गुरुवार, 13 अगस्त 2026

वनाधिकार पट्टों का अटका सफर, 2.73 लाख आदिवासियों के हक फाइलों में बंद

केन्द्र की रिपोर्ट में हुआ खुलासा, 2.44 लाख आवेदन निरस्त

भोपाल। अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम (एफआरए), 2006 के तहत वनाधिकार पट्टे हासिल करने की जंग लड़ रहे आदिवासियों के हक अब भी प्रशासनिक फाइलों में दबे पड़े हैं। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय राज्यसभा में दी प्रगति रिपोर्ट ने राज्य में वनाधिकारों के निपटारे की धीमी रफ्तार पर मुहर लगा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, लंबित दावों के मामले में मध्यप्रदेश पूरे देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है, जहां 2.73 लाख से अधिक आदिवासियों व पारंपरिक वन निवासियों के दावे अटके हुए हैं।

ज्नजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा दी जानकारी के अनुसार 30 जून 2026 तक की स्थिति के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो प्रदेश में वन अधिकारों की जमीनी हकीकत सामने आती है। प्रदेष में कुल प्राप्त दावों की संख्या व्यक्तिगत स्तर पर 7,66,430 और सामुदायिक स्तर पर 40,975 थी। इस तरह कुल दावों की संख्या 8,07,405 थी। इसमें से  2,44,487 आवेदनों को नियमों और दस्तावेजों की कमी या अन्य प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर अस्वीकृत कर दिया गया। वर्तमान में 2,73,457 दावे विभागों और समितियों के चक्कर काट रहे हैं और प्रक्रियाधीन हैं। प्रदेश में अब तक केवल 2,89,461 पट्टे (2,60,707 व्यक्तिगत और 28,754 सामुदायिक) ही बांटे जा सके हैं।

लाखों दावों का खारिज होना और पौने तीन लाख से अधिक मामलों का अधर में लटके रहना यह दर्शाता है कि वन ग्रामों में रहने वाले परिवारों को उनका विधिक अधिकार दिलाने के लिए मैदानी स्तर पर त्वरित और संवेदनशील निपटारे की सख्त दरकार है।

देश में तेलंगाना के बाद प्रदेश सबसे ऊपर

वनाधिकार कानून को लागू करने और इसकी निगरानी की मुख्य जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, जबकि केंद्रीय मंत्रालय राज्यों से मिलने वाली रिपोर्ट को संकलित करता है। आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में वर्तमान में 10,45,970 दावे लंबित हैं और 18,13,232 आवेदन निरस्त किए जा चुके हैं। देशभर में सर्वाधिक 3,29,367 लंबित दावों के साथ तेलंगाना पहले स्थान पर है, जबकि 2,73,457 लंबित मामलों के साथ मध्यप्रदेश देश में दूसरे नंबर पर बना हुआ है।


मंगलवार, 16 जून 2026

कांग्रेस प्रभारियों की परंपरा रही समाधान कम, विवाद ज्यादा

गुटीय संघर्ष, असंतोष और आरोपों के बीच हुआ कार्यकालों का अंत


भोपाल। प्रदेश कांग्रेस में संगठन को धार देने और अंदरूनी कलह को शांत करने के इरादे से दिल्ली से भेजे जाने वाले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रभारी खुद विवादों के भंवर में फंसते रहे हैं। सूबे के कद्दावर क्षत्रपों के साथ तालमेल बिठाने में नाकाम रहे ये नेता कई बार खुद ही नई गुटबाजी की वजह बन गए। इसके बाद प्रदेष से उनकी विदाई भी होती रही है।
प्रदेश कांग्रेस की राजनीति का मिजाज ऐसा है कि यहां दिल्ली का रौब नहीं, बल्कि स्थानीय क्षत्रपों के साथ सामंजस्य काम आता है। जब-जब प्रभारियों ने अपनी मर्जी थोपने या दिग्गजों को बाईपास करने की कोशिश की, संगठन मजबूत होने के बजाय खुद प्रभारी ही विवादों की भेंट चढ़ गए। वर्तमान प्रभारी हरीश चौधरी से लेकर बी.के. हरिप्रसाद तक, इतिहास गवाह है कि जिसने भी यहां के सियासी दिग्गजों से सीधे टकराने या उन्हें नजरअंदाज करने की कोशिश की, उसे अपमानजनक कड़वे अनुभवों के साथ विदा होना पड़ा। हाल ही में राज्यसभा चुनाव की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होना वर्तमान प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी के लिए संकट खड़ा करता नजर आ रहा है।
नए-पुराने नेताओं के बीच नहीं बन सके सेतु
वर्तमान प्रभारी हरीश चौधरी को सूबे में नए और पुराने नेताओं के बीच सेतु बनने की जिम्मेदारी मिली थी, लेकिन राज्यसभा चुनाव ने उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। चुनाव के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन तकनीकी खामियों के चलते रद्द हो गया। इस सियासी संकट पर जब पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भोपाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे, तब हरीश चौधरी ने उन्हें बीच में ही टोकते हुए रूखे लहजे में कहा हम संभाल लेंगे। भरे मीडिया के सामने इस बर्ताव से आहत दिग्विजय सिंह ने हाथ जोड़ लिए और आगे कुछ भी बोलने से मना कर दिया। सरेआम टोकने की इस सियासत का वीडियो वायरल होते ही प्रभारी और सीनियर लीडरशिप का मनमुटाव एक बार फिर सड़क पर आ गया है।
टिकट वितरण की आग और अधिकारों की जंग
साल 2023 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जेपी अग्रवाल को हटाकर अचानक रणदीप सिंह सुरजेवाला को कमान सौंपी गई थी। सुरजेवाला का पूरा कार्यकाल टिकट वितरण में मचे घमासान और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के साथ अधिकार क्षेत्र की लड़ाई में बीता। टिकट कटने से नाराज कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ कमलनाथ और दिग्विजय के बंगलों बल्कि सुरजेवाला के सामने भी प्रदर्शन किया। चुनाव में कांग्रेस की करारी हार का ठीकरा केंद्रीय रणनीति और प्रभारी की कार्यप्रणाली पर फूटा, जिसके बाद आलाकमान को उन्हें हटाना पड़ा।
गुटबाजी के आगे मूकदर्शक बने रहे दिल्ली के नुमाइंदे
सुरजेवाला से पहले जेपी अग्रवाल प्रभारी थे। उनके कार्यकाल में संगठन के भीतर समन्वय का घोर अभाव दिखा। अग्रवाल पर आरोप लगे कि वे कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे बड़े क्षत्रपों के फैसलों के आगे महज मूकदर्शक बने रहे। वे जमीनी कार्यकर्ताओं और जिला प्रभारियों की शिकायतों को आलाकमान तक सही ढंग से पहुंचा ही नहीं पाए। संगठन में निष्क्रियता और गुटबाजी न रोक पाने के कारण चुनाव से ऐन पहले उन्हें पद से मुक्त कर दिया गया।
असंतोष की आग को भांपने में रहे नाकाम, गंवा दी सरकार
मुकुल वासनिक का कार्यकाल प्रदेश कांग्रेस के इतिहास के सबसे बड़े सियासी भूकंप का गवाह बना। उनके समय ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ-दिग्विजय गुट के बीच टकराव चरम पर था। सिंधिया समर्थकों का सीधा आरोप था कि प्रभारी रहते हुए वासनिक ने उनके गुट की उपेक्षा की और कमलनाथ सरकार के समय उपजे असंतोष को समय रहते हल नहीं किया। इसी अनदेखी का नतीजा 2020 में कांग्रेस सरकार गिरने के रूप में सामने आया।
चहेतों को उपकृत करने के आरोप
मोहन प्रकाश का कार्यकाल सबसे लंबा और ज्यादा गुटीय खींचतान वाला रहा। दिग्विजय, कमलनाथ और सिंधिया के बीच की अंदरूनी कलह को रोकने में वे नाकाम रहे। उन पर दिल्ली के समीकरणों के तहत चुनिंदा गुटों को शह देने के आरोप लगे। चुनावों में जमीनी नेताओं को नजरअंदाज कर पैराशूट उम्मीदवारों को टिकट देने के कारण उनके खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। तत्कालीन अध्यक्ष अरुण यादव से भी उनकी पटरी नहीं बैठी। आखिरकार, लगातार हो रहे विरोध के चलते  उन्हें हटाया गया।
कद्दावर नेताओं से पटरी न बैठने और बयानों ने बिगाड़ा खेल
गुजरात से आए दीपक बावरिया को राहुल गांधी का करीबी माना जाता था। 2018 के चुनाव से पहले आए बावरिया की कमलनाथ और सिंधिया से कभी पटरी नहीं बैठी। जब सूबे में कांग्रेस सरकार बनी, तब भी वे विवाद नहीं संभाल पाए। सिंधिया ने जब द्वारा अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने की चेतावनी दी और कमलनाथ ने तो उतर जाएं कहा, तब बावरिया इस तनाव को संभालने में पूरी तरह विफल रहे। इस खींचतान के बाद कद्दावर नेताओं की नाराजगी के कारण उन्हें हटा दिया गया।

शुक्रवार, 5 जून 2026

कांग्रेस में दिग्गज युग के अंत की शुरुआत !

