गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

सपनों और सरोकारों की छाया में बीता साल

मध्यप्रदेश के सियासी और सरकारी परिदृश्य पर बीते साल सपनों और सरोकारों का द्वंद छाया रहा़ सत्ता में बैठी भाजपा से लेकर प्रतिपक्ष के खेमें में खड़ी कांग्रेस और दूसरे दलों के सपनों में 2013 का विधानसभा चुनाव घूम रहा था, तो उनके सामने चुनौती खड़ी थी कि वे अपनी भूमि और भूमिका को किस तरफ पुख्ता करें़ सरकार बैठी भाजपा में सालभर यह चर्चा चलती रही कि मंत्रिमंडल का विस्तार अब हुआ और तब हुआ़ इसी चर्चा में पूरा साल बीत गया, मगर मंत्रिमंडल विस्तार नहीं हुआ़ कांग्रेस भी इससे जुदा नहीं थी़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति के छह माह बाद बमुश्किल वे अपने पदाधिकारियों की घोषणा कर पाए़ नेता प्रतिपक्ष कुर्सी को लेकर भी कांग्रेस में घमासान मचा रहा़ यह पहली बार हुआ कि लंबे समय तक कांग्रेस अपने विधायक दल के नेता का चुनाव नहीं कर पाई़ उसे कार्यकारी नेता चौधरी राकेशसिंह चतुर्वेदी से काम चलाना पड़ा़ वर्ष 2010 में जमुनादेवी के मृत्यु के बाद से कांग्रेस यह तय ही नहीं कर पा रही थी कि किसे नेतृत्व की कमान सौंपी जाए़ लंबे समय तक मध्यप्रदेश की राजनीति पर छाये रहे पूर्व मुख्यमंंत्री और पूर्व केन्द्रीय मंत्री अर्जुनसिंह के देहावसान के बाद उनके पुत्र अजयसिंह को कांग्रेस विधायक दल का नेता चुना गया़ उन्होंने आमद तो धीरे से दर्ज कराई, लेकिन राज्य विधानसभा के शीतकालीन सत्र में आए अविश्वास प्रस्ताव के दौरान उनकी वाणी और बोल धमाकेदार थे़
बीत रहा साल 2011 प्रदेश की सरकार और राजनीतिक दलों के लिए संघर्ष के साथ चिंता में उन्हें डूबाए रखने वाला साबित हुआ़ साल के शुुरुआती माह जनवरी में ओले-पाले का कहर कुछ ऐसा आया कि उसने सरकार को झकझोर दिया़ इस पर राजनीतिक द्वंद भी हुआ़ कांग्रेस और भाजपा दोनों मैदान में दिखाई दिए़ कांग्रेस ने इसे लेकर किसानों को वास्तविक मुआवजा न मिलने की बात कही ओर तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी इस मुद्दे पर धरने पर बैठे और लाठियां भी खाई़ इसके बाद उनका उपवास भी हुआ और केन्द्र से राशि आई़ मगर यह राशि सरकार को नहीं सुहाई, सरकार इस मुद्दे पर केन्द्र के खिलाफ खड़ी नजर आई उसके साथ ही भाजपा का संगठन भी रहा़ इस बीच किसानों की मौतों का सिलसिला भी प्रदेश में शुुरु हो गया़ इसके बाद सरकार ने केन्द्र के खिलाफ मोर्चा खोलकर सहायता राशि न देने का आरोप लगाया तो कांग्रेस किसानों की मौत के लिए कर्ज को जिम्मेदार बताती रही़इस मुद्दे पर करीब तीन माह याने मार्च तक खूब राजनीति हुई़ फरवरी में तो यह राजनीति इतनी गर्माई कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने 13 फरवरी को राजधानी के भेल मैदान में सविनय आग्रह उपवास पर बैठने की घोषणा कर दी़ भाजपा संगठन इस पर खुश नजर आया़ मगर उपवास पर बैठने को लेकर संवैधानिक पद आड़े आया तो तत्कालीन राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर ने बीच का रास्ता निकाल कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आश्वासन पर इस मामले में मुख्यमंत्री को उपवास पर नहीं बैठने दिया़ उपवास के लिए मंच सजा, सारी तैयारी हुई और ऐन वक्त पर संगठन को बिना बताए मुख्यमंत्री ने जब उपवास पर न बैठने की घोषणा कर दी तो संगठन खफा हो गया़ कुछ दिनों तक सत्ता और संगठन के बीच ये तकरार साफ दिखाई दी़ इसके बाद सुलह हुई और सरकार एवं संगठन साथ नजर आए़ किसानों पर राजनीति का दौर सभी दलों द्वारा सालभर चलता रहा़ कभी ओले-पाले के बहाने तो कभी खाद-बिजली के संकट को लेकऱ
सरकार के लिए अपनी ही योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में भी संघर्ष की स्थिति बनी रही़ योजनाओं के क्रियांवयन न होने को लेकर सरकार चिंतित भी दिखाई दी़ कई अवसर ऐसे भी आए जब संगठन ने सरकार को इसके लिए चेताया भी़ संगठन इसके लिए अधिकारियों को दोषी बताता रहा़ सरकार को जब इस बात का कुछ अहसास हुआ तो वह जागी और अफसरों की इसके लिए कसावट भी की, मगर यह कसावट भी सफलता में नहीं बदली़ इसके बाद मुख्यमंत्री ने राजधानी भोपाल में कमिश्नर-कलेक्टर कांफ्रेस का आयोजन किया और योजनाओं को गति देने की बात कही, मगर वर्ष के अंत तक स्थिति वहीं ढाक के तीन पान वाली रही़ सरकार ने जनता के हित में कई