इस पंचायत को नगर निगम क्षेत्र में नहीं जोड़ा गया तो वे स्वयं गुना को नगर निगम बनाए जाने का विरोध करेंगे।

भाजपा कर रही है प्रशिक्षण शिविर
लगातार भाजपा विधायकों की नाराजगी सामने आने के बाद भाजपा ने पचमढ़ी में इसी माह 14 जून से तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया है। शिविर का उद्घाटन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा करेंगे, जबकि समापन समारोह में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के शामिल होने की संभावना है। शिविर में लोकसभा, राज्यसभा सांसदों और विधायकों को पार्टी की नीतियों, मर्यादित व्यवहार और तय विषयों पर ही बयान देने की दिशा में प्रशिक्षित किया जाएगा। इसके अलावा पार्टी विधायकों को हिदायत भी दी जा चुकी है कि वे संगठन स्तर पर अपनी नाराजगी जताएं, सार्वजनिक रूप से बोलने से बचे, मगर भाजपा विधायक लगातार खुलकर सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जता रहे हैं। 

मंगलवार, 20 मई 2025

भाजपा की सरकार में दर्जन भर मंत्री दे चुके हैं इस्तीफा

किसी को बयानबाजी, किसी को 75 साल की उम्र के कारण देना पड़ा था इस्तीफा


भोपाल। भाजपा सरकार के अब तक के कार्यकाल में करीब दर्जन भर  मंत्रियों को अलग-अलग कारणों से मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती भी शामिल हैं, जिन्होंने करीब आठ माह तक मुख्यमंत्री रहने के बाद पद से इस्तीफा देकर तिरंगा यात्रा निकाली थी। जबकि मंत्रियों में किसी को बयानबाजी तो किसी को उम्र की अधिकता के कारण इस्तीफा देना पड़ा था।
भाजपा सरकार के कार्यकाल में अब तक अलग-अलग कारणों से कई मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा था। कोई बयानबाजी को लेकर इस्तीफा देने को विवश हुआ था तो कोई आयकर और लोकायुक्त छापों के चलते इस्तीफा देने को मजबूर हुआ था। मंत्रियों के अधिकांश इस्तीफे शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए हुए थे। प्रदेश में उमाभारती के नेतृत्व में भाजपा ने 2003 में सरकार बनाई थी। उमा भारती 8 दिसंबर 2003 को मुख्यमंत्री बनी। इसके बाद 23 अगस्त 2004 तक वे मुख्यमंत्री रहीं। तिरंगा मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने इस्तीफा दे दिया। उमा भारती के बाद उनके मंत्री मंडल में मंत्री रहे सुनील नायक से तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने इस्तीफा ले लिया था। नायक से इस्तीफा लेने की वजह उनके बयान बने थे। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्रिमंडल के एक मंत्री जुगल किशोर बागड़ी से इस्तीफा मांगा था, क्योंकि लोकायुक्त ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। चौहान के मुख्यमंत्री रहने के दौरान कई मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा था। इसी तरह 2008 में अजय विश्नाई ने अपने रिश्तेदारों के आवासीय परिसरों पर आयकर के छापे पड़ने की कार्रवाई के चलते इस्तीफा दिया था। इन छापों ने विश्नोई पर भी सवालिया निशान लगा दिया था। नतीजतन, चौहान और पार्टी संगठन ने उनसे इस्तीफा मांगने का फैसला किया। साल  2010 में बेलागांव में हुई गोलीबारी की घटना में अपने परिवार के सदस्यों का नाम आने के कारण तत्कालीन मंत्री अनूप मिश्रा को इस्तीफा देना पड़ा था। फिर भी मिश्रा और उनके परिवार के सदस्यों को इस घटना में क्लीन चिट मिल गई थी। इसके बाद वे फिर से मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। 2013 में राज्य के तत्कालीन वित्त मंत्री राघवजी भाई को एक सेक्स स्कैंडल के वीडियो के सामने आने के बाद मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। हालांकि अब राघवजी को इस मामले में क्लीनचिट मिल गई है।
75 की उम्र के चलते दिया था इस्तीफा
वर्ष 2016 में शिवराज सरकार के दो कद्दावर मंत्रियों को केवल इस कारण इस्तीफा देना पड़ा था कि वे 75 साल की उम्र को पार कर चुके थे। इनमें तत्कालीन मंत्री बाबूलाल गौर और सरताज सिंह के नाम ष्शामिल है। दोनां ही मंत्रियों इस्तीफा मांगे जाने पर नाराज थे, मगर केन्द्रीय नेतृत्व के आगे दोनों की नहीं चली और दोनों को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। बाद में दोनों ही मंत्रियों के टिकट भी भाजपा ने काट दिए थे।
चुनाव हारे तो इन्होंने दिया इस्तीफा
शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए इमरती देवी, गिर्राज दंडोतिया और ऐदल सिंह कंसाना को चुनाव हारने के बाद इस्तीफा देना पड़ा था। डा मोहन यादव के नेतृत्व वाली कैबिनेट से इस्तीफा देने वाले एकमात्र मंत्री रामनिवास रावत थे। उन्होंने चुनाव हारने के कारण इस्तीफा दिया था।
बयानबाजी के चलते फिर घिरे हैं विजय शाह
राज्य के आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह से इन दिनों एक बार फिर बदजुबानी के चलते इस्तीफे की मांग उठ रही है। कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दिए बयान के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर विजय शाह से इस्तीफे मांग की जा रही है। इतना ही नहीं भाजपा के कई नेताओं ने भी शाह से इस्तीफे की मांग की है। फिलहाल संगठन और सरकार दोनों ने मौन साध रखा है। मगर उनके मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी जांच के बाद संभावना जताई जा रही है कि संगठन को कोई कदम उठाना पड़ेगा।

बुधवार, 11 दिसंबर 2024

कांग्रेस विधायकों के भोज से मिलेगा नया संदेश ?

कमलनाथ, उमंग सिंघार ने अलग-अलग दिन विधायकों को किया आमंत्रित

भोपाल। प्रदेश कांग्रेस में एक बार फिर भोज की राजनीति शुरू होने जा रही है। विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ द्वारा अलग-अलग दिन कांग्रेस विधायकों को दिए जाने वाले भोज की चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के भोज से कांग्रेस विधायकों को कोई नया संदेश मिल सकता है। यह संदेश क्या होगा, इसका जानकारी तो विधायकों को कमलनाथ के यहां होने वाले भोज के बाद ही मिलेगी।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते एक दिन पहले अपने विधायकों को भोज पर बुलाने की परंपरा वैसे तो कांग्रेस की रही है। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र के एक दिन पहले कांग्रेस विधायकों को भोज पर आमंत्रित किया है। इसी दिन वे विधायक दल की बैठक भी करने वाले हैं। नेता प्रतिपक्ष ने विधायकों को अपने बंगले के बजाय राजधानी के एक होटल में भोज पर बुलाया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का कहना है कि विधायक दल की बैठक में सत्र के दौरान सरकार को घेरने की रणनीति बनाई जाएगी। विधायकों के भोज को लेकर उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष होने के नाते वे पार्टी की परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी 16 दिसंबर को अपने बंगले पर कांग्रेस विधायकों को भोज पर आमंत्रित किया है। इस दौरान वे खुद राजधानी में रहेंगे। कमलनाथ के यहां होने वाले विधायकों के भोज को लेकर तरह-तरह  के कयास लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि कमलनाथ भोज के बहाने एक बार फिर सक्रियता दिखाएंगे। संभावना है कि इस बहाने विधायकों से उनकी बनी दूरी को करीबी में बदलें। वैसे कमलनाथ पूर्व में भी एक बार ऐसा कर चुके हैं। तब उन्होंने कहा था कि वरिष्ठ होने के नाते और विधायकों के कहने पर उन्होंने भोज दिया है। मगर वर्तमान में कांग्रेस में चल रही उठापटक के चलते कांग्रेस नेताओं को ही यह भोज चिंता में डाल रहा है। माना जा रहा है कि कमलनाथ के यहां होने वाले विधायकों के भोज से विधायकों को कोई संदेश भी मिल सकता है। वह एकता का होगा या फिर कोई और। यह तो भोज के बाद ही पता चलेगा।
उमंग के भोज में शामिल होंगे कमलनाथ !
कमलनाथ खुद छिंदवाड़ा से विधायक हैं और कांग्रेस विधायक दल में सबसे वरिश्ठ विधायक भी है। इस नाते नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने उन्हें भी भोज में आमंत्रित किया है, मगर सवाल इस बात को लेकर उठ रहे हैं कि क्या कमलनाथ उमंग द्वारा आयोजित किए जाने वाले भोज में ष्शामिल होंगे। फिलहाल उनके राजधानी पहुंचने का समय और दिन तय नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि 15 की शाम को या फिर 16 दिसंबर की सुबह भोपाल पहुंचेंगे।  

सोमवार, 9 दिसंबर 2024

जीतू ने किया अपमान, किन्नर समाज का लगेगा श्राप



पूर्व  विधायक शबनम मौसी ने पूछा कांग्रेस इनकी बपौती है क्या ?

