रविवार, 9 जून 2019

आभूषणों के महत्व बता रहे कलाकार


राजधानी स्थित मानव संग्रहालय में इन दिनों भील जनजाति के पारंपरिक आभूषण बनाने का प्रशिक्षण भील जनजाति के कलाकाल दे रहे हैं. ये कलाकार महिला और पुरषों द्वारा पहले जाने वाले अभूषणों के निर्माण की हर बारिकियों की जानकारी प्रशिक्षणार्थियों को बता रहे हैं.
संग्रहालय के शैक्षणिक कार्यक्रम करो और सीखो के अंर्तगत   आयोजित भील जनजाति की आभूषण निर्माण कला पर प्रशिक्षण कार्यशाला प्रारंभ किया है. इस संबंध में डा. अशोक कुमार शर्मा ने बताया कि भील स्त्रियां और पुरूष शरीर के विभिन्न अंगों में कथीर,चांदी और कांसे धातु से निर्मित गहने पहनते है. भीली गीत में आभूषणों का सुंदर वर्णन हुआ है. भील जनजातीय चार वर्गों भील, भिलाला, पटलिया और रांठ में पाई जाती है. उसके उपवर्ग है धानुका व नायकड़ा माने जाते हैं. प्रत्येक वर्ग में अनेक जनजातियां हैं. भील स्वावलंबी और परिश्रमी है, इसलिए सम्मानपूर्ण जीवन उन्हें पसंद है. 
डा. शर्मा ने बताया कि भीलों में कहावत ही है कि जुग जैरी तो मुलक बैरी अर्थात कड़वी जुबान से ही सारा संसार हमारा दुश्मन बन जाता है. कुछ न मिले, किंतु मधुर वाणी मिले, पर्याप्त है. इनके पास अपनी लोककथा, गल्प, गीतों, मिथ, किंवदंतियों, मुहावरों व कहावतों का विषद भंडार है, जिससे इनकी लोक परंपरा सदैव अग्रगामी रही है. इन प्रकृति पुत्रों के पारंपरिक विश्वासों, रीति-रिवाजों को संरक्षित कर संस्कृति को जीवंत रखने हेतु यह मानव संग्रहालय का एक प्रयास है.
कार्यक्रम में प्रतिभागिता कर रहे पंजीकृत प्रतिभागियों को पारंपारिक भील कलाकार,  गंगू बाई द्वारा भील जनजाति के पारंपरिक आभूषण निर्माण कला पर प्रशिक्षण देते हुए इनसे जुड़ी हुई. मिथ कथाओं में एवं वास्तविक जीवन में आभूषणों के महत्व के बारे में बताते हुए कहा कि भील पुरूष कानों में मूंदड़े, कर्णबालियां (टोटवा), गले में बनजारी या सांकल (सांकली), हाथ में नारह-मुखी (चांदी के कड़े), भुजा में हठके और पांव में बेड़ी पहनते है. भील स्त्रियां सिर में बोर, राखड़ी, छिवरा, झेला (चांदी की लड़ियों वाली सौंकल), बस्का (चांदी या कथीर के चिमटे), कान में टोकड़ी मोरफैले, झांझर्या (एक गोल रिंग में गोल-गोल कथीर के छल्ले), नाक का कांटा (लवंग फूल), नथ, गले में तागली, हार, गलशन (मोतियों की माला), जरबंद (पैसों की माला), हाथ में हठका, करोंदी, कावल्या (कांच की चूड़ियां), हाथ सांकरी, भुजा में बास्ट्या (बाजूबंद), हठके,हाथ की अंगुलियों में मुंदड़ी, पैरों में बाकड़िया, रमलो, लंगर लोड़, नांगर, तोड़ा, पावलिया, पैंरों की अंगुलियों में बिछिया भीली महिलाओं के विशिष्ट आभूषण सौभाग्य के प्रतीक है. 

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