योजनाओं की शुरुआत की उनमें कुपोषण को दूर करने के लिए अटल बाल आरोग्य और पोषण मिशन, बाल हृदय सुरक्षा योजना, बेटी बचाव अभियान के साथ वनवासी यात्रा भी रही़ इनके अलावा भी शासकीय योजनाएं जारी रही,मगर जमीनी स्तर पर इन योजनाओं को जनता न पहुंचने से संगठन और सरकार चिंता में डूबे रहे़ दोनों ही इस बात को लेकर संघर्षरत रहे कि किस तरह से योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाई जाए और वे उनका लाभ उठाएं़ आखिर इसके लिए भाजपा संगठन को आगे आना पड़ा़ संगठन ने इसके लिए मोर्चा, प्रकोष्ठों को सक्रिय किया और तरह-तरह की यात्राएं निकालकर जनता के बीच योजनाओं की जानकारी देने के फैसला किया़
ऐसा भी नहीं था कि सरकार और संगठन के बीच अच्छा तालमेल ही वर्षभर बना रहा हो, कई अवसर ऐसे भी आए जब यह तालमेल गड़बढ़Þाता नजर आया, मगर जब सत्ता पर आंच दिखाई देती नजर आई तो सरकार के साथ संगठन खड़ा भी नजर आया़ संगठन ने भी उज्जैन और सिंगरौली में हुई कार्यसमिति की बैठकों में सरकार को सबक सिखाने जैसे प्रयास किया, मगर मामला सामान्जस के साथ निपटा लिया गया़ कई अवसरों पर सरकार और संगठन दोनों को मंत्रियों के बेबाक बयानों ने भी चिंता में डाला तो कभी विधायकों और संगठन के नेताओं ने चिंतित किया़ मंत्रियों में रामकृष्ण कुसमारिया, गौरीशंकर बिसेन, कैलाश विजयवर्गीय, बाबूलाल गौर, नारायण कुशवाह, विजय शाह आदि थे़ तो विधायकों में जुगलकिशोर बागरी, रमेशचंद्र खटीक, आशारानी सिंह, गिरिराजगिशोर पोद्दार, हरेन्द्रजीतसिंह बब्बू, संतोष जोशी
थे़ वहीं संगठन के वरिष्ठ नेताओं रघुनंदन शर्मा, यशोधरा राजे सिंधिया, संजय नगाइच के अलावा और भी संगठन नेता रहे हैं़
सरकार और भाजपा संगठन के लिए वर्ष के शुरुआत में कांग्रेस की सुस्त स्थिति को देख उतनी चिंता नहीं थी, जितनी की कांग्रेस द्वारा प्रदेश नेतृत्व और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के बदले जाने के बाद हुई़ 2010 के जुलाई माह से दोनों के बदले जाने की कवायद चल रही थी जो मई 2011 में पूरी हुई़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया को और नेता प्रतिपक्ष पद पर अजयसिंह की ताजपोशी की गई़ इसके बाद कांग्रेस में भी गुटबाजी दिखाई दी, मगर बाद में सत्ता पाने के लिए कांग्रेस ने इन नेताओं को भी स्वीकार कर लिया़ बदलाव के बाद भी भाजपा को विशेष चिंता नहीं रही, क्योंकि उसने कुक्षी, सोनकच्छ और जबेरा जैसे उपचुनाव में कांग्रेस की परंपरागत सीटों को अपने कब्जे में कर लिया था, मगर वर्ष के अंतिम माहों में हरदा नगर पालिका चुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त मिली और भाजपा की चिंता बढ़Þी़ इस चिंता के बाद दिसंबर माह के विधानसभा के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव ने परेशानी में डाला़ कांग्रेस ने इसके जरिए तथ्यों के आधार पर सरकार को घेरा और सरकार उन तथ्यों पर जवाब नहंी दे पाई़ इसके बाद सरकार के अलावा भाजपा के संगठन की चिंता बढ़Þी़ दोनों की चिंता इस बात को लेकर थी कि सामंतवादी माने जाने वाले नेता अजयसिंह इस बार सौम्य नजर आए और जो भी बातें विधानसभा में उन्होंने कही उससे वे गंभीर नेता की भूमिका में दिखाई दिए़ यह भाजपा की चिंता का कारण भी बना़ सत्र समाप्ति के बाद सत्ता और संगठन ने फिर मोर्चा और संगठनों को सक्रिय करना शुरु कर दिया़ संगठन और सत्ता दोनों मिलकर मिशन-2013 की तैयारी में जुट गए़
कांग्रेस के अलावा राज्य के छोटे दलों बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के अलावा अन्य अपना अस्तित्व तलाशते रहे़ प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमाभारती द्वारा बनाई गई पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी का उनके भाजपा में जाने के बाद विलय हो गया था़ इस कारण भाजश के नेता जरुर दिसंबर माह तक चिंतित थे, मगर विधानसभा के शीतकालीन सत्र में इन नेताओं को उस वक्त राहत मिली जब भाजश के विधायकों का भाजपा में विलय होने की घोषणा विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी ने की़ वैसे प्रदेश में बसपा और गोंगपा ने भी इस वर्ष अपने प्रदेश अध्यक्षों को बदला और नये व युवा लोगों को मौका दिया़ इसके अलावा सभी दल संगठन को मजबूत करने और सदस्यता अभियान को बढ़Þाने में जुटे रहे़ इनकी भूमिका विशेष रुप से सक्रिय नजर नहीं आई़

