
मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर कांग्रेस द्वारा बहुमत साबित करने की मांग को लेकर अकेले पड़ गए हैं. भाजपा संगठन ने उनका साथ नहीं दिया है. वहीं कोई भी नेता उनके समर्थन में सामने नहीं आया है.
लोकसभा चुनाव के लिए आए एग्जिट पोल के बाद भाजपा की ओर से सोमवार को सबसे पहले नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कमलनाथ सरकार पर हमला बोला. उन्होंने मांग कर डाली की कांग्रेस सरकार को विधानसभा का विशेष सत्र लाकर बहुमत साबित करना चाहिए. इसके लिए उन्होंने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को पत्र भी लिखने की बात भी कही. मगर भार्गव के इस बयान से पूरी भाजपा अलग नजर आई. पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंंह चौहान ने तो भार्गव की बात का जिक्र किया और न ही इस मुद्दे पर किसी तरह की कोई टिप्पणी की. वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह भी इस मुद्दे पर मौन रहे. मामला कुछ ऐसा तूल पकड़ा की बात पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तक पहुंचा दिया गया. शाह ने भी इस पर आपत्ति जताई और कहा कि संगठन और राष्ट्रीय इकाई को भरोसे में लेकर नेता प्रतिपक्ष को कोई बात कहनी चाहिए थी. बताया जाता है कि प्रदेश के नेताओं द्वारा की गई शिकायत के बाद शाह ने नेता प्रतिपक्ष को इस मामले में बयानबाजी से बचने की सलाह दी है. सूत्रों के अनुसार प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी आलाकमान से नेता प्रतिपक्ष द्वारा एग्जिट पोल ने नतीजों के आधार पर ही बहुमत साबित करने की चुनौती पर ऐतराज जताया है. इसके अलावा प्रदेश भाजपा के कई और नेता भी इससे खुश नहीं हैं.
पत्र में जिक्र नहीं किया बहुमत साबित करने का
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की नाराजगी और प्रदेश के नेताओं द्वारा नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव द्वारा दिए गए बहुमत साबित करने के बयान के बाद उनसे दूरी बनने के चलते भार्गव को अपनी बात से हटना पड़ा. यही वजह रही है कि उन्होंने राज्यपाल को जो पत्र लिखा उसमें कहीं भी यह जिक्र नहीं किया कि विशेष सत्र में कांग्रेस को बहुमत साबित करना चाहिए, बल्कि उन्होंने पत्र में लिखा है कि तात्कालिक महत्व के विषयों पर चर्चा की आवश्यकता बताते हुए विशेष सत्र बुलाया जाए. भाजपा में ही उनकी इस मांग को लेकर असहमति नजर आई है.
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