समाज में गौरव और समृद्धि का प्रतीक माने जाते हैं ये बर्तन
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में ग्राम लोंगपी, जिला उखरुल, मणिपुर से आए पारम्परिक कलाकारों ने काली मिट्टी का बर्तन (पॉटरी) बनाकर प्रदर्शित किया. इन बर्तनों का उपयोग सामाजिक दावत के दौरान भोजन तैयार करने में किया जाता है. यह समाज के एक परिवार का गौरव और समृद्धि का प्रतीक भी है.
इस बारे में संग्रहालय के एन सकमाचा सिंह (संग्रहालय एसोसिएट्स) ने बताया कि लोंगपी हैम के नाम से जाना जाने वाला काली मिट्टी का बर्तन (पॉटरी) बनाने की कला नागा जनजातियों द्वारा किया जाता हैं. इस शिल्प की उत्पत्ति का श्रेय देवी पंथोबी को देते हैं, जो इस कला-निर्माण की जननी हैं. यही कारण है कि लोंगपी पॉटरी का उपयोग बच्चे के जन्म और शादी जैसे उत्सव के अवसरों पर अनुष्ठान करने में किया जाता है. इनके निर्माण के लिए कच्चे माल के रूप में दो तरह के चट्टानों का इस्तेमाल होता है. एक- मौसम और वायुमंडल के प्रभाव से क्षरित हुई चट्टानें (वेदर्ड रॉक) और दूसरी सर्पिल चट्टानें (सर्पेंटाइन रॉक).
स्थानीय निवासियों के मुताबिक ऐसी चट्टानें सिर्फ लांगपी में ही मिलती हैं. मिट्टी जैसा गाढ़ापन लाने के लिए इन चट्टानी पत्थरों को पीस कर उसको पानी के साथ 5:3 के अनुपात में मिला लिया जाता है. इस हल्के भूरे मिश्रण को पूरा दिन गूंथने के बाद शुरूआती स्लैब बनाने के लिए एक लकड़ी के तख्ते पर चपटा फैला लिया जाता है. अनोखी बात यह है कि लांगपी बर्तनों को कुम्हार के चाक पर आकार नहीं दिया जाता. हर बर्तन को सांचों और औजारों की मदद लेकर हाथ से ही आकार दिया जाता है. एक बार जब गढ़ी हुई मिट्टी सूख कर सख्त हो जाती है, तब उसको खुली भट्ठी में 1200 डिग्री सेंटीग्रेड से भी ज्यादा तेज ताप में 5 से 7 घंटे तक पकाया जाता है. बर्तनों को गर्म ही बाहर निकाल लिया जाता है और उनको माछी नामक एक स्थानीय पत्ते से घिस-घिस कर चिकना बनाया जाता है और खूब चमकाया जाता है.
ऐसा माना जाता है कि एल्युमिनियम के बर्तनों के चलन में आने से पहले तांगखुल नागा जनजाति के लोग मुख्य बर्तनों के रूप में काले पत्थर के बड़े-बड़े बर्तनों का ही इस्तेमाल करते थे. एक जमाने में इन बर्तनों को शाही बर्तन भी कहा जाता था, क्योंकि उस वक्त मणिपुर के अमीर और नवाबी ठाठ-बाट वाले लोग ही ये बर्तन खरीदने की ताकत रखते थे. बर्तन में रखा खाना चूल्हे से उतारने के काफी समय बाद तक गर्म बना रहता है. बर्तन में इस्तेमाल किए गए कच्चे पदार्थ बिलकुल कुदरती होते हैं और इनमें कोई रसायन इस्तेमाल नहीं किया जाता जिसकी वजह से उनमें बना खाना सेहत के लिए बिलकुल हानिकारक नहीं होता.