संगठन के प्रति समर्पण तय करेगा नेताओं का सियासी कद  


भोपाल। प्रदेश कांग्रेस में दशकों से चली आ रही सल्तनत वाली सियासत और क्षत्रपों के एकाधिकार पर आखिरकार दिल्ली दरबार ने आखिरी कील ठोक दी है। दिग्विजय सिंह की खाली हो रही राज्यसभा सीट पर पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन की ताजपोशी महज एक चुनावी फैसला नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश कांग्रेस में दिग्गज युग के अंत का खुला ऐलान है। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि अब पार्टी में रसूख की नहीं, बल्कि खामोश निष्ठा की कद्र होगी।

प्रदेश  कांग्रेस का इतिहास गवाह है कि यहां टिकट से लेकर सांगठनिक नियुक्तियों तक, सब कुछ बड़े नेताओं के कोटे से तय होता था। इस बार भी दिग्विजय सिंह की सीट खाली होते ही पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, अरुण यादव केे खेमे अपने-अपने गोटियां बैठा रहे थे। दिल्ली में डेरे डाले गए, रसूख का वास्ता दिया गया और अंदरूनी तौर पर दबाव की राजनीति का पुराना नुस्खा आजमाया गया, लेकिन, राहुल गांधी की नई रणनीति ने इस पूरे गुटीय चक्रव्यूह को एक झटके में ध्वस्त कर दिया। मठाधीश देखते रह गए और बिना किसी तामझाम के, जमीन पर काम करने वाली मीनाक्षी नटराजन बाजी मार ले गईं।

बंद कमरे की राजनीति के दिन लदे, अब काम ही कसौटी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला उन नेताओं के चेहरे पर करारा तमाचा है जो जनता और कार्यकर्ताओं से कटकर सिर्फ बंद कमरों में रणनीति बनाते हैं। मीनाक्षी नटराजन का चयन यह संदेश देता है कि अब दिल्ली दरबार के चक्कर काटने से कोई नेता बड़ा नहीं बनेगा। भारत जोड़ो यात्रा से लेकर वैचारिक अभियानों तक, जिन्होंने बिना किसी शोर-शराबे और मीडिया चमकाने के संगठन का झंडा उठाए रखा, नेतृत्व अब केवल उन्हीं पर दांव खेलेगा।

बदलाव का कड़ा संदेश

मध्यप्रदेश  कांग्रेस में अब कोटा सिस्टम और नेताओं की जी-हुज़ूरी का दौर खत्म हो चुका है। अब नेता की पहचान उसके गुट से नहीं, बल्कि राहुल गांधी की कसौटी पर उसकी सांगठनिक वफादारी से होगी। इस अप्रत्याशित फैसले ने मप्र कांग्रेस की पूरी आंतरिक कुंडली बदल दी है। दिग्गजों को दरकिनार कर हाईकमान ने साफ कर दिया है कि 2028 के विधानसभा चुनाव की बिसात नए चेहरों और नई ऊर्जा के साथ बिछाई जाएगी। पुराने चेहरे जो अब पार्टी के लिए श्एसेटश् कम और लायबिलिटी ज्यादा बन चुके हैं, उन्हें कड़ा संदेश है कि या तो वे अपनी जमीन सुधारें या फिर नेपथ्य में जाने के लिए तैयार रहें। मप्र कांग्रेस की इस नई शुरुआत ने सूबे के बड़े नेताओं की नींद उड़ा दी है, क्योंकि खामोश निष्ठा का यह नया पैमाना कई बड़े सियासी गढ़ों को ढहाने वाला साबित होने जा रहा है।


बुधवार, 3 जून 2026

आदिवासियों के सहारे सत्ता की खोई चाबी ढूंढने में जुटी कांग्रेस

मालवा-निमाड़ में खोई जमीन वापस पाने पटवारी, चौधरी ने संभाली कमान

भोपाल। प्रदेश की सियासत में एक पुरानी और बेहद सटीक कहावत है जिसने मालवा जीता, सत्ता उसके कदम चूमती है। पिछले चुनाव में इसी अंचल में करारी शिकस्त झेलने के बाद अब कांग्रेस अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने के लिए पूरी ताकत से जुट गई है। पार्टी ने इस बार अपनी चुनावी और संगठनात्मक रणनीति के केंद्र में मालवा-निमाड़ अंचल की 22 अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीटों को रखा है। 

कांग्रेस का मानना है कि आदिवासियों का भरोसा जीतकर ही प्रदेश की सत्ता का ताला दोबारा खोला जा सकता है। इसी रणनीति के तहत इन दिनों मालवा-निमाड़ के अलग-अलग जिलों में कांग्रेस के विशेष प्रशिक्षण शिविरों का दौर चल रहा है। संगठन में नई जान फूंकने के लिए खुद प्रदेश कांग्रेस प्रभारी हरीश चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मैदानी मोर्चा संभाला है। राजनीतिक दृष्टि से मालवा-निमाड़ क्षेत्र प्रदेश का सबसे बड़ा पॉवर सेंटर माना जाता है। 

आदिवासी मतदाता की सरकार बनाने में अह्म भूमिका

इस अंचल में कुल 66 विधानसभा सीटें आती हैं। इन 66 सीटों में से 22 सीटें अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं, जिनमें से 17 सीटें विशुद्ध रूप से कोर आदिवासी बेल्ट का हिस्सा हैं। इतिहास गवाह है कि इस अंचल का आदिवासी मतदाता जिस भी दल के साथ खड़ा हुआ, प्रदेष में उसी की सरकार बनी। पिछले दो दशकों में कांग्रेस का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन 2018 में रहा था, जब पार्टी ने इस अंचल की 66 में से 38 सीटें जीती थीं। उस समय इस सफलता का मुख्य आधार यही आदिवासी सीटें थीं, जहां कांग्रेस ने 12 सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज की थी और कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनाई थी।

कब किसके पाले में गईं आदिवासी सीटें

पिछले चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि मालवा-निमाड़ अंचल की 17 मुख्य आदिवासी सीटों पर दोनों दलों के बीच कैसी कांटे की टक्कर रही है।  आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 17 सीटों में से भाजपा को 2003 में 12 और कांग्रेस को 5 सीटें हासिल हुई। इसी तरह 2008 में भाजपा को 11 कांग्रेस को 6, 2013 में भाजपा को 15 और कांग्रेस को 2 सीटें हासिल हुई। जबकि 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 5 और कांग्रेस को 12 सीटें हासिल हुई। इस बार इन्हीं सीटें के बल पर कांग्रेस ने कमलनाथ के नेतृत्व में सरकार बनाई। इसके बाद 2023 के चुनाव में भाजपा को 9 और कांग्रेस को 7 सीटें हासिल हुई। जबकि एक सीट पर बाप पार्टी के कमलेष्वर डोडियार को जीत हासिल हुई थी। 


प्रशिक्षण शिविरों के जरिए कार्यकर्ताओं को नया रोडमैप

2023 के चुनाव में भाजपा ने अंचल की 66 में से 48 सीटें जीतकर कांग्रेस (18 सीटें) को बैकफुट पर धकेल दिया था। इस हार से सबक लेते हुए जीतू पटवारी और हरीश चौधरी की जोड़ी अब ब्लॉक, मंडल और नगर अध्यक्षों को सीधे तौर पर प्रशिक्षित कर रही है। इन शिविरों के जरिए कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए जा रहे हैं कि जल, जंगल, जमीन और स्थानीय आदिवासी मुद्दों पर सरकार को घेरना, बूथ स्तर पर निष्क्रिय चेहरों को हटाकर आक्रामक और युवा कार्यकर्ताओं को आगे लाना, अंचल में उभरती हुई भारत आदिवासी पार्टी जैसी ताकतों के बीच अपने पारंपरिक आदिवासी वोट बैंक को बिखरने से रोकना है। 


मंगलवार, 3 मार्च 2026

 गोंगपा में ’विद्रोह’ की आहट, क्या बिखर जाएगा दादा हीरा सिंह मरकाम का सपना?

प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तेकाम को हटाने के लिए नेतृत्व को 9 मार्च तक का अल्टीमेटम, 22 मार्च को सामूहिक इस्तीफे की चेतावनी

राजेन्द्र पाराशर

भोपाल। मध्यप्रदेश में आदिवासियों की अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) एक बार फिर गहरे राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ी है। पार्टी के भीतर असंतोष की आग इस कदर भड़क चुकी है कि महाकौशल क्षेत्र के दिग्गज नेताओं ने वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तेकाम के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया है।

बीते 2 मार्च को सिवनी जिले की छपारा तहसील स्थित बंजारी हॉल में एक महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। 6 घंटे तक चली इस मैराथन बैठक में सिवनी, छिंदवाड़ा, बैतूल, बालाघाट और मंडला सहित कई जिलों के वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हुए। बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर प्रदेश अध्यक्ष कमलेश तेकाम की कार्यप्रणाली पर ’अविश्वास’ जताया गया। पदाधिकारियों का सीधा आरोप है कि तेकाम पार्टी संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं। बिना जिला और ब्लॉक इकाइयों की सहमति के नियुक्तियां करना और विरोध करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को निष्कासन की धमकी देना उनके ’तानाशाही’ रवैये को दर्शाता है।

मांगें नहीं मानी तो होगा सामूहिक इस्तीफा

विद्रोही गुट ने राष्ट्रीय अध्यक्ष विधायक तुलेश्वर मरकाम और राष्ट्रीय महासचिव श्याम सिंह मरकाम के सामने दो टूक मांगें रखी हैं। 9 मार्च 2026 तक कमलेश तेकाम को प्रदेश अध्यक्ष पद से तत्काल मुक्त किया जाए। छिंदवाड़ा या सिवनी के किसी अनुभवी नेता को सर्वसम्मति से नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया जाए। नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि 9 मार्च तक फैसला नहीं हुआ, तो 22 मार्च 2026 को सिवनी जिला मुख्यालय में एक विशाल सम्मेलन कर हजारों कार्यकर्ता सामूहिक इस्तीफा दे देंगे। इसके बाद पार्टी के संस्थापक दादा हीरा सिंह मरकाम के सपनों को पूरा करने के लिए एक नई राजनीतिक दिशा तय की जाएगी।

 2003 के शिखर से पतन की ओर

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का यह अंतर्कलह नया नहीं है, लेकिन इसने समर्थकों की चिंता बढ़ा दी है। गौर करने वाली बात है कि स्वर्ण काल साल 2003 के विधानसभा चुनाव में गोंगपा ने प्रदेश की राजनीति में तहलका मचा दिया था, जब उसके 3 विधायक निर्वाचित हुए थे। उस समय पार्टी राज्य में एक तीसरी शक्ति के रूप में उभरी थी। 2003 की उस बड़ी जीत के बाद से ही पार्टी लगातार आंतरिक गुटबाजी और बिखराव का शिकार रही है। समय-समय पर पार्टी कई धड़ों में विभाजित हुई, जिसका सीधा असर इसके जनाधार पर पड़ा। कभी सत्ता की चाबी अपने पास रखने का माद्दा रखने वाली पार्टी आज अपनों के ही विरोध के कारण अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही है। यदि पार्टी आलाकमान ने 9 मार्च तक इस विद्रोह को शांत नहीं किया, तो 22 मार्च का दिन गोंगपा के इतिहास में एक और बड़े विभाजन के रूप में दर्ज हो सकता है।


शनिवार, 31 जनवरी 2026

कांग्रेस को अब ’सुर’ और ’साज’ वाले योद्धाओं की तलाश

वक्ता, लेखक और वादकों के लिए खुला प्रदेश कांग्रेस का द्वार

मध्यप्रदेश कांग्रेस इस बार अपने संगठन को एक नए और रचनात्मक अवतार में ढालने की तैयारी कर रही है। पार्टी अब ऐसे कर्मठ लोगों की तलाश में है जो चुनावी राजनीति की आपाधापी से दूर रहकर अपनी कला के जरिए संगठन को मजबूती दे सकें। इसके लिए बाकायदा एक ’टैलेंट हंट’ अभियान शुरू किया जा रहा है, जिसमें गायकों, वादकों और साहित्यकारों को तरजीह दी जाएगी।
कांग्रेस इस बार साहित्य और कला की विधाओं के जरिए जनता तक अपनी विचारधारा पहुंचाना चाहती है। पार्टी को ऐसे हुनरमंदों की तलाश है जिनकी आवाज में जादू हो और जो वाद्य यंत्र (म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट) बजाना जानते हों। इसके अलावा लेखन में माहिर, कवि, शायर, और चुटीले मुहावरे गढ़ने वाले लोगों को भी संगठन से जोड़ा जाएगा। पार्टी का मानना है कि जो लोग बेहतर नारे लिख सकते हैं और मंच का शानदार संचालन कर सकते हैं, वे संगठन की सबसे बड़ी ताकत बनेंगे।
चुनावी महत्वाकांक्षा से दूरी अनिवार्य
इस टैलेंट सर्च की सबसे प्रमुख शर्त यह है कि आवेदन करने वाले व्यक्ति चुनावी महत्वाकांक्षा से दूर हों। पार्टी ऐसे निस्वार्थ चेहरों को आगे लाना चाहती है, जो पूरी तरह से रचनात्मक कार्यों और संगठन के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित रहें। पार्टी चाहती है कि ये लोग केवल संगठन की मजबूती और रचनात्मक कार्यों के लिए समर्पित रहें। पार्टी इन विधाओं के माहिर लोगों की प्रतिभा का लाभ चुनावी प्रचार और जनसंपर्क में लेना चाहती है। इस अनूठे अभियान को फरवरी माह के भीतर ही पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।  अभियान की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश कांग्रेस ने दो दिग्गज पदाधिकारियों को इसकी कमान सौंपी है। वरिष्ठ उपाध्यक्ष महेंद्र जोशी और प्रदेश प्रभारी (मतदाता सूची पुनरीक्षण) ललित सेन को चयन की जिम्मेदारी दी गई है।
सोशल मीडिया और विचारधारा की होगी परीक्षा
पार्टी केवल आवेदन लेकर ही संतुष्ट नहीं होगी, बल्कि आवेदकों की गहरी छानबीन के लिए एक विशेष कमेटी बनाई गई है। यह कमेटी दो मुख्य पैमानों पर काम करेगी। इंटरव्यू के माध्यम से यह परखा जाएगा कि आवेदक कांग्रेस की विचारधारा से कितना मेल खाता है। कमेटी आवेदकों के सोशल मीडिया अकाउंट्स खंगालेगी। इसमें यह देखा जाएगा कि आवेदक अपनी विधा (जैसे गायन या लेखन) से संबंधित क्या कंटेंट पोस्ट करता है और उस पर जनता का रिस्पॉन्स कैसा है। साथ ही, उसके राजनीतिक पोस्ट की रीच (पहुंच) और कंटेंट के स्तर का भी बारीकी से मूल्यांकन होगा।
पांच फरवरी तक मंगवाए आवेदन
प्रदेश संगठन महामंत्री संजय कामले द्वारा जारी पत्र के अनुसार, सभी जिला और शहर अध्यक्षों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने क्षेत्रों से योग्य प्रतिभाओं के आवेदन 5 फरवरी तक प्रदेश कांग्रेस कार्यालय भिजवाएं। जिला अध्यक्षों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे अपने क्षेत्रों में इसका व्यापक प्रचार-प्रसार करें ताकि छुपी हुई प्रतिभाएं सामने आ सकें।

रविवार, 25 जनवरी 2026

 कलम, कला और कर्म का त्रिवेणी संगम, प्रदेश की तीन विभूतियों को पद्मश्री

साहित्य के शिखर कैलाश चंद्र पंत, सागर के मार्शल आर्ट गुरु भगवानदास रैकवार और समाजसेवी मोहन नागर का हुआ चयन

भोपाल। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत सरकार ने वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित ’पद्म पुरस्कारों’ की घोषणा कर दी है। इस वर्ष मध्य प्रदेश की झोली में तीन पद्मश्री सम्मान आए हैं। प्रदेश का नाम रोशन करने वाली इन हस्तियों में भोपाल के प्रख्यात लेखक व वरिष्ठ पत्रकार कैलाश चंद्र पंत, सागर के बुंदेली कला को लुप्त होने से बचाने वाले कलाकार भगवानदास रैकवार और मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष मोहन नागर शामिल हैं। नागर को पर्यावरण के क्षेत्र में किए कार्य के लिए यह सम्मान मिला है। 


विशेष रूप से, साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में कैलाश चंद्र पंत के चयन को समूचे हिंदी जगत के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। उन्हें ’अनसंग हीरोज’ (अनाम नायक) श्रेणी में यह सम्मान दिया गया है। 89 वर्षीय कैलाश चंद्र पंत का जीवन हिंदी भाषा और राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित रहा है। 26 अप्रैल 1936 को महू (इंदौर) में जन्मे पंत का पैतृक नाता उत्तराखंड से है। उन्होंने हिंदी के प्रति अपने अनुराग के कारण सरकारी नौकरी का मोह त्याग दिया और स्वतंत्र पत्रकारिता की राह चुनी। उन्होंने 22 वर्षों तक साप्ताहिक ’जनधर्म’ का प्रकाशन किया। उनका स्थायी कॉलम ’’’चलती चक्की’’’ देश भर के साहित्यकारों और पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय था। भोपाल में ’हिंदी भवन’ और ’किसान भवन’ को एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने में उनकी निर्णायक भूमिका रही है। उन्होंने महू में ’स्वाध्याय विद्यापीठ’ की स्थापना कर शिक्षा के क्षेत्र में भी अलख जगाई। उनके द्वारा रचित ’कौन किसका आदमी’ और ’धुंध के आर-पार’ जैसी कृतियाँ साहित्य जगत की अनमोल धरोहर मानी जाती हैं। पंत को साहित्य भूषण, निराला साहित्य सम्मान, संस्कृति गौरव और बृजलाल द्विवेदी सम्मान से भी नवाजा गया है। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति (वर्धा) के राष्ट्रीय संयोजक के रूप में हिंदी का वैश्विक प्रचार में उनकी अह्म भूमिका रही है।  वर्ष 1995 में भोपाल में नागरिक अभिनंदन किया गया और ’मालवांचल में कूर्मांचल’ ग्रंथ का संपादन।
पारंपरिक कलाओं को लुप्त होने से बचाया

बुंदेली लोक कला और पारंपरिक युद्ध कौशल के संरक्षण में अपना संपूर्ण जीवन होम करने वाले भगवानदास रैकवार को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया गया है। भारत सरकार ने उन्हें ’गुमनाम नायकों’ की श्रेणी में चुना है। यह उन व्यक्तित्वों का समूह है जिन्होंने बिना किसी प्रचार-प्रसार की आकांक्षा के समाज और संस्कृति की निस्वार्थ सेवा की। 2 जनवरी 1944 को सागर की पावन धरा पर स्वर्गीय गोरेलाल रैकवार के आंगन में जन्मे भगवानदास  बुंदेलखंड की उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं, जहाँ शौर्य और कला का अद्भुत संगम मिलता है। रैकवार ने न केवल बुंदेली माटी की अखाड़ा संस्कृति और पारंपरिक युद्ध कलाओं को लुप्त होने से बचाया, बल्कि उन्होंने प्राचीन शस्त्रों के संचालन की कला को जीवित रखा, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और बुंदेली लोक नृत्यों के मूल स्वरूप को संरक्षित किया।

जल और पर्यावरण के अघोषित दूत मोहन नागर


जमीनी स्तर पर समर्पित पर्यावरण योद्धा मोहन नागर को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित ’पद्मश्री’ सम्मान से नवाजे जाने की घोषणा हुई है। जल संरक्षण और पर्यावरण चेतना के प्रति उनके दशकों के अथक परिश्रम को केंद्र सरकार ने सर्वोच्च मान्यता दी है, जिससे संपूर्ण प्रदेश गौरवान्वित है। 23 फरवरी 1968 को जन्मे मोहन नागर (पुत्र स्व. भवरलाल नागर एवं स्व. गुलाबदेवी नागर) ने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की शिक्षा विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से प्राप्त की। हालाँकि, उनका मन सत्ता की राजनीति के बजाय प्रकृति की सेवा में अधिक रमा। उन्होंने बैतूल जिले की सोना घाटी में वर्षा जल संचयन और नवीन जल संरचनाओं के निर्माण के माध्यम से एक मृतप्राय प्राकृतिक जल चक्र को पुनर्जीवित कर दिखाया। नागर वर्तमान में मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष है। मध्यप्रदेश स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड के सदस्य और नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर के प्रबंधन मंडल में भी है।

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

सेवानिवृत्ति वाले बयान से वरिष्ठ नेताओं की बढ़ी चिंता

संघ प्रमुख के बयान से उम्र दराज नेता हो रहे  असहज 


भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत द्वारा 75 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्ति को लेकर दिए गए बयान से मध्यप्रदेश भाजपा में सियासी हलचल तेज हो गई है। भागवत के इस बयान को लेकर पार्टी के कई वरिष्ठ नेता असहज नजर आ रहे हैं। कुछ नेताओं ने इसे आदर्श बताया है तो कुछ ने इसे अव्यवहारिक बताया है। प्रदेश में करीब एक दर्जन नेता ऐसे हैं, जो या तो इस उम्र सीमा में आ चुके हैं या जल्द पहुंचने वाले हैं, ऐसे में उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया ने भागवत के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “सिर्फ उम्र के आधार पर किसी वरिष्ठ नेता को दरकिनार करना उचित नहीं है। कई बार अनुभव युवाओं से कहीं ज्यादा उपयोगी साबित होता है। वहीं नर्मदापुरम विधायक और भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. सीतासरन शर्मा ने संघ प्रमुख के बयान को सराहनीय बताया। उन्होंने कहा कि एक तय उम्र के बाद नेताओं को खुद पहल करते हुए युवाओं को अवसर देना चाहिए। अगर पार्टी कहेगी, तो मैं खुद इस्तीफा देने को तैयार हूं। वहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा ने बयान को अनुचित बताते हुए कहा कि “अगर कोई नेता 75 की उम्र के बाद भी सक्रिय रूप से पार्टी के लिए कार्य कर रहा है, तो उसे रिटायर करना तर्कसंगत नहीं है। योग्यता और क्षमता को भी महत्व देना चाहिए। वैसे देखा जाए तो संघ प्रमुख के बयान के बाद पार्टी नेतृत्व के सामने चुनौती है कि वह उम्र और अनुभव के संतुलन को कैसे साधे। भविष्य की राजनीति में युवाओं की भूमिका और वरिष्ठों की भागीदारी पर भाजपा की नीति अब नए मोड़ पर है।
चंद नेताओं पर लागू हुआ है उम्र का पैमाना
भाजपा में इससे पहले भी 75 की उम्र पार कर चुके नेताओं को किनारे किया गया है। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर, पूर्व मंत्री सरताज सिंह, पूर्व मंत्री कुसुम महदेले और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन जैसे नेताओं को उम्र के आधार पर चुनाव में टिकट नहीं दिया गया था। हालांकि, यह नियम सभी पर समान रूप से लागू नहीं किया गया।
ये नेता हैं 75 पार या नजदीक
मध्यप्रदेश में फिलहाल कई विधायक और नेता इस उम्र सीमा में हैं या अगले चुनाव तक पहुंच जाएंगे। इनमें  75 पारः नागेंद्र सिंह (गुढ़), नागेंद्र सिंह (नागोद), जयंत मलैया (दमोह), डॉ. सीतासरन शर्मा (होशंगाबाद), बिसाहूलाल सिंह (अनूपपुर), सत्यनारायण जटिया (उज्जैन) है। जबकि निकट भविष्य में 75 के करीबः गोपाल भार्गव (रहली), विश्वनाथ सिंह पटेल (तेदूखेड़ा), अजय विश्नोई (पाटन), रमाकांत भार्गव (बुधनी), ढाल सिंह बिसेन, गौरीशंकर बिसेन।

बुधवार, 9 जुलाई 2025

फिर दिखेगा बड़ा प्रशासनिक फेरबदल

जैन को नही मिली सेवावृद्धि तो नए मुख्य सचिव के लिए दौड़ होगी तेज


भोपाल। मध्यप्रदेश में अगले महीने एक बार फिर बड़ा प्रशासनिक फेरबदल देखने को मिल सकता है। मौजूदा मुख्य सचिव अनुराग जैन और अपर मुख्य सचिव जेएन कंसोटिया अगस्त में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में यदि जैन को सेवावृद्धि नहीं मिली, तो प्रदेश को नया मुख्य सचिव मिलेगा और इसके लिए वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों की दौड़ शुरू हो जाएगी।
मुख्य सचिव अनुराग जैन ने 1 अक्टूबर 2024 को कार्यभार संभाला था। जैन की सेवावृद्धि को लेकर चर्चाएं तेज हैं, लेकिन अंतिम फैसला केंद्र की अनुमति और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सहमति से ही होगा। अगर सेवावृद्धि नहीं होती है, तो मुख्यमंत्री सचिवालय में अपर मुख्य सचिव रहे डा राजेश राजौरा सबसे वरिष्ठ दावेदार होंगे।  इसी के साथ केंद्र सरकार में सचिव पद पर कार्यरत वरिष्ठ आईएएस अलका उपाध्याय ने भी प्रदेश लौटने में रुचि दिखाई है। पशुपालन विभाग में सचिव के रूप में पदस्थ अलका बीते दो माह में मध्यप्रदेश के कई दौरों पर रही हैं, जिससे उनके सक्रिय होने के संकेत मिलते हैं। ऐसे में राजौरा के साथ अलका उपाध्याय भी मुख्य सचिव की दौड़ में मानी जा रही हैं।
सेवावृद्धि पर केंद्र और मुख्यमंत्री की सहमति जरूरी
मुख्य सचिव की सेवा वृद्धि का फैसला पूरी तरह केंद्र सरकार की अनुमति और मुख्यमंत्री की सहमति पर निर्भर है। जैन को सेवा विस्तार नहीं मिलने की स्थिति में नए मुख्य सचिव की घोषणा अगस्त के पहले सप्ताह में हो सकती है।
गुप्ता होंगे 31 को सेवानिवृत्त
उज्जैन संभागायुक्त और धर्मस्व विभाग के प्रमुख संजय गुप्ता इसी माह 31 जुलाई को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। गुप्ता के सेवानिवृत्त होते ही मुख्यमंत्री के गृह जिले उज्जैन में नए संभागायुक्त की पदस्थापना की जाएगी। इसके लिए भी वरिष्ठ अफसरों के नामों पर मंथन शुरू हो गया है।

