किसी को पहले तो किसी को दूसरे चरण के मतदान होने का इंतजार
भोपाल। अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं के भाजपा में ष्शामिल होने के बाद मैदानी जमावट में उलझी कांग्रेस के सामने अपने उसके खुद के स्टार प्रचारकों ने संकट खड़ा किया है। अधिकांश स्टार प्रचारक अपने-अपने लोकसभा क्षेत्रों में उलझकर रह गए हैं। इसके चलते वे दूसरे लोकसभा क्षेत्रों में सक्रियता नहीं दिखा पा रहे हैं।
कांग्रेस ने भाजपा की तहर वैसे तो बड़ी संख्या में स्टार प्रचारक बनाए हैं। इनमें केन्द्रीय नेताओं के अलावा प्रदेश के नेताओं के नाम भी ष्शामिल हैं। फिलहाल केन्द्रीय नेताओं के रूप में राहुल गांधी की एक ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने दो लोकसभा सीटों के लिए चुनाव प्रचार अभियान की ष्शुरूआत कर सभाएं ली है। मंडला और ष्शहडोल संसदीय सीटों पर सभाएं वे कर चुके हैं। इसके बाद खरगोन, धार और मुरैना में उनकी सभाओं की तैयारी की जा रही है। इन सीटों पर कांग्रेस ने नए चेहरों पर दाव लगाया है इसके चलते कांग्रेस को भरोसा है कि यहां पर उनके उम्मीदवार अच्छी टक्कर देंगे। वहीं दूसरी और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के अलावा अन्य स्टार प्रचारकों ने अभी तक दूसरे संसदीय क्षेत्रों में दूरी बनाए रखी है। कमलनाथ खुद छिंदवाड़ा संसदीय सीट पर सक्रिय हैं। वे अब तक दूसरी संसदीय क्षेत्र में नहीं गए हैं। वहीं दिग्विजय सिंह राजगढ़ से चुनाव लड़ रहे हैं उन्होंने पदयात्रा ष्शुरू कर अपनी व्यस्तता को और बढ़ा लिया है। वे भी राजगढ़ से बाहर नहीं जा पा रहे हैं। विंध्य अंचल के कांग्रेस नेता पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह सिधी छोड़कर सतना और रीवा एवं ष्शहडोल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इसी तरह पूर्व नेता प्रतिपक्ष डा गोविंद सिंह भिंड में उलझ गए हैं। वे ग्वालियर-चंबल अंचल में उतनी सक्रियता नहीं दिखा पा रहे हैं जितनी की पार्टी ने उनसे अपेक्षा की थी। इनके अलावा विवेक तन्खा, तरूण भानोत, लखन घनघोरिया, सज्जन सिंह वर्मा, हिना कांवरे, रामनिवास रावत, आरिफ मसूद सहित अन्य स्टार प्रचारकों की हालत भी कुछ ऐसी ही है, जो अपने-अपने क्षेत्र में ही घिरे नजर आ रहे हैं। वे अब तक दूसरे संसदीय क्षेत्रों में सक्रिय नजर नहीं आए हैं।
पटवारी, उमंग की अग्नि परीक्षा
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के लिए यह लोकसभा चुनाव अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। पार्टी हाईकमान ने नई पीढ़ी को आगे लाने के मकशद से पुराने और कद्दावर नेताओं को संगठन से दूर तो कर दिया, मगर अब चुनावी समर में अनुभव की कमी भी नजर आ रही है। पार्टी छोड़कर जा रहे नेताओं को पार्टी में मनाने वाला कोई नजर नहीं आ रहा है। वहीं दोनों ही मालवा अंचल से आते है। इनके अंचल में इंदौर, उज्जैन, धार, रतलाम-झाबुआ, खरगोन और खंडवा संसदीय क्षेत्र आते हैं। इन सीटों पर भाजपा के अलावा संघ की सक्रियता भी बढ़ी है। अगर मालवा अंचल की छह सीटों में से कांग्रेस एक पर भी खाता नहीं खोल पाई तो इन दोनों नेताओं को लेकर कांग्रेस में फिर विरोध के स्वर उठ सकते हैं।

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