परंपरागत रूप से, लोंगपी कुम्हार सामान्य परिवार और सामान्य घरेलू बर्तनों के अलावा सामाजिक स्थिति के व्यक्ति के लिए हम्पी (एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के बर्तन) तैयार करते थे. हम्पी का उपयोग सामाजिक दावत के दौरान बड़े पैमाने पर भोजन तैयार करने में किया जाता है और यह समाज में एक परिवार का गौरव, शक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में ग्राम लोंगपी, जिला उखरुल, मणिपुर से आए पारम्परिक कलाकारों ने काली मिट्टी का बर्तन (पॉटरी) बनाकर प्रदर्शित किया. इन बर्तनों का उपयोग सामाजिक दावत के दौरान भोजन तैयार करने में किया जाता है. यह समाज के एक परिवार का गौरव और समृद्धि का प्रतीक भी है.
इस बारे में संग्रहालय के एन सकमाचा सिंह (संग्रहालय एसोसिएट्स) ने बताया कि लोंगपी हैम के नाम से जाना जाने वाला काली मिट्टी का बर्तन (पॉटरी) बनाने की कला नागा जनजातियों द्वारा किया जाता हैं. इस शिल्प की उत्पत्ति का श्रेय देवी पंथोबी को देते हैं, जो इस कला-निर्माण की जननी हैं. यही कारण है कि लोंगपी पॉटरी का उपयोग बच्चे के जन्म और शादी जैसे उत्सव के अवसरों पर अनुष्ठान करने में किया जाता है. इनके निर्माण के लिए कच्चे माल के रूप में दो तरह के चट्टानों का इस्तेमाल होता है. एक- मौसम और वायुमंडल के प्रभाव से क्षरित हुई चट्टानें (वेदर्ड रॉक) और दूसरी सर्पिल चट्टानें (सर्पेंटाइन रॉक).
स्थानीय निवासियों के मुताबिक ऐसी चट्टानें सिर्फ लांगपी में ही मिलती हैं. मिट्टी जैसा गाढ़ापन लाने के लिए इन चट्टानी पत्थरों को पीस कर उसको पानी के साथ 5:3 के अनुपात में मिला लिया जाता है. इस हल्के भूरे मिश्रण को पूरा दिन गूंथने के बाद शुरूआती स्लैब बनाने के लिए एक लकड़ी के तख्ते पर चपटा फैला लिया जाता है. अनोखी बात यह है कि लांगपी बर्तनों को कुम्हार के चाक पर आकार नहीं दिया जाता. हर बर्तन को सांचों और औजारों की मदद लेकर हाथ से ही आकार दिया जाता है. एक बार जब गढ़ी हुई मिट्टी सूख कर सख्त हो जाती है, तब उसको खुली भट्ठी में 1200 डिग्री सेंटीग्रेड से भी ज्यादा तेज ताप में 5 से 7 घंटे तक पकाया जाता है. बर्तनों को गर्म ही बाहर निकाल लिया जाता है और उनको माछी नामक एक स्थानीय पत्ते से घिस-घिस कर चिकना बनाया जाता है और खूब चमकाया जाता है.
ऐसा माना जाता है कि एल्युमिनियम के बर्तनों के चलन में आने से पहले तांगखुल नागा जनजाति के लोग मुख्य बर्तनों के रूप में काले पत्थर के बड़े-बड़े बर्तनों का ही इस्तेमाल करते थे. एक जमाने में इन बर्तनों को शाही बर्तन भी कहा जाता था, क्योंकि उस वक्त मणिपुर के अमीर और नवाबी ठाठ-बाट वाले लोग ही ये बर्तन खरीदने की ताकत रखते थे. बर्तन में रखा खाना चूल्हे से उतारने के काफी समय बाद तक गर्म बना रहता है. बर्तन में इस्तेमाल किए गए कच्चे पदार्थ बिलकुल कुदरती होते हैं और इनमें कोई रसायन इस्तेमाल नहीं किया जाता जिसकी वजह से उनमें बना खाना सेहत के लिए बिलकुल हानिकारक नहीं होता.
परंपरागत रूप से, लोंगपी कुम्हार सामान्य परिवार और सामान्य घरेलू बर्तनों के अलावा सामाजिक स्थिति के व्यक्ति के लिए हम्पी (एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के बर्तन) तैयार करते थे. हम्पी का उपयोग सामाजिक दावत के दौरान बड़े पैमाने पर भोजन तैयार करने में किया जाता है और यह समाज में एक परिवार का गौरव, शक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है.

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