मंगलवार, 1 अगस्त 2023

आदिवासी समाज के लिए समर्पित नेता मनमोहन शाह बट्टी

पुण्यतिथि पर विशेष

 गोंडवाना की अलख जगाकर जीवनभर करते रहे संघर्ष

छिंदवाड़ा जिले में आदिवासी वर्ग के बीच अलग राजनीति की अलख जगाने वाले मनमोहन शाह बट्टी सदैव गोंडवाना के लिए संघर्षरत रहे। गोंडवाना के लिए उनका संघर्ष 2020 में उस वक्त ठहर गया, जब कोरोना के चलते उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद गोंडवाना की राजनीति में खासकर महाकौशल अंचल में ठहराव सा गया, लेकिन उनके द्वारा आदिवासी वर्ग में जगाई जागरूकता की अलख अब भी जल रही है और आदिवासियों को गोंडवाना के उनके लक्ष्य को पाने की प्रेरणा देती रहेगी।
मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के छोटे से आदिवासी ग्राम देवरी में जन्में मनमोहन शाह बट्टी आदिवासी समाज के उत्थान के लिए सदैव सक्रिय और संघर्षरत रहे। बट्टी आज हमारे बीच तो नहीं है, मगर उनके द्वारा किए गए काम उनको आजीवन याद रखेंगे। आदिवासी परिवार में जन्में बट्टी को सरकारी नौकरी रास नहीं आई। एम की शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे बालाघाट जिले के बैहर में पंचायत इंस्पेक्टर पद पर पदस्थ हुए। मगर आदिवासियों के कठिन जीवन, उनके साथ होने वाले अन्याय और शोशण को देख उनका मन कभी नौकरी में लगा ही नहीं। इसके चलते उन्होंने नौकरी से इस्तीफा देकर आदिवासी समाज के उत्थान के लिए ऐसे सफर की शुरूआत की, जिसमें सदैव संघर्ष ही संघर्ष था। इस सफर की शुरूआत के दौरान उन्होंने आदिवासियों के बीच पहुंचकर करीब से आदिवासियों की समस्याओं को जाना और आदिवासियों को उनके अधिकारों को लिए लड़ने के लिए तैयार किया। इसी दौरान वे गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के स्वर्गीय हीरासिंह मरकाम के संपर्क में आए। स्वर्गीय दादा हीरासिंह भी बट्टी की प्रतिभा के कायल हुए बिना नहीं रहे। उन्हें यह विश्वास था कि मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में मनमोहन शाह बट्टी ही एक ऐसा व्यक्ति है जो आदिवासियों के दर्द को समझ सकता है और उनके लिए लड़ सकता है। यही वजह थी कि बट्टी को दादा हीरासिंह मरकाम ने आदिवासियों के संघर्ष की राह के लिए चुना। उन्हें मैदान में सक्रिय रहने को कहा और उनके राजनीतिक जीवन की शुरूआत कराई।
स्वर्गीय बट्टी ने भी अपना राजनीतिक सफर शुरू करते हुए आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई का जिम्मा लिया। इस जिम्मेदारी को उन्होंने बखूबी निभाया भी। इसका परिणाम था कि जब 2003 के विधानसभा चुनाव हुए तो महाकौशल अंचल में अचानक गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का ऐसा उदय हुआ कि उसने प्रदेश के दोनों बड़े राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस सहित सभी को आश्चर्य में डाल दिया। इस चुनाव में पहली बार गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के बैनर तले तीन युवा आदिवासी चुनाव जीतकर आए। इनमें अमरवाड़ा विधानसभा क्षे़त्र से मनमोहन शाह बट्टी भी एक थे। इसके बाद बट्टी ने अपने जीवनकाल तक कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। धुन के सवार बट्टी को हमेशा आदिवासी नौजवानों को आगे बढ़ाने यानि उन्हें रोजगार के साधन मुहैया कराने की ललक रही। वे किसी भी तरह से युवाओं को ऐसे रोजगार उपलब्ध कराना चाहते थे, जिससे वे अपने परिवार का पालन-पोषण ठीक से कर सकें। इतना ही नहीं उन्होंने आदिवासी वर्ग के बच्चों को शिक्षित कराने के लिए भी काफी प्रयास किया। साथ ही साथ गोंडी भाषा को राजभाषा का दर्जा भी दिलाया। इस सबके पीछे उनका एक ही मकसद रहा, किसी भी तरह से आदिवासी समाज का उत्थान हो और आदिवासी वर्ग किसी दल का मोहरा बनकर रहे। इसके लिए वे लगातार संघर्षरत रहे। उनके संघर्ष ने उन्हें गोंडवाना के प्रमुख नेता के रूप में उन्हें पहचान दी। वे आदिवासियों की शक्ति को एकजुट करने में लगे रहे। इस दौरान उन्होंने अपने परिवार और दोनों बच्चियों की जिम्मेदारी एक तरह से अपनी पत्नी को सौंप दी और खुद को आदिवासी समाज के लिए समर्पित कर दिया।
ऐतिहासिक व्यापार मेला



बट्टी ने छिंदवाड़ा जिले के देवरी में 2008 में एक ऐतिहासिक आदिवासी व्यापार मेले का आयोजन किया। इस मेले में उन्होंने केवल आदिवासी समाज के युवाओं और लोगों को ही दुकानें आवंटित कराई। इन दुकानों की खासियत भी यह रही कि हर दुकान पर आदिवासी समाज के सामान विक्रय के लिए रखे गए। इनमें खान-पान, वस्त्र और अन्य दैनिक जीवन की उपयोगी वस्तुओं को उन्होंने रखा। यह मेला खासा सफल मेला साबित हुआ। इस मेले के पीछे मनमोहन शाह बट्टी का उद्देश्य यह था कि आदिवासी वर्ग को यह सिखाना चाहते थे कि मजदूरी ही करे, बल्कि सफल व्यवसायी भी बनें। मेले में हर समान की दुकानों के नाम भी गोंडवाना के नाम पर रखे गए। कुछ इस तरह गोंडवाना वस्त्रालय, गोंडवाना भोजनालय, गोंडवाना सिक्युरिटी आदि। बट्टी का एक ही प्रयास होता था कि आदिवासी वर्ग मजदूरी करने को विवश हो, बल्कि खुद अपना व्यवसाय करे। इस लक्ष्य को कुछ हद तक उन्होंने पाया भी। कुछ युवाओं ने उनकी प्रेरणा को समझा और अपने व्यवसाय शुरू किए और सफल व्यवसायी भी बने।
पीस फाउंडेशन स्थापित किया
आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बट्टी ने एक गोंडवाना पीस फाउंडेशन के नाम से एनजीओ भी बनाया। इस एनजीओ के माध्यम से लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी अहम सहूलियतें भी दिलाई। उन्होंने 9 अगस्त 2017 को विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आदिवासी क्षेत्र में उन्होंने आदिवासी वर्ग के राज्यपालों, सांसदों और बड़े पद पर बैठे आदिवासी वर्ग के लोगों को अपने क्षेत्र में बुलाया। यहां पर उन्हों ने कार्यक्रम आयोजित कर आदिवासी समाज के युवाओं को यह बताने की कोशिश की कि अगर वे पढ़ाई के क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं, तो बड़े पद पर बैठ सकते है। साथ ही अपने समाज का उत्थान कर सकते हैं।
हर वर्ग, हर समाज के बीच पैठ जमाई
हर क्षेत्र हर वर्ग के लिए भी काम किया। हर समाज के लोगों के साथ वे जुड़े और लोगों को अपने से उन्हांने जोड़ा। बट्टी की खासियत यह भी रही कि वे हर समाज को महत्व देते रहे। आदिवासी  समाज के उत्थान की उन्होंने भरपूर कोशिश की, लेकिन जैसा वे करना चाहते थे, नहीं कर पाए। इसके लिए हमेशा वे सोचा करते थे कि कहां कमजोरी रह गए, इसे कैसे दूर करें।
अपनों ने ही किया किनारा
हाजिर जवाब और स्पष्ट बोलने की आदत के चलते कई बार उन्हें लोग गलत भी समझ लेते थे। यही वजह रही कि 2003 के बाद उन्हें दोबारा सदन में पहुंचने का अवसर नहीं मिला। यहां तक की जिस गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को महाकौशल अंचल से निकालकर प्रदेश में स्थापित किया, उससे जुड़े नेताओं ने ही उनकी कदर नहीं की। इसके चलते 2008 के चुनाव में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने बट्टी को टिकट नहीं दिया। इससे वे नाराज जरूर हुए, मगर टूटे नहीं। उन्होंने राष्टीय गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। मगर जिस आदिवासी वर्ग के उत्थान के लिए वे जुटे रहे उसका साथ ही उन्हें इस चुनाव में नहीं मिला। इसके पीछे थी मूल वजह राजनीतिक के सहारे वे जिस समाज के उत्थान में जुटे थे वह समाज की राजनीति का शिकार होता नजर आया और बट्टी चुनाव हार गए, लेकिन हारे फिर भी नहीं। 2008 से लेकर वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव तक उन्होंने विधानसभा और लोकसभा चुनाव में तीसरी शक्ति के रूप में सर्वाधिक वोट हासिल किए। उनकी राजनीतिक संगठन शक्ति का लोहा कांग्रेस और भाजपा के नेता भी मानते थे।
कभी हार मानने वाला भी हार गया
आखिरकार जीवन में कभी हारने वाला, सदैव समाज के लिए तत्पर रहने वाले इस आदिवासी  नेता को विश्व में फैली कोरोना वायरस ने हरा दिया। कोरोना संक्रमण के चलते वे राजधानी भोपाल के निजी अस्पताल में संघर्ष करते रहे और आखिरकार 2 अगस्त 2020 को अपने जीवन की अंतिम सांस इस नेता ने ली। तब तक वे आदिवासी वर्ग में एक सामाजिक क्रांति की अलख तो जगा चुके थे।

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