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में पहली किन्नर विधायक रही शबनम मौसी ने आज प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोला। उन्होंने कहा कि मैं जीतू पटवारी से मिलने गई, मगर उनके सहयोगियों ने मिलने नहीं दिया। उन्होंने किन्नर का अपमान किया है। किन्नर समाज का उन्हें श्राप लगेगा। शबनम ने कहा कि कोई मिल नहीं रहा था तो जीतू को अध्यक्ष बनाया दिया, क्या कांग्रेस इनकी बपौती है।
पूर्व विधायक शबनम मौसी आज राजधानी भोपाल पहुंची थी। वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी से मिलने पहुंची, मगर उनकी मुलाकात नहीं हुई। इसके बाद प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के बाहर उन्होंने मीडिया से चर्चा करते हुए नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि पूर्व में भी वे कांग्रेस में शामिल होने के लिए पहुंची थी, मगर उस वक्त भी नेताओं ने उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं दिया। आज वे प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी से मिलना चाहती थी, मगर उनके सहयोगियों ने मुलाकात नहीं कराई। उन्होंने कहा कि यह किन्नर का अपमान है। किन्नर समाज का श्राप लगेगा, इन्हें। कांग्रेस की आज जो प्रदेश में स्थिति है, वह इन्हीं जैसे नेताओं के कारण है। कांग्रेस इनकी बपौती है क्या, जिनसे चाहे मिलेंगे और जिन्हें चाहे ठुकरा देंगे? उन्होंने कहा पटवारी में लोगों को जोड़ने की क्षमता नहीं है। कोई अध्यक्ष मिल नहीं रहा था इसलिए जीतू को अध्यक्ष बना दिया। शबनम मौसी ने कहा कि जीतू को अध्यक्ष बनाने के बाद कांग्रेस और खराब हो रही है। जीतू के आचरण ऐसा है, तभी लोग छोड़ के जा रहे हैं। पहले भी सदस्यता लेने आई थी तो अपमानित किया था, मैं बहुत दुखी हूं।
उल्लेखनीय है कि देश की पहली किन्नर विधायक शबनम मौसी ने साल 2000 में शहडोल जिले की सोहागपुर सीट से उपचुनाव जीता था। उन्होंने भाजपा के लल्लू सिंह को 17,800 से ज्यादा मतों के अंतर से हराया था। हालांकि, साल 2003 के विधानसभा चुनावों में वह केवल 1400 वोट पाने में सफल रहीं और हार गईं थीं।

खोया जनाधार पाने बसपा प्रदेश में करेगी सामाजिक सम्मेलन


भोपाल। प्रदेश में विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद बहुजन समाज पार्टी प्रदेश में फिर अपना वोट बैंक मजबूत करने की तैयारी कर रही है। खोए जनाधार को पाने के लिए बसपा द्वारा अब प्रदेश में अलग-अलग जातियों को जोड़ने के लिए सामाजिक सम्मेलन कराने का फैसला लिया है। सर्वसमाज के नारे पर बसपा फिर से प्रदेश में अपने को मजबूत करने की तैयारी कर रही है।

ब्हुजन समाज पार्टी को प्रदेश में 2023 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा था। दोनों ही चुनाव में उसने प्रत्याशी तो मैदान में उतारे मगर एक भी स्थान पर उसे जीत नहीं मिली। इसके बाद से बसपा का संगठन और भी कमजोर हुआ। अब बसपा प्रदेश में एक बार फिर संगठन को मजबूत करने की तैयारी कर रही है।  बसपा ने तय किया है कि पार्टी में जिस समाज के जो पदाधिकारी हैं एवं पूर्व सांसद, पूर्व विधायक और हारे हुए प्रत्याशी अपनी-अपनी समाज के सामाजिक सम्मेलन कराएंगे। हालांकि ये सम्मेलन समाजों में जन्मे महापुरुषों संतों के नाम पर कराए जाएंगे। रानी दुर्गावती, टंट्या मामा, देवी अहिल्या बाई होल्कर, संत गाडगे जी महाराज, नामदेव महाराज, संत रविदास, ज्योतिबा फुले जैसे महापुरुषों के नाम पर यह आयोजन होंगे।
जनाधार वाली विधानसभा सीटों पर फोकस
बसपा अब उन सीटों पर फोकस कर रही है जहां उसका वोट बैंक निर्णायक रहा है। सुपर-30 के फॉर्मूला पर बसपा जनवरी से मजबूत जनाधार वाली 30 विधानसभाओं में संगठन को मजबूत करेगी। इन 30 विधानसभाओं में बूथ वार कमेटियों के गठन के साथ ही कमजोर बूथों पर वोट बैंक बढ़ाने के लिए प्रदेश, सेक्टर, जोन के इंचार्ज बैठकें करेंगे। करीब 3 महीने बाद अगले फेज में सुपर-30 के तहत 30 अन्य विधानसभाओं में काम शुरू किया जाएगा।