रविवार, 29 जून 2025

शिवराज के साथ मुख्यमंत्री निवास पहुंचे आदिवासी

मुख्यमंत्री के निर्देश पर हटाए गए सीहोर के डीएफओ


भोपाल। प्रदेश के खिवनी अभयारण्य का मामला गर्मा गया है। आदिवासियों को पट्टे से किए जा रहे बेदखली के मामले में कांग्रेस और जयस ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा हैं, वहीं आज केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ प्रभावित आदिवासियों के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री डा मोहन यादव से मुलाकात की। इसके बाद मुख्यमंत्री ने मामले को लेकर सीहोर के डीएफओ को हटाने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने आदिवासियों को आश्वस्त पूरे मामले की जांच कराई जाएगी।
देवास जिले के खातेगांव विधानसभा क्षेत्र के खिवनी अभयराण्य क्षेत्र के आदिवासियों के घर तोड़े जाने के मामले पर आदिवासी समाज का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। बीते 23 जून को खिवनी में वन विभाग ने आदिवासियों के 50 से ज्यादा घरों पर बुल्डोजर चला दिया था। इस घटना को लेकर आदिवासी संगठन जयस और कांग्रेस सरकार पर हमलावर है। जयस और कांग्रेस नेताओं का प्रदर्शन जारी है। वहीं आज केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खिवनी के आदिवासियों के प्रतिनिधिमंडल के साथ मुख्यमंत्री डा मोहन यादव से मुलाकात की और आदिवासियों की समस्याओं से अवगत कराया।
सरकार प्रभावितों के साथ
मुख्यमंत्री डा यादव ने शिकायतों और आदिवासियों की पीड़ा को सुना। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कार्रवाई पर खेद व्यक्त करते हुए, स्थिति का उचित समाधान निकालने, शिकायतों की जांच करवाने, दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्यवाही करने और क्षेत्र के लोगों को सभी शासकीय योजनाओं का लाभ दिलवाने का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री  ने कहा कि राज्य सरकार प्रभावितों के साथ है। यह सुनिश्चित किया जाएगा की बरसात में किसी को कोई तकलीफ ना हो, राहत के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं की जांएगी।
डीएफओ का हटाया
आदिवासियों को वन क्षेत्र की जमीन से हटाने की करवाई से भड़के केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की नाराजगी के बाद मुख्यमंत्री डा मोहन यादव के निर्देश पर रविवार को सीहोर वन मंडल के वन मंडलाधिकारी (डीएफओ) मगन सिंह डाबर को हटा दिया गया है। उनकी जगह लघुवानोपज संघ की उप वन संरक्षक अर्चना पटेल को सीहोर डीएफओ बनाया गया है।
अधिकारी कर रहे सरकार की छवि खराब करने का काम
सीहोर कलेक्ट्रेट सभागार में शनिवार को हुई दिशा की बैठक के दौरान सैकड़ों की संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग शिवराज सिंह चौहान से मिलने पहुंचे थे। आदिवासियों का आरोप था कि खिवनी अभयारण्य क्षेत्र में वन विभाग के अधिकारियों द्वारा आदिवासियों के मकान तोड़ने और जमीन से बेदखल करने की कार्रवाई की गई है, जिस पर केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान अधिकारियों पर भड़क गए। शिवराज सिंह ने कहा था कि वन विभाग के अधिकारी सरकार की छवि को खराब करने का काम कर रहे हैं। इसके चलते इस तरह की कार्रवाई की जा रही है।
शाह को लेना पड़ा ट्रैक्टर टाली का सहारा
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर मंत्री विजय शाह रविवार को खिवनी गांव पहुंचे। इसके लिए उन्हें कई किमी तक पैदल चलना पड़ा। कीचड़ भरे रास्तों से होते हुए मंत्री विजय शाह किसी तरह गांव पहुंचे और प्रभावितों से बातचीत की। वनवासियों से मुलाकात करने के बाद उन्हें वापस लौटने के लिए ट्रैक्टर ट्रॉली में बैठना पड़ा।

मातृ-शिशु मृत्युदर पर उठाए सवाल, मुख्यमंत्री को लिखा पत्र

करोड़ों  खर्च के बावजूद प्रदेश में नतीजे शून्य


भोपाल। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मध्यप्रदेश में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में सुधार न होने पर सरकार को घेरा है। उन्होंने हाल ही में जारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि प्रदेश की स्थिति देश में सबसे खराब है, जबकि सरकार इस दिशा में हजारों करोड़ खर्च कर चुकी है।
पटवारी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिख सवाल किया कि जब सरकार ने बीते पांच वर्षों में मातृ-शिशु स्वास्थ्य पर दस हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए, तब भी नतीजे निराशाजनक क्यों हैं? उन्होंने कटाक्ष करते हुए पूछा कि क्या यह पैसा सिर्फ चाय-नाश्ते और चर्चाओं पर खर्च किया गया? एसआरएस की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में हर 1000 में से 40 नवजात एक वर्ष का होने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। पटवारी ने कहा कि 4500 करोड़ रुपए के वार्षिक स्वास्थ्य बजट के बावजूद यदि यह हाल है, तो यह दर्शाता है कि ‘कागजी विकास’ ही हो रहा है। उन्होंने कैग रिपोर्टों में उजागर कुपोषण से जुड़े घोटालों की भी पत्र में चर्चा की है।
अस्पतालों को बना दिया रेफरल सेंटर?
पटवारी ने स्वास्थ्य अधोसंरचना पर सवाल उठाते हुए बताया कि 2022 में राज्य के 547 स्वास्थ्य केंद्रों में से सिर्फ 120 में सिजेरियन डिलीवरी की सुविधा उपलब्ध थी। उन्होंने पूछा कि क्या शेष अस्पताल सिर्फ नाम मात्र के हैं या उन्हें केवल ’रेफरल सेंटर’ बनाकर छोड़ दिया गया है? उन्होंने अंत में पूछा कि क्या “स्वस्थ मध्यप्रदेश” सरकार की प्राथमिकता में है, या फिर यह सिर्फ भाषणों और विज्ञापनों का एक सपना बनकर रह गया है?

शनिवार, 28 जून 2025

भाजपा को जल्द मिलेगा नया प्रदेश अध्यक्ष, दौड़ में शामिल हुए उईके भी

महिला नेतृत्व की भी संभावना, वर्गवार कई दावेदार हैं दौड़ में


भोपाल। मध्यप्रदेश में भाजपा को जल्द ही नया प्रदेश अध्यक्ष मिलने जा रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, अध्यक्ष पद के नाम की घोषणा जुलाई के पहले सप्ताह में होने की संभावना है। प्रदेश अध्यक्ष चयन की प्रक्रिया के तहत एक जुलाई को नाम निर्देशन पत्र दाखिल किए जाएंगे, जिसके बाद भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में औपचारिक घोषणा की जाएगी।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद की दौड़ में आदिवासी वर्ग से ताल्लुक रखने वाले बैतूल सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री दुर्गादास उईके का नाम भी अब प्रमुखता से सामने आ रहा है। उईके वर्तमान में दूसरी बार बैतूल से सांसद हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में मंत्री हैं। प्रदेश की लगभग 22 प्रतिशत आदिवासी जनसंख्या, विशेषकर 13 प्रतिशत गोंड समुदाय, को देखते हुए भाजपा संगठन में उन्हें मजबूत दावेदार माना जा रहा है। इसके पहले बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल का नाम प्रबल दावेदारों के रूप में सामने आया था।
संघ की पृष्ठभूमि और आदिवासी समाज में मजबूत पकड़
दुर्गादास उईके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। राजनीति में कदम रखने से पहले वे सरकारी शिक्षक थे। आदिवासी समाज में वे एक निर्विवाद और स्वीकृत चेहरा माने जाते हैं। संगठनात्मक मामलों में संघ की सहमति को अहम माना जाता है, और ऐसा माना जा रहा है कि संघ, सत्ता और संगठनकृतीनों ही उईके के नाम पर सहमत हो सकते हैं।
महिला अध्यक्ष की भी चर्चा में
मध्यप्रदेश को भाजपा की राजनीतिक प्रयोगशाला माना जाता है, और ऐसे में पार्टी संगठनात्मक बदलावों के जरिए आगामी चुनावों के लिए नई रणनीति गढ़ने में जुटी है। इसके चलते प्रदेश भाजपा में महिला अध्यक्ष की भी संभावना जताई जा रही है। 2028 विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए, जिसमें महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम मुद्दे होंगे, पार्टी महिला नेतृत्व को आगे लाकर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की योजना पर भी विचार कर रही है।

वर्गवार प्रमुख दावेदार

ब्राह्मण वर्गः डॉ. नरोत्तम मिश्रा, राजेन्द्र शुक्ल, रामेश्वर शर्मा
वैश्य वर्गः हेमंत खंडेलवाल, सुधीर गुप्ता
क्षत्रिय वर्गः अरविंद भदौरिया, बृजेन्द्र प्रताप सिंह
अनुसूचित जातिः प्रदीप लारिया, लाल सिंह आर्य, हरिशंकर खटीक
अनुसूचित जनजाति : गजेन्द्र सिंह पटेल, दुर्गादास उईके, फग्गन सिंह कुलस्ते, सुमेर सिंह सोलंकी

रविवार, 15 जून 2025

संघ के सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने का प्रयास

  ईको-फ्रेंडली व्यवस्थाओं का उदाहरण भी बना प्रशिक्षण वर्ग


भोपाल। मध्यप्रदेश के पचमढ़ी में चल रहा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का प्रशिक्षण शिविर जहां एक ओर पार्टी की विचारधारा और रणनीति को सुदृढ़ करने का माध्यम बना है, वहीं दूसरी ओर यह आयोजन पर्यावरण संरक्षण और ईको-फ्रेंडली व्यवस्थाओं का एक प्रेरणादायक उदाहरण भी बन गया है। शिविर को पूरी तरह प्लास्टिक मुक्त रखा गया है, और इसमें पानी की डिस्पोजेबल बोतलों के स्थान पर तांबे के लोटे और गिलास का उपयोग किया जा रहा है।
शिविर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के “पंच परिवर्तन“ के सिद्धांत  नागरिक कर्तव्य, स्वदेशी, पर्यावरण, समरसता और कुटुंब को व्यवहार में उतारने का प्रयास किया जा रहा है। इस प्रशिक्षण शिविर की हर छोटी-बड़ी व्यवस्था में इन सिद्धांतों की स्पष्ट झलक दिखाई दे रही है। शिविर के दूसरे दिन रविवार सुबह भाजपा के सांसदों और विधायकों ने सामूहिक रूप से योग, प्राणायाम और ध्यान किया। इसके बाद सभी ने मिलकर संघ की प्रार्थना गाई। कुछ नेता पचमढ़ी की वादियों में सैर करते भी नजर आए। उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल, वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय समेत कई नेताओं ने जटाशंकर महादेव मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना की। केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) हैंडल पर महादेव दर्शन का एक वीडियो भी साझा किया।

तांबे के पात्र और जूट की प्रवेशिका

पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए शिविर में प्लास्टिक का पूरी तरह परित्याग किया गया है। पीने के पानी के लिए तांबे के लोटे और गिलास उपलब्ध कराए गए हैं, जिनका उपयोग सभी नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्ता कर रहे हैं। इसके अलावा, आयोजन में सभी प्रतिभागियों को जो पहचान पत्र (आईडी कार्ड) दिए गए हैं, वे भी प्लास्टिक मुक्त हैं। यह प्रवेशिका जूट के कपड़े से बनी है और इसकी डोरी भी जूट की ही है। यह न केवल पर्यावरण हितैषी कदम है, बल्कि स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को भी बढ़ावा देता है।
पंच परिवर्तन के सिद्धांतों की झलक
शिविर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंच परिवर्तन सिद्धांतों को व्यवहार में लाने की पहल की जा रही है। पर्यावरण-संवेदनशील व्यवस्थाएं, प्लास्टिक मुक्त वातावरण, तांबे के बर्तनों का उपयोग, और जूट की प्रवेशिका इस बात के प्रमाण हैं कि भाजपा और संघ अपने मूल सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में भी जीवंत बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं।

मंगलवार, 10 जून 2025

खूनी हनीमूनः एक विवाह और एक षड्यंत्र की त्रासदी


इंदौर के नामचीन ट्रांसपोर्ट कारोबारी राजा रघुवंशी की शादी की खुशियाँ अभी सजीव थीं, शहनाइयों की गूँज अभी थमी नहीं थी कि एक हृदयविदारक खबर ने सबको झकझोर कर रख दिया। यह शादी, जो 11 मई 2025 को सोनम से हुई थी, कुछ ही दिनों में एक भयावह त्रासदी में बदल गई। राजा की रहस्यमयी मौत ने न सिर्फ उनके परिवार बल्कि पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। मेघालय पुलिस ने इस दिल दहला देने वाले मामले को “ऑपरेशन हनीमून” नाम दिया, और जो कहानी सामने आई, वह किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं थी।

प्रेम, धोखा और सुपारीः हत्या की नींव

शुरुआती जांच में सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ, जब पता चला कि राजा की हत्या का मास्टरमाइंड कोई और नहीं, बल्कि उनकी नई नवेली पत्नी सोनम रघुवंशी ही थी। सोनम का रिश्ता पहले से ही राज कुशवाहा नामक युवक से चल रहा था, जो राजा की ही फैक्ट्री में कार्यरत था। इस अवैध रिश्ते ने एक भयावह मोड़ तब लिया, जब दोनों ने राजा को रास्ते से हटाने की साजिश रची। हत्या के लिए दस लाख रुपये की सुपारी दी गई थी। यह भयावह तथ्य सामने आया कि सोनम और राज की योजना थी कि शादी के तुरंत बाद ही राजा को खत्म कर दिया जाए।

हनीमून पर मौत की स्क्रिप्ट

20 मई को राजा और सोनम हनीमून पर मेघालय रवाना हुए। यह वही यात्रा थी, जिसे सोनम ने पूरी योजना के साथ चुना था। 23 मई को दोनों लापता हो गए। लगातार प्रयासों के बाद 2 जून को राजा का शव चेरापूंजी की एक गहरी खाई से मिला। शव की हालत और प्राप्त सबूतों से यह स्पष्ट हुआ कि राजा पर पहले क्रूरता से हमला किया गया, उसकी सोने की चेन और अंगूठी छीनी गई और फिर उसे खाई में फेंक दिया गया। आशंका है कि जब राजा को खाई में फेंका गया, वह तब भी जीवित था। यह नृशंसता एक ऐसे अपराध की ओर इशारा करती है, जिसमें मानवीयता का कोई स्थान नहीं बचा।

पुलिस की कार्यवाही और गिरफ्तारियाँ

मेघालय पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए सोनम, उसके प्रेमी राज कुशवाहा और तीन भाड़े के हत्यारों दृ आकाश राजपूत, विशाल और आनंद कुर्मी दृ को गिरफ्तार किया। सोनम ने अंततः 9 जून को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में आत्मसमर्पण कर दिया। उसे शिलांग ले जाकर पूछताछ की जा रही है। इस मामले में तीन राज्यों  मध्य प्रदेश, मेघालय और उत्तर प्रदेश का आपराधिक कनेक्शन सामने आया, जो इस अपराध की जटिलता और पूर्व-नियोजन को दर्शाता है।

परिवार का दर्द और न्याय की गुहार

राजा की माँ, उमा रघुवंशी, इस त्रासदी से उबर नहीं पा रही हैं। वे कहती हैं, “सोनम के कहने पर ही राजा शिलांग गया था। सोनम ने जानबूझकर वापसी की बुकिंग नहीं करवाई थी। सब पहले से तय था।“ परिवार की ओर से यह मांग की जा रही है कि इस जघन्य अपराध में शामिल सभी दोषियों को फाँसी दी जाए, ताकि राजा को सच्चा न्याय मिल सके।

रिश्तों की सतह के नीचे छुपा खतरा

यह घटना एक बार फिर यह प्रश्न उठाती है कि क्या हम अपने रिश्तों को सही से पहचान पा रहे हैं? “खूनी हनीमून“ की यह दास्तान बताती है कि जब रिश्ते धोखे और लालच के गर्त में डूब जाएँ, तो उनका अंजाम कितना खौफनाक हो सकता है।

समाज के लिए चेतावनी भी

राजा रघुवंशी की हत्या केवल एक व्यक्ति की जान लेने का मामला नहीं है; यह उन अनगिनत कहानियों में से एक है जो बताती हैं कि विश्वासघात और लालच मिलकर इंसान को किस हद तक गिरा सकते हैं। “ऑपरेशन हनीमून“ जैसे मामलों की सच्चाई सामने लाना और अपराधियों को सज़ा दिलाना केवल एक परिवार को न्याय दिलाना नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी बनाना भी है। उम्मीद है कि इस केस में न्याय होगा और राजा को वह इंसाफ मिलेगा, जिसकी उसकी आत्मा पुकार कर रही है।


कांग्रेस का युवा दांव, अधूरा ना रह जाए सपना

खबरों  की खबर
राजेन्द्र पाराशर 

प्रदेश कांग्रेस में युवा नेतृत्व को आगे लाने की पहल पार्टी के लिए एक साहसी और निर्णायक कदम है, लेकिन यह ’युवा प्रयोग’ तभी सफल हो पाएगा जब पार्टी आंतरिक एकता बनाए रखे और वरिष्ठ नेताओं का समर्थन भी मिले। अनुभवहीनता और गुटबाज़ी जैसी पुरानी समस्याएं अगर हावी रहीं, तो यह बदलाव का दावा केवल एक दिखावटी हलचल बनकर रह जाएगा। कांग्रेस पहले ही लंबे समय से गुटबाज़ी और आंतरिक खींचतान से जूझती रही है, जिससे उसकी ज़मीनी पकड़ लगातार कमजोर होती गई है। अब जब नेतृत्व युवा चेहरों को सौंपा जा रहा है, तो उन पर यह दबाव होगा कि वे न केवल खुद को साबित करें, बल्कि आपसी मतभेदों को भी पाटें। यदि नए नेता सभी धड़ों को साथ लेकर चलने में सफल होते हैं, तो यह कदम 2028 के चुनाव से पहले कांग्रेस को एक नई ताकत दे सकता है। वरना यह ‘युवा प्रयोग’ एक और अधूरा सपना बनकर रह जाएगा।

