अशोक मनवानी
जनसम्पर्क कार्य के महत्व से शासकीय और कार्पोरेट क्षेत्र का हर व्यक्ति भली-भांति परिचित है. आज किसी व्यक्ति या संस्थान की प्रतिष्ठा में वृद्धि सिर्फ उसके श्रेष्ठ कार्यों से नहीं होती बल्कि अच्छी छवि बनाने के लिए किए गए प्रयास बहुत मायने रखते हैं. सरकारों के जनसम्पर्क विभाग आम जनता को सूचित, शिक्षित और जागरूक बनाने का कार्य करते हैं. यही नहीं सरकार के प्रमुख लोगों की छवि बनाना भी जनसम्पर्क विभाग के प्रमुख दायित्व में शामिल हो गया है. व्यक्ति और संस्थान दोनों की अच्छी छवि से यह धारणा बनती है कि वर्तमान व्यवस्था श्रेष्ठ अथवा बेहतर है. आमतौर पर प्रत्येक सरकार कुछ खास क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान देती है. इसी वजह से प्रचार कार्य में यह स्थापित किया जाता है कि पूर्व सरकार ने इन क्षेत्रों की उपेक्षा की अथवा पर्याप्त ध्यान नहीं दिया. इससे यह सिद्ध होता है कि वर्तमान सरकार जनकल्याण के प्रति अधिक प्रतिबद्ध है. वास्तव में ऐसा होता भी है. यदि हम कहें कि काफी चुनौती पूर्ण होता है जनसम्पर्क अधिकारी का दायित्व, तो गलत नहीं होगा. इस कार्य से जुड़े व्यक्ति को पल-पल नई सूचनाएं और जानकारियां प्राप्त करने की ललक होना चाहिए.
आज अनेक संस्थान सिर्फ सही दिशा में किए जाने वाले प्रचार और जनसम्पर्क की वजह से तुलनात्मक रूप से बेहतर माने जाने लगे हैं. बदलते समय में विकास की प्राथमिकताएं भी बदलती हैं. यदि किसी राज्य में बुनियादी क्षेत्रों में स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है तो उसे प्रभावी ढंग से रेखांकित भी किया जाना चाहिए. यह प्रचार का अतिरेक नहीं. वास्तविक प्रगति का वास्तविक प्रचार होना ही चाहिए. जनसम्पर्क अधिकारी संस्थान की कोशिशों को बेहतर जानता है. प्रत्येक बदलाव पर उसकी पैनी नजर होती है. उससे बेहतर कोई भी संस्थान को नहीं जानता, समझता.
जनसम्पर्क अधिकारी के रूप में पांच मुख्यमंत्रियों, एक राज्यपाल, तीन मुख्य सचिवों और लगभग पंद्रह मंत्रियों के साथ मैंने कार्य किया है. मेरा अनुभव है कि संदेश स्पष्ट हो, बात नपी तुली हो और उसे कहने का तरीका बहुत कठिन भी न हो तब आपका समाचार और विचार पत्र-पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त कर ही लेता है. यह मैंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से सीखा है कि समाचार में दोहराव और लम्बे वाक्यों से जरूर बचा जाए. आज प्रचार के लिए पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी के अलावा आज सोशल मीडिया की भी आवश्यकता होती है. एक समय था जब लोक माध्यमों का प्रयोग भी काफी होता था. मध्यप्रदेश के गठन के बाद सूचना प्रकाशन विभाग ने गांव-गांव में शिक्षा, परिवार नियोजन और देश-भक्ति की थीम पर बनी फिल्मों का प्रदर्शन करवाया. यह सिलसिला लगभग तीन दशक चला. नब्बे के दशक में वीडियो फिल्म दिखाई जाने लगीं. शहरों और कस्बों में शासन के विकास कार्यों और योजनाओं पर आधारित छोटी-छोटी फिल्में प्रदर्शित की जाती थीं. यह कार्य सीधे पी आर ओ के सुपरवीजन में होता था.इसके बाद नई सदी की शुरूआत सोशल मीडिया के दौर से हुई. आज पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनल्स की बढ़ती संख्या के कारण उन्हें निरंतर कंटेन्ट की आवश्यकता होती है. इसकी पूर्ति समाचार एजेन्सियों, फीचर एजेन्सियों और विभिन्न पोर्टल से की जाती है. किसी समय गांव-गांव जाकर सिनेमा दिखाने वाला सरकार का जनसम्पर्क अधिकारी आज मैनेजमेंट के युग में नई भूमिका में आ गया है. उसे कन्टेंट तैयार करने के अलावा कार्यक्रम आयोजित करने, प्रमुख लोगों से व्यक्तिगत रिश्ते बनाने और प्रकाशन, प्रसारण के मुद्दे तय करने का कार्य भी करना होता है. यह समय के साथ दिखाई देने वाला परिवर्तन है. यूं कहें कि वक्त की मांग भी है.