बड़बोलों ने बढ़Þाई चिंता
* बाबूलाल गौर : गुजरात में भ्रष्टाचार नहीं है, मध्यप्रदेश में के बारे में स्वयं आकलन करें़
* रामकृष्ण कुसमारिया : किसानों को लेकर कहा, पूर्व जन्म के पापों के कारण हो रही मौतें़
* कैलाश विजयवर्गीय : ठाकुर मेरे हाथ लौटा दो, तो इंदौर का विकास कैसे होगा यह बता दूंगा़
* गौरीशंकर बिसेन : पटवारी को उठक-बैठक लगवाने वाले बिसेन ने आदिवासियों का बताया था नासमझ़
* रघुनंदन शर्मा : मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक हैं बयानवीऱ
* यशोधरा राजे सिंधिया: भाजपा राजमाता सिंधिया के आदर्शों से भटक गयी है, यही हाल रहा तो पार्टी बिखर जाएगी़
* जुगलकिशोर बागरी: संगठन हमारी नहीं सुनता तो हमारा राजनीति में रहना उचित नहीं है़ प्रभारी मंत्री नागेन्द्रसिंह केवल आश्वासन देते हैं, काम नहीं करते
* रमेशचंद्र खटीक : अफसर सुनते नहीं है, मुख्यमंत्री को शिकायतें करने के बाद भी कोई हल नहीं होता है़

फेरबदल की चलती रही अटकलें
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें पूरे वर्षभर चलती रही़ कई बार तो यहां तक स्थिति निर्मित हुई कि एक-दो दिन में यह फेरबदल हो जाएगा, मगर मामला टलता ही गया़ दर्जनों मर्तबा ये सवाल उठे और मंत्रियों को चिंता में डालने के बाद श्री चौहान फेरबदल को टालते रहा़ हालांकि इसके पीछे यह माना जाता रहा कि पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व उन्हें इस बात की इजाजत नहीं दे रहा था़ वहीं यह भी कहा जाता रहा कि संगठन विवादित मंत्रियों को दबाव में लाने के लिए ऐसा करता रहा़
कांग्रेस में जारी रही गुटबाजी
गुटों में बटी कांग्रेस में वर्ष 2011 में भी गुटबाजी बरकरार रही़ यह गुटबाजी उस वक्त साफतौर पर दिखाई दी, जब प्रदेश अध्यक्ष पद पर कांतिलाल भूरिया और नेता प्रतिपक्ष पद पर अजयसिंह की नियुक्ति की गई़ हालांकि ताजपोशी के वक्त मंच पर सभी गुटों के नेता एक दिखाई देने के प्रयास करते रहे, मगर गुटबाजी साफ झलकती रही़ मई के बाद से अंतिम माह तक कमलनाथ, दिग्विजयसिंह, सुरेश पचौरी और ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक कभी भी एक होते नजर नहीं आए़ पचौरी अपना कद केन्द्र में बढ़Þाने का प्रयास भी करते रहे, जिसमें उन्हें उस वक्त सफलता मिली जब उन्हें़ शोधकार्यो के लिए बनाई समिति का अध्यक्ष बनाया गया़ इस समिति में दिग्विजयसिंह को सदस्य बनाया गया है़ अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में कांग्रेस विधायक दिखे तो सरकार के खिलाफ,मगर यहां जिस विधायक ने भी अपनी बात रखी वह अपने हिसाब से न की पार्टी गाइड लाइन से़

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें