मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपना ही पिछला रिकार्ड तोड़ दिया है. भाजपा ने इस चुनाव में पहली बार 29 में से 28 सीटों पर बढ़त बनाई और जीत की ओर कदम बढ़ाया. भाजपा की इस जीत के चलते कांग्रेस के दिग्गजों को अपने घरों में ही हार का मुंह देखना पड़ा है.
एग्जिट पोल के बाद भी कांग्रेस द्वारा मध्यप्रदेश में एक दर्जन सीटों पर किए जा रहे जीत के दावे आज फिर धराशाही हो गए. आज सुबह जब राज्य के सभी 51 जिला मुख्यालयों पर मतगणना शुरु हुई तो बालाघाट और गुना संसदीय क्षेत्र में जरुर कांग्रेस के प्रत्याशियों को कुछ समय के लिए बढ़त मिली, मगर दोपहर होते-होते यहां के रुझान भी भाजपा के पक्ष में चले गए. भाजपा के पक्ष में गए रुझानों के चलते भोपाल में दिग्विजय सिंह पिछड़े ही साथ ही कांग्रेस के दिग्गज नेता गुना से ज्योरादित्य सिंंधिया, रतलाम-झाबुआ से कांतिलाल भूरिया, खण्डवा से पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, मुरैना से रामनिवास रावत, सीधी से अजय सिंह, मंदसौर से मीनाक्षी नटराजन, जबलपुर से विवेक तन्खा, खजुराहो से कविता सिंह, इंदौर से पंकज संघवी जैसे नेता भी हार की ओर बढ़ते चले गए. कांगे्रस प्रत्याशी अपनी हार तो कबूल करते नजर आए, मगर वे यह नहीं समझ पाए कि परिणाम एकदम कैसे विपरीत हुए. अधिकांश प्रत्याशियों ने कहा कि परिणाम उनकी उम्मीद से विपरीत रहे.
राजधानी भोपाल सहित राज्य के सभी मतगणना केन्द्रों पर दोपहर के बाद माहौल भी बदला नजर आया. अधिकांश मतगणना केन्द्रों से कांग्रेस प्रत्याशी अपने घरों की ओर वापस जाते नजर आए और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जोश भी निराशा में बदलता गया. कई स्थानों पर तो मतगणना केन्द्रों पर भाजपा के कार्यकर्ता और पदाधिकारी कांग्रेस पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से ज्यादा संख्या में उपस्थित रहे. प्रदेश में यह पहला अवसर है जब लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को इस तरह की बुरी हार का सामना करना पड़ा है. बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस गुना और छिंदवाड़ा में जीती थी, मगर इस बार गुना भी उसके हाथ से फिसल गया.
दिग्विजय को लगा दोहरा झटका
मध्यप्रदेश की भोपाल संसदीय सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी दिग्विजय सिंह जब प्रज्ञा सिंह ठाकुर से पिछड़ते नजर आए तो उनके समर्थकों में मायूसी छाई रहे. वैसे वे भी अपनी पत्नी अमृता सिंह के साथ मतगणना स्थल पर पहुंचे थे और पूर्व मंत्री उमांशकर गुप्ता के साथ बैठे थे. मगर जब मतगणना के रुझानों में वे भाजपा प्रत्याशी से पिछड़ते नजर आए तो निराश भी हुए. सिंह को भोपाल के अलावा उनके अपने गढ़ राजगढ़ संसदीय क्षेत्र में भी कांग्रेस प्रत्याशी मोना सुस्तानी के पिछड़ने से लगा. सिंह को कांग्रेस ने भोपाल से मैदान में उतारा था, जिसके चलते वे भोपाल तक की सीमित होकर रह गए थे. साथ उनकी पुत्र जयवर्धन सिंह और भाई लक्ष्मण सिंह ने समर्थकों के साथ भोपाल में डेरा जमाए रखा जिसके चलते राजगढ़ संसदीय क्षेत्र में सिंह ताकत के साथ ध्यान नहीं दे पाए और दोनों ही स्थानों पर भाजपा से कांग्रेस पिछड़ती चली गई.
विधानसभा के बाद अब लोकसभा भी हारे
कांग्रेस ने सीधी में भाजपा की रीति पाठक के खिलाफ कांग्रेस के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को मैदान में उतारा था. इसी तरह मुरैना में रामनिवास रावत को मैदान में उतारा. दोनों ही प्रत्याशी विधानसभा चुनाव में हार चुके थे. इसके बाद भी कांग्रेस ने इन पर भरोसा जताया और उनकी पसंद के क्षेत्र से मैदान में उतारा, मगर कांग्रेस को यहां पर कोई सफलता हासिल नहीं हुई. दोनों ही स्थानों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. रावत ने प्रयास तो खूब किए, मगर उनका प्रयास यहां सफल नहीं हुआ. रावत ने इस बार भाजपा के नाराज चल रहे नेताओं को अपने साथ लिया, मगर यहां उनका गणित नहीं बैठा. वैसे ही अजय सिंह भी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरे थे, मगर उन्हें इस बार भी निराशा ही हाथ लगी. अजयसिंह पिछला लोकसभा चुनाव भी सतना से गणेश सिंह से हार चुके थे.
संघवीं और अशोक सिंह को फिर हाथ लगी निराशा
इंदौर संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के अलावा पूर्व में विधानसभा चुनाव हारे पंकज संघवी और ग्वालियर से तीन बार लगातार लोकसभा चुनाव हारे अशोक सिंह पर दाव खेला वह भी मोदी सुनामी में असफल ही रहा. लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के मैदान में न होने से पंकज संघवी पर कांग्रेस को भरोसा था. यहां पर कमलनाथ मंत्रिमंडल के तीन मंत्रियों जीतू पटवारी, सज्जन सिंह वर्मा और तुलसी सिलावट पूरी ताकत से मैदान में थे. इसी तरह ग्वालियर में महल के अलावा मंत्री प्रद्युमन सिंह तोमर और इमरती देवी को जिम्मेदारी दी गई थी. मंत्रियों का प्रभाव भी जनता पर बेअसर दिखाई दिया. साथ ही यह पहला अवसर भी रहा, जब ग्वालियर के मतदाता ने महल को अस्वीकार किया.
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