मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के स्थापित नेताओं द्वारा कांग्रेस और भाजपा में चले जाने के बाद अब बसपा की नजर प्रदेश के ओबीसी मतदाता पर टिकी है. बसपा इस बार अपने वोट बैंक वाले संसदीय क्षेत्रों में ओबीसी वर्ग के नेता को प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारते हुए जीत की राह मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है.
मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का वोट बैंक विंध्य और ग्वालियर-चंबल अंचल रहा है. इन अंचलों में सतना, रीवा, मुरैना, भिंड संसदीय क्षेत्रों में उसका खासा प्रभाव रहा है, मगर इस बार के चुनाव में बसपा के सामने उसके कैडर के नेताओं का टोटा उसे परेशानी में डाल रहा है. विंध्य से देवराज पटेल और विद्यावति पटेल जैसे पूर्व विधायकों ने कांग्रेस का दामन थाम लिया तो हाल ही में बसपा के मुरैना जिले के पूर्व विधायक बलवीर सिंह दंडोतिया ने भी कांग्रेस की सदस्यता ले ली है. इसके अलावा बसपा को मध्यप्रदेश में मजबूती प्रदेश करने वाले कांशीराम के निकटतम रहे फूलसिंह बरैया ने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया है. बरैया को कांग्रेस ग्वालियर या फिर भिंड से चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है. इस तरह बसपा के अपने कैडर के कद्दावर नेताओं के दूसरे दलों में जाने से उसके सामने नेताओं और जिताऊ उम्मीदवारों को टोटा आ गया है. इसके चलते अब बसपा ने पिछड़े वर्ग के नेताओं को आकर्षित कर मैदान में उतारने का फैसला लिया है.
बसपा ने सतना में अच्छेलाल कुशवाह को मैदान में उतार है, जो पिछड़े वर्ग से आते हैं, जबकि रीवा सहित अन्य स्थानों पर भी बसपा पिछड़े वर्ग के नेताओं को मैदान में उतारना चाह रही है. बसपा नेताओं का मानना है कि बसपा का अपना वोट बैंक तो उसके पास है, मगर जीत के लिए उसे पिछड़े वर्ग का साथ जरुरी हो गया है.
भीमसिंह पटेल से की थी शुरुआत
बसपा ने पिछड़े वर्ग के नेता को मैदान में उतारकर ही मध्यप्रदेश में अपना पहला खाता खोला था. वर्ष 1991 के लोकसभा चुनाव में रीवा से पिछड़े वर्ग के नेता भीमसिंह पटेल को बसपा ने मैदान में उतारा था, वे यहां से चुनाव जीते थे. यह बसपा की मध्यप्रदेश में पहली जीत थी. इसके बाद बसपा ने 1996 के लोकसभा चुनाव में भी भीमसेन पटेल को रीवा से मैदान में उतारकर जीत हासिल की थी.
मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का वोट बैंक विंध्य और ग्वालियर-चंबल अंचल रहा है. इन अंचलों में सतना, रीवा, मुरैना, भिंड संसदीय क्षेत्रों में उसका खासा प्रभाव रहा है, मगर इस बार के चुनाव में बसपा के सामने उसके कैडर के नेताओं का टोटा उसे परेशानी में डाल रहा है. विंध्य से देवराज पटेल और विद्यावति पटेल जैसे पूर्व विधायकों ने कांग्रेस का दामन थाम लिया तो हाल ही में बसपा के मुरैना जिले के पूर्व विधायक बलवीर सिंह दंडोतिया ने भी कांग्रेस की सदस्यता ले ली है. इसके अलावा बसपा को मध्यप्रदेश में मजबूती प्रदेश करने वाले कांशीराम के निकटतम रहे फूलसिंह बरैया ने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया है. बरैया को कांग्रेस ग्वालियर या फिर भिंड से चुनाव मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है. इस तरह बसपा के अपने कैडर के कद्दावर नेताओं के दूसरे दलों में जाने से उसके सामने नेताओं और जिताऊ उम्मीदवारों को टोटा आ गया है. इसके चलते अब बसपा ने पिछड़े वर्ग के नेताओं को आकर्षित कर मैदान में उतारने का फैसला लिया है.
बसपा ने सतना में अच्छेलाल कुशवाह को मैदान में उतार है, जो पिछड़े वर्ग से आते हैं, जबकि रीवा सहित अन्य स्थानों पर भी बसपा पिछड़े वर्ग के नेताओं को मैदान में उतारना चाह रही है. बसपा नेताओं का मानना है कि बसपा का अपना वोट बैंक तो उसके पास है, मगर जीत के लिए उसे पिछड़े वर्ग का साथ जरुरी हो गया है.
भीमसिंह पटेल से की थी शुरुआत
बसपा ने पिछड़े वर्ग के नेता को मैदान में उतारकर ही मध्यप्रदेश में अपना पहला खाता खोला था. वर्ष 1991 के लोकसभा चुनाव में रीवा से पिछड़े वर्ग के नेता भीमसिंह पटेल को बसपा ने मैदान में उतारा था, वे यहां से चुनाव जीते थे. यह बसपा की मध्यप्रदेश में पहली जीत थी. इसके बाद बसपा ने 1996 के लोकसभा चुनाव में भी भीमसेन पटेल को रीवा से मैदान में उतारकर जीत हासिल की थी.

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