यह भी सच है कि जनसम्पर्क से जुड़े व्यक्ति का सकारात्मक दृष्टिकोण, मित्रता भाव, अच्छी भाषा, सद्व्यवहार और परिश्रम उसे अपने कार्य में सफलता दिलवाता है. समन्वय और सहयोग के रवैये से कार्य करने वाले जनसम्पर्क अधिकारी अपने दायित्व निर्वहन में अच्छी कामयाबी प्राप्त करते हैं. बोलचाल की भाषा में कहें तो यही कह सकते हैं कि जनसम्पर्क अधिकारी को बड़ा दिल रखकर कार्य करना चाहिए. जनसम्पर्क अधिकारी अन्य अधिकारियों से ज्यादा भिन्न नहीं होता लेकिन ऐसा माना गया है कि वह अपेक्षाकृत हंसमुख और मिलनसार जरूर होना चाहिए. कहने का अर्थ एक जनसम्पर्क कर्मी को सहज और सुलभ व्यक्ति वे रूप में पहचाना जाना चाहिए. त्वरित निर्णय लेने में भी जनसम्पर्क कार्य के स्तर का अनुमान लगाया जाता है. संदर्भवश एक उदाहरण देना चाहूंगा. एक मुख्य सचिव महोदय मतदान के लिए मतदान केन्द्र पहुंचने वाले थे, वे स्वयं वाहन चलाकर वहां पहुंचे थे. उन्हें पहले ही यह जानकारी प्राप्त हो चुकी थी कि मतदान केन्द्र पहुंचाते ही अनेक प्रेस फोटोग्राफर उनकी तस्वीर लेंगे. मुख्य सचिव महोदय घर से वाहन में निकले तो सीट बेल्ट लगाना न भूले. मुख्य सचिव ने कुछ दिन बाद एक बैठक में यह वाक्या सुनाते हुए कहा कि एक जनसम्पर्क अधिकारी ने मुझे सीट बेल्ट लगाने का अनुरोध किया था,यदि मैं सीट बेल्ट न लगाता तो मैं प्रेस फोटोग्राफर्स के बीच आलोचना का पात्र बन सकता था. मुझे समय पर सही बात बता दी गई थी. यही जनसम्पर्क है, बाकी सब सामान्य प्रशासन है.बात छोटी सी लेकिन अहम थी. इसी तरह 1989 की बात है.उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री वोरा कार में रेडियो जरूर सुनते थे अपने ही एक कार्यक्रम की न्यूज कार्यक्रम खत्म होने पर 15 मिनिट बाद कार में सुनकर बहुत खुश हो गए थे. दरअसल उनके जनसम्पर्क अधिकारी ने कार्यक्रम खत्म होने के साथ-साथ एक संक्षिप्त खबर तैयार कर फोन से आकाशवाणी के समाचार संपादक तक पहुंचा दी थी. तत्परता जनसम्पर्क के कार्य की अहमियत को बढ़ाने में मददगार है. किसी जनसम्पर्क अधिकारी को कितना बोलना है कितना नहीं, यह परिभाषित तो नहीं लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक शब्द वाक्य सुविचारित होना चाहिए. अधिक प्रशंसा के शब्द न भी कहे लेकिन उसमें संस्थान की नीतियों के प्रति रोष या आक्रोश तो बिल्कुल नहीं दिखाई देना चाहिए.