राहुल के लंगड़े घोड़ों को तलाश नहीं कर पाई कांग्रेस 

राहुल गांधी के “लंगड़े घोड़े“ वाले बयान से प्रदेश कांग्रेस में हलचल मच गई है। हाल ही में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कांग्रेस नेताओं को तीन श्रेणियों में बांटा रेस का घोड़ा, बारात का घोड़ा और लंगड़ा घोड़ा। उन्होंने कहा कि “लंगड़े घोड़े“, यानी निष्क्रिय, गुटबाज और पार्टी पर बोझ बन चुके नेताओं को अब रिटायर कर दिया जाएगा। यह बयान कांग्रेस की आंतरिक निष्क्रियता और गुटबाजी पर एक तीखा प्रहार माना जा रहा है। हालांकि, इससे पार्टी के कई नेता असहज महसूस कर रहे हैं। क्या यह बयान राहुल गांधी द्वारा संगठन की कमजोरी और अंदरूनी कलह की स्वीकारोक्ति है? यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि वे लंगड़े घोड़े कौन हैं, जिन्हें दिल्ली में राहुल गांधी की टीम ने चिन्हित किया है। कांग्रेस के भीतर इसका प्रभाव साफ देखा जा रहा है। नेताओं को अब इंतजार है लंगड़े खोड़े के नामों का।
सत्ता संतुलन का संदेश या शिवराज का अपना दर्द?
हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का एक बयान चर्चा में है। सीहोर में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि कोई कयास मत लगाना, मोहन यादव मेरे मुख्यमंत्री हैं और हम सभी उनके साथ खड़े हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि पार्टी का आदेश उनके लिए ब्रह्मवाक्य है और वे चाहते हैं कि मोहन यादव उनसे बेहतर काम करें। इस बयान को कई लोग मुख्यमंत्री मोहन यादव के प्रति चौहान की निष्ठा के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे शिवराज के मन की पीड़ा या भीतर चल रही उथल-पुथल से भी जोड़ रहे हैं। साथ ही, इसे भाजपा के भीतर सत्ता संतुलन बनाए रखने की रणनीति भी माना जा रहा है, ताकि सभी बड़े नेता एकजुट रहें। सवाल यह उठता है कि क्या यह वक्तव्य केवल एक वरिष्ठ नेता की प्रतिबद्धता है, या इसके पीछे कुछ और भावनाएं भी छिपी हैं? इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।
मंत्री, अफसरों के बीच तालमेल के अभाव में अटकी तबादला सूची
प्रदेश में तबादलों की आखिरी तारीख 10 जून है, लेकिन कई अहम विभागों की तबादला सूची अब तक अटकी हुई है। कारण बताया जा रहा है कि मंत्री, प्रमुख सचिव और आयुक्तों के बीच समन्वय की कमी है। फाइलें मंत्री बंगलों और अधिकारियों की टेबल पर घूम रही हैं, लेकिन मुहर किसी की नहीं लग पा रही। राजस्व, वन, परिवहन, ऊर्जा, महिला एवं बाल विकास, पंचायत, खाद्य और उच्च शिक्षा सहित कई विभागों की सूचियां अधर में लटकी हैं। वित्त मंत्री के अधीन आबकारी और कमर्शियल टैक्स जैसे विभागों में भी संशय बना हुआ है। सूत्रों की मानें तो कुछ स्थानांतरण राजनीतिक सिफारिशों और पसंदीदा अधिकारियों को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि तारीख बढ़ेगी या आखिरी वक्त पर तबादला सूचियां जारी होंगी। 

गुरुवार, 5 जून 2025

इलेक्टेड जनप्रतिनिधि पर हावी हो रहे सिलेक्टेड

फिर छलका भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य का दर्द 


भोपाल। भाजपा में विधायकों की नाराजगी का दौर थम नहीं रहा है। संगठन और सरकार चाहकर भी उसे रोक नहीं पा रहे हैं। विधायकों की नाराजगी एक-एक कर लगातार खुलकर सामने आ रही है। आज एक और भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि संगठन और सरकार में इलेक्टेड जनप्रतिनिधि की बात नहीं सुनी जा रही है, सिलेक्टेड भारी हो गए हैं।
भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य का यह दर्द आज उस वक्त छलका जब वे गुना में पर्यावरण दिवस के अवसर पर निकाली गई रैली को हरी झंडी दिखाकर रवाना कर रहे थे। गुना विधायक पन्नालाल शाक्य ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अनदेखी की बात कही है। इसी दौरान भाजपा विधायक ने कहा कि जनता ने उन्हें भारी मतों से जिताकर तो भेज दिया है, लेकिन इलेक्टेड जनप्रतिनिधि की बात नहीं सुनी जा रही है, सिलेक्टेड हावी हो रहे हैं। इससे पहले विधायक ने गुना को नगर निगम बनाने के दौरान सामने आ रही बाधाओं का जिक्र किया। जिसमें उन्होंने बताया कि धीरे-धीरे कई गांव नगर निगम में शामिल होने का विरोध करने लगे हैं। विधायक पन्नालाल शाक्य ने यह भी कहा कि उन्होंने गुना में रिंग रोड और विवेक कॉलोनी से बायपास तक सड़क बनाने की मांग सरकार के सामने रखी थी, उसे भी राजनीतिक कारणों के चलते खटाई में डाल दिया गया है। दरअसल, पन्नालाल शाक्य का इशारा उन नेताओं की तरफ था जो अपने वर्चस्व वाली ग्राम पंचायतों को नगर निगम में शामिल नहीं होने देना चाहते हैं और इसके लिए लगातार प्रयास भी कर रहे हैं।
 
पहले भी कर चुके हैं अपना दर्द बयां
भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य द्वारा यह कोई पहली बार नहीं हुआ है जब उन्होंने संगठन  और अपनी ही सरकार को घेरा हो। उन्होंने बीते मई माह में भी गुना को नगर निगम बनाने की प्रक्रिया के बीच विधायक अपनी सरकार से नाराजगी जताई थी। पन्नालाल शाक्य ने कहा कि वह आरक्षित सीट के प्रतिनिधि हैं, इसलिए हमारी कोई नहीं सुन रहा है। यहां तक की उन्होंने इस दौरान चेतावनी भी दी थी कि यदि इस पंचायत को नगर निगम क्षेत्र में नहीं जोड़ा गया तो वे स्वयं गुना को नगर निगम बनाए जाने का विरोध करेंगे।

भाजपा कर रही है प्रशिक्षण शिविर
लगातार भाजपा विधायकों की नाराजगी सामने आने के बाद भाजपा ने पचमढ़ी में इसी माह 14 जून से तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया है। शिविर का उद्घाटन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा करेंगे, जबकि समापन समारोह में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के शामिल होने की संभावना है। शिविर में लोकसभा, राज्यसभा सांसदों और विधायकों को पार्टी की नीतियों, मर्यादित व्यवहार और तय विषयों पर ही बयान देने की दिशा में प्रशिक्षित किया जाएगा। इसके अलावा पार्टी विधायकों को हिदायत भी दी जा चुकी है कि वे संगठन स्तर पर अपनी नाराजगी जताएं, सार्वजनिक रूप से बोलने से बचे, मगर भाजपा विधायक लगातार खुलकर सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जता रहे हैं। 

मंगलवार, 20 मई 2025

भाजपा की सरकार में दर्जन भर मंत्री दे चुके हैं इस्तीफा

किसी को बयानबाजी, किसी को 75 साल की उम्र के कारण देना पड़ा था इस्तीफा


भोपाल। भाजपा सरकार के अब तक के कार्यकाल में करीब दर्जन भर  मंत्रियों को अलग-अलग कारणों से मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती भी शामिल हैं, जिन्होंने करीब आठ माह तक मुख्यमंत्री रहने के बाद पद से इस्तीफा देकर तिरंगा यात्रा निकाली थी। जबकि मंत्रियों में किसी को बयानबाजी तो किसी को उम्र की अधिकता के कारण इस्तीफा देना पड़ा था।
भाजपा सरकार के कार्यकाल में अब तक अलग-अलग कारणों से कई मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा था। कोई बयानबाजी को लेकर इस्तीफा देने को विवश हुआ था तो कोई आयकर और लोकायुक्त छापों के चलते इस्तीफा देने को मजबूर हुआ था। मंत्रियों के अधिकांश इस्तीफे शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए हुए थे। प्रदेश में उमाभारती के नेतृत्व में भाजपा ने 2003 में सरकार बनाई थी। उमा भारती 8 दिसंबर 2003 को मुख्यमंत्री बनी। इसके बाद 23 अगस्त 2004 तक वे मुख्यमंत्री रहीं। तिरंगा मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने इस्तीफा दे दिया। उमा भारती के बाद उनके मंत्री मंडल में मंत्री रहे सुनील नायक से तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने इस्तीफा ले लिया था। नायक से इस्तीफा लेने की वजह उनके बयान बने थे। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्रिमंडल के एक मंत्री जुगल किशोर बागड़ी से इस्तीफा मांगा था, क्योंकि लोकायुक्त ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। चौहान के मुख्यमंत्री रहने के दौरान कई मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा था। इसी तरह 2008 में अजय विश्नाई ने अपने रिश्तेदारों के आवासीय परिसरों पर आयकर के छापे पड़ने की कार्रवाई के चलते इस्तीफा दिया था। इन छापों ने विश्नोई पर भी सवालिया निशान लगा दिया था। नतीजतन, चौहान और पार्टी संगठन ने उनसे इस्तीफा मांगने का फैसला किया। साल  2010 में बेलागांव में हुई गोलीबारी की घटना में अपने परिवार के सदस्यों का नाम आने के कारण तत्कालीन मंत्री अनूप मिश्रा को इस्तीफा देना पड़ा था। फिर भी मिश्रा और उनके परिवार के सदस्यों को इस घटना में क्लीन चिट मिल गई थी। इसके बाद वे फिर से मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। 2013 में राज्य के तत्कालीन वित्त मंत्री राघवजी भाई को एक सेक्स स्कैंडल के वीडियो के सामने आने के बाद मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। हालांकि अब राघवजी को इस मामले में क्लीनचिट मिल गई है।
75 की उम्र के चलते दिया था इस्तीफा
वर्ष 2016 में शिवराज सरकार के दो कद्दावर मंत्रियों को केवल इस कारण इस्तीफा देना पड़ा था कि वे 75 साल की उम्र को पार कर चुके थे। इनमें तत्कालीन मंत्री बाबूलाल गौर और सरताज सिंह के नाम ष्शामिल है। दोनां ही मंत्रियों इस्तीफा मांगे जाने पर नाराज थे, मगर केन्द्रीय नेतृत्व के आगे दोनों की नहीं चली और दोनों को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। बाद में दोनों ही मंत्रियों के टिकट भी भाजपा ने काट दिए थे।
चुनाव हारे तो इन्होंने दिया इस्तीफा
शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए इमरती देवी, गिर्राज दंडोतिया और ऐदल सिंह कंसाना को चुनाव हारने के बाद इस्तीफा देना पड़ा था। डा मोहन यादव के नेतृत्व वाली कैबिनेट से इस्तीफा देने वाले एकमात्र मंत्री रामनिवास रावत थे। उन्होंने चुनाव हारने के कारण इस्तीफा दिया था।
बयानबाजी के चलते फिर घिरे हैं विजय शाह
राज्य के आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह से इन दिनों एक बार फिर बदजुबानी के चलते इस्तीफे की मांग उठ रही है। कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दिए बयान के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर विजय शाह से इस्तीफे मांग की जा रही है। इतना ही नहीं भाजपा के कई नेताओं ने भी शाह से इस्तीफे की मांग की है। फिलहाल संगठन और सरकार दोनों ने मौन साध रखा है। मगर उनके मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी जांच के बाद संभावना जताई जा रही है कि संगठन को कोई कदम उठाना पड़ेगा।

बुधवार, 11 दिसंबर 2024

कांग्रेस विधायकों के भोज से मिलेगा नया संदेश ?