जनसम्पर्क विशेषज्ञ रविन्द्र पंड्या के अनुसार जनसम्पर्क अधिकारी को क्या करना है, यह पता होने के साथ ही ये भी पता होना चाहिए कि क्या नहीं करना है. संकट के समय जनसम्पर्क की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है. श्री पंडया का मानना है कि निर्वाचन के पूर्व शासकीय जनसम्पर्क अधिकारी का रूटीन कार्य तो कम हो जाता है लेकिन सावधानी बढ़ जाती है. इस अवधि में विशेष सतर्कता की आवश्यकता होती है. इसी तरह कई मुख्यमंत्रियों के प्रेस अधिकारी रहे स्वर्गीय श्यामबिहारी पटेल का मानना था कि जनसम्पर्क अधिकारी को कभी भी वीआईपी के समक्ष चाय-नाश्ते या लंच डिनर में शामिल नहीं होना चाहिए. आज समय के साथ अनेक मान्यताएं बदल भी गई हैं. जनसम्पर्क दिवस पर अनेक वर्ष दिल्ली में पदस्थ रहीं इंदिरा स्वरूप के साथ ही मध्यप्रदेश में रहे स्वर्गीय संतोष कुमार शुक्ल, स्वर्गीय के.जी. माहेश्वरी, स्व. एन.के. तिवारी और स्व.धगट जैसे अधिकारियों का स्मरण स्वाभाविक है जिन्होंने अपनी कार्यकुशलता से जनसम्पर्क के महत्व को बढ़ाने में योगदान दिया. अपने जूनियर अधिकारियों को भी इस कार्य में दक्ष बनाया.गत एक दशक में जनसम्पर्क विभाग को नए आयाम भी मिले हैं.यह महकमा अपनी नई पहचान बनाने में सफल हुआ है.आज विभाग के आला अफसरों के साथ ही समस्त प्रचार अधिकारियों को इसका श्रेय है.
जनसम्पर्क कार्य के महत्व से शासकीय और कार्पोरेट क्षेत्र का हर व्यक्ति भली-भांति परिचित है. आज किसी व्यक्ति या संस्थान की प्रतिष्ठा में वृद्धि सिर्फ उसके श्रेष्ठ कार्यों से नहीं होती बल्कि अच्छी छवि बनाने के लिए किए गए प्रयास बहुत मायने रखते हैं. सरकारों के जनसम्पर्क विभाग आम जनता को सूचित, शिक्षित और जागरूक बनाने का कार्य करते हैं. यही नहीं सरकार के प्रमुख लोगों की छवि बनाना भी जनसम्पर्क विभाग के प्रमुख दायित्व में शामिल हो गया है. व्यक्ति और संस्थान दोनों की अच्छी छवि से यह धारणा बनती है कि वर्तमान व्यवस्था श्रेष्ठ अथवा बेहतर है. आमतौर पर प्रत्येक सरकार कुछ खास क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान देती है. इसी वजह से प्रचार कार्य में यह स्थापित किया जाता है कि पूर्व सरकार ने इन क्षेत्रों की उपेक्षा की अथवा पर्याप्त ध्यान नहीं दिया. इससे यह सिद्ध होता है कि वर्तमान सरकार जनकल्याण के प्रति अधिक प्रतिबद्ध है. वास्तव में ऐसा होता भी है. यदि हम कहें कि काफी चुनौती पूर्ण होता है जनसम्पर्क अधिकारी का दायित्व, तो गलत नहीं होगा. इस कार्य से जुड़े व्यक्ति को पल-पल नई सूचनाएं और जानकारियां प्राप्त करने की ललक होना चाहिए.
आज अनेक संस्थान सिर्फ सही दिशा में किए जाने वाले प्रचार और जनसम्पर्क की वजह से तुलनात्मक रूप से बेहतर माने जाने लगे हैं. बदलते समय में विकास की प्राथमिकताएं भी बदलती हैं. यदि किसी राज्य में बुनियादी क्षेत्रों में स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है तो उसे प्रभावी ढंग से रेखांकित भी किया जाना चाहिए. यह प्रचार का अतिरेक नहीं. वास्तविक प्रगति का वास्तविक प्रचार होना ही चाहिए. जनसम्पर्क अधिकारी संस्थान की कोशिशों को बेहतर जानता है. प्रत्येक बदलाव पर उसकी पैनी नजर होती है. उससे बेहतर कोई भी संस्थान को नहीं जानता, समझता.
जनसम्पर्क अधिकारी के रूप में पांच मुख्यमंत्रियों, एक राज्यपाल, तीन मुख्य सचिवों और लगभग पंद्रह मंत्रियों के साथ मैंने कार्य किया है. मेरा अनुभव है कि संदेश स्पष्ट हो, बात नपी तुली हो और उसे कहने का तरीका बहुत कठिन भी न हो तब आपका समाचार और विचार पत्र-पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त कर ही लेता है. यह मैंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से सीखा है कि समाचार में दोहराव और लम्बे वाक्यों से जरूर बचा जाए. आज प्रचार के लिए पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी के अलावा आज सोशल मीडिया की भी आवश्यकता होती है. एक समय था जब लोक माध्यमों का प्रयोग भी काफी होता था. मध्यप्रदेश के गठन के बाद सूचना प्रकाशन विभाग ने गांव-गांव में शिक्षा, परिवार नियोजन और देश-भक्ति की थीम पर बनी फिल्मों का प्रदर्शन करवाया. यह सिलसिला लगभग तीन दशक चला. नब्बे के दशक में वीडियो फिल्म दिखाई जाने लगीं. शहरों और कस्बों में शासन के विकास कार्यों और योजनाओं पर आधारित छोटी-छोटी फिल्में प्रदर्शित की जाती थीं. यह कार्य सीधे पी आर ओ के सुपरवीजन में होता था.इसके बाद नई सदी की शुरूआत सोशल मीडिया के दौर से हुई. आज पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनल्स की बढ़ती संख्या के कारण उन्हें निरंतर कंटेन्ट की आवश्यकता होती है. इसकी पूर्ति समाचार एजेन्सियों, फीचर एजेन्सियों और विभिन्न पोर्टल से की जाती है. किसी समय गांव-गांव जाकर सिनेमा दिखाने वाला सरकार का जनसम्पर्क अधिकारी आज मैनेजमेंट के युग में नई भूमिका में आ गया है. उसे कन्टेंट तैयार करने के अलावा कार्यक्रम आयोजित करने, प्रमुख लोगों से व्यक्तिगत रिश्ते बनाने और प्रकाशन, प्रसारण के मुद्दे तय करने का कार्य भी करना होता है. यह समय के साथ दिखाई देने वाला परिवर्तन है. यूं कहें कि वक्त की मांग भी है.
यह भी सच है कि जनसम्पर्क से जुड़े व्यक्ति का सकारात्मक दृष्टिकोण, मित्रता भाव, अच्छी भाषा, सद्व्यवहार और परिश्रम उसे अपने कार्य में सफलता दिलवाता है. समन्वय और सहयोग के रवैये से कार्य करने वाले जनसम्पर्क अधिकारी अपने दायित्व निर्वहन में अच्छी कामयाबी प्राप्त करते हैं. बोलचाल की भाषा में कहें तो यही कह सकते हैं कि जनसम्पर्क अधिकारी को बड़ा दिल रखकर कार्य करना चाहिए. जनसम्पर्क अधिकारी अन्य अधिकारियों से ज्यादा भिन्न नहीं होता लेकिन ऐसा माना गया है कि वह अपेक्षाकृत हंसमुख और मिलनसार जरूर होना चाहिए. कहने का अर्थ एक जनसम्पर्क कर्मी को सहज और सुलभ व्यक्ति वे रूप में पहचाना जाना चाहिए. त्वरित निर्णय लेने में भी जनसम्पर्क कार्य के स्तर का अनुमान लगाया जाता है. संदर्भवश एक उदाहरण देना चाहूंगा. एक मुख्य सचिव महोदय मतदान के लिए मतदान केन्द्र पहुंचने वाले थे, वे स्वयं वाहन चलाकर वहां पहुंचे थे. उन्हें पहले ही यह जानकारी प्राप्त हो चुकी थी कि मतदान केन्द्र पहुंचाते ही अनेक प्रेस फोटोग्राफर उनकी तस्वीर लेंगे. मुख्य सचिव महोदय घर से वाहन में निकले तो सीट बेल्ट लगाना न भूले. मुख्य सचिव ने कुछ दिन बाद एक बैठक में यह वाक्या सुनाते हुए कहा कि एक जनसम्पर्क अधिकारी ने मुझे सीट बेल्ट लगाने का अनुरोध किया था,यदि मैं सीट बेल्ट न लगाता तो मैं प्रेस फोटोग्राफर्स के बीच आलोचना का पात्र बन सकता था. मुझे समय पर सही बात बता दी गई थी. यही जनसम्पर्क है, बाकी सब सामान्य प्रशासन है.बात छोटी सी लेकिन अहम थी. इसी तरह 1989 की बात है.उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री वोरा कार में रेडियो जरूर सुनते थे अपने ही एक कार्यक्रम की न्यूज कार्यक्रम खत्म होने पर 15 मिनिट बाद कार में सुनकर बहुत खुश हो गए थे. दरअसल उनके जनसम्पर्क अधिकारी ने कार्यक्रम खत्म होने के साथ-साथ एक संक्षिप्त खबर तैयार कर फोन से आकाशवाणी के समाचार संपादक तक पहुंचा दी थी. तत्परता जनसम्पर्क के कार्य की अहमियत को बढ़ाने में मददगार है. किसी जनसम्पर्क अधिकारी को कितना बोलना है कितना नहीं, यह परिभाषित तो नहीं लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक शब्द वाक्य सुविचारित होना चाहिए. अधिक प्रशंसा के शब्द न भी कहे लेकिन उसमें संस्थान की नीतियों के प्रति रोष या आक्रोश तो बिल्कुल नहीं दिखाई देना चाहिए.
जनसम्पर्क विशेषज्ञ रविन्द्र पंड्या के अनुसार जनसम्पर्क अधिकारी को क्या करना है, यह पता होने के साथ ही ये भी पता होना चाहिए कि क्या नहीं करना है. संकट के समय जनसम्पर्क की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है. श्री पंडया का मानना है कि निर्वाचन के पूर्व शासकीय जनसम्पर्क अधिकारी का रूटीन कार्य तो कम हो जाता है लेकिन सावधानी बढ़ जाती है. इस अवधि में विशेष सतर्कता की आवश्यकता होती है. इसी तरह कई मुख्यमंत्रियों के प्रेस अधिकारी रहे स्वर्गीय श्यामबिहारी पटेल का मानना था कि जनसम्पर्क अधिकारी को कभी भी वीआईपी के समक्ष चाय-नाश्ते या लंच डिनर में शामिल नहीं होना चाहिए. आज समय के साथ अनेक मान्यताएं बदल भी गई हैं. जनसम्पर्