कमलनाथ, उमंग सिंघार ने अलग-अलग दिन विधायकों को किया आमंत्रित

भोपाल। प्रदेश कांग्रेस में एक बार फिर भोज की राजनीति शुरू होने जा रही है। विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ द्वारा अलग-अलग दिन कांग्रेस विधायकों को दिए जाने वाले भोज की चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के भोज से कांग्रेस विधायकों को कोई नया संदेश मिल सकता है। यह संदेश क्या होगा, इसका जानकारी तो विधायकों को कमलनाथ के यहां होने वाले भोज के बाद ही मिलेगी।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते एक दिन पहले अपने विधायकों को भोज पर बुलाने की परंपरा वैसे तो कांग्रेस की रही है। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र के एक दिन पहले कांग्रेस विधायकों को भोज पर आमंत्रित किया है। इसी दिन वे विधायक दल की बैठक भी करने वाले हैं। नेता प्रतिपक्ष ने विधायकों को अपने बंगले के बजाय राजधानी के एक होटल में भोज पर बुलाया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का कहना है कि विधायक दल की बैठक में सत्र के दौरान सरकार को घेरने की रणनीति बनाई जाएगी। विधायकों के भोज को लेकर उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष होने के नाते वे पार्टी की परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी 16 दिसंबर को अपने बंगले पर कांग्रेस विधायकों को भोज पर आमंत्रित किया है। इस दौरान वे खुद राजधानी में रहेंगे। कमलनाथ के यहां होने वाले विधायकों के भोज को लेकर तरह-तरह  के कयास लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि कमलनाथ भोज के बहाने एक बार फिर सक्रियता दिखाएंगे। संभावना है कि इस बहाने विधायकों से उनकी बनी दूरी को करीबी में बदलें। वैसे कमलनाथ पूर्व में भी एक बार ऐसा कर चुके हैं। तब उन्होंने कहा था कि वरिष्ठ होने के नाते और विधायकों के कहने पर उन्होंने भोज दिया है। मगर वर्तमान में कांग्रेस में चल रही उठापटक के चलते कांग्रेस नेताओं को ही यह भोज चिंता में डाल रहा है। माना जा रहा है कि कमलनाथ के यहां होने वाले विधायकों के भोज से विधायकों को कोई संदेश भी मिल सकता है। वह एकता का होगा या फिर कोई और। यह तो भोज के बाद ही पता चलेगा।
उमंग के भोज में शामिल होंगे कमलनाथ !
कमलनाथ खुद छिंदवाड़ा से विधायक हैं और कांग्रेस विधायक दल में सबसे वरिश्ठ विधायक भी है। इस नाते नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने उन्हें भी भोज में आमंत्रित किया है, मगर सवाल इस बात को लेकर उठ रहे हैं कि क्या कमलनाथ उमंग द्वारा आयोजित किए जाने वाले भोज में ष्शामिल होंगे। फिलहाल उनके राजधानी पहुंचने का समय और दिन तय नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि 15 की शाम को या फिर 16 दिसंबर की सुबह भोपाल पहुंचेंगे।  

सोमवार, 9 दिसंबर 2024

जीतू ने किया अपमान, किन्नर समाज का लगेगा श्राप



पूर्व  विधायक शबनम मौसी ने पूछा कांग्रेस इनकी बपौती है क्या ?

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में पहली किन्नर विधायक रही शबनम मौसी ने आज प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोला। उन्होंने कहा कि मैं जीतू पटवारी से मिलने गई, मगर उनके सहयोगियों ने मिलने नहीं दिया। उन्होंने किन्नर का अपमान किया है। किन्नर समाज का उन्हें श्राप लगेगा। शबनम ने कहा कि कोई मिल नहीं रहा था तो जीतू को अध्यक्ष बनाया दिया, क्या कांग्रेस इनकी बपौती है।
पूर्व विधायक शबनम मौसी आज राजधानी भोपाल पहुंची थी। वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी से मिलने पहुंची, मगर उनकी मुलाकात नहीं हुई। इसके बाद प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के बाहर उन्होंने मीडिया से चर्चा करते हुए नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि पूर्व में भी वे कांग्रेस में शामिल होने के लिए पहुंची थी, मगर उस वक्त भी नेताओं ने उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं दिया। आज वे प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी से मिलना चाहती थी, मगर उनके सहयोगियों ने मुलाकात नहीं कराई। उन्होंने कहा कि यह किन्नर का अपमान है। किन्नर समाज का श्राप लगेगा, इन्हें। कांग्रेस की आज जो प्रदेश में स्थिति है, वह इन्हीं जैसे नेताओं के कारण है। कांग्रेस इनकी बपौती है क्या, जिनसे चाहे मिलेंगे और जिन्हें चाहे ठुकरा देंगे? उन्होंने कहा पटवारी में लोगों को जोड़ने की क्षमता नहीं है। कोई अध्यक्ष मिल नहीं रहा था इसलिए जीतू को अध्यक्ष बना दिया। शबनम मौसी ने कहा कि जीतू को अध्यक्ष बनाने के बाद कांग्रेस और खराब हो रही है। जीतू के आचरण ऐसा है, तभी लोग छोड़ के जा रहे हैं। पहले भी सदस्यता लेने आई थी तो अपमानित किया था, मैं बहुत दुखी हूं।
उल्लेखनीय है कि देश की पहली किन्नर विधायक शबनम मौसी ने साल 2000 में शहडोल जिले की सोहागपुर सीट से उपचुनाव जीता था। उन्होंने भाजपा के लल्लू सिंह को 17,800 से ज्यादा मतों के अंतर से हराया था। हालांकि, साल 2003 के विधानसभा चुनावों में वह केवल 1400 वोट पाने में सफल रहीं और हार गईं थीं।

खोया जनाधार पाने बसपा प्रदेश में करेगी सामाजिक सम्मेलन


भोपाल। प्रदेश में विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद बहुजन समाज पार्टी प्रदेश में फिर अपना वोट बैंक मजबूत करने की तैयारी कर रही है। खोए जनाधार को पाने के लिए बसपा द्वारा अब प्रदेश में अलग-अलग जातियों को जोड़ने के लिए सामाजिक सम्मेलन कराने का फैसला लिया है। सर्वसमाज के नारे पर बसपा फिर से प्रदेश में अपने को मजबूत करने की तैयारी कर रही है।

ब्हुजन समाज पार्टी को प्रदेश में 2023 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा था। दोनों ही चुनाव में उसने प्रत्याशी तो मैदान में उतारे मगर एक भी स्थान पर उसे जीत नहीं मिली। इसके बाद से बसपा का संगठन और भी कमजोर हुआ। अब बसपा प्रदेश में एक बार फिर संगठन को मजबूत करने की तैयारी कर रही है।  बसपा ने तय किया है कि पार्टी में जिस समाज के जो पदाधिकारी हैं एवं पूर्व सांसद, पूर्व विधायक और हारे हुए प्रत्याशी अपनी-अपनी समाज के सामाजिक सम्मेलन कराएंगे। हालांकि ये सम्मेलन समाजों में जन्मे महापुरुषों संतों के नाम पर कराए जाएंगे। रानी दुर्गावती, टंट्या मामा, देवी अहिल्या बाई होल्कर, संत गाडगे जी महाराज, नामदेव महाराज, संत रविदास, ज्योतिबा फुले जैसे महापुरुषों के नाम पर यह आयोजन होंगे।
जनाधार वाली विधानसभा सीटों पर फोकस
बसपा अब उन सीटों पर फोकस कर रही है जहां उसका वोट बैंक निर्णायक रहा है। सुपर-30 के फॉर्मूला पर बसपा जनवरी से मजबूत जनाधार वाली 30 विधानसभाओं में संगठन को मजबूत करेगी। इन 30 विधानसभाओं में बूथ वार कमेटियों के गठन के साथ ही कमजोर बूथों पर वोट बैंक बढ़ाने के लिए प्रदेश, सेक्टर, जोन के इंचार्ज बैठकें करेंगे। करीब 3 महीने बाद अगले फेज में सुपर-30 के तहत 30 अन्य विधानसभाओं में काम शुरू किया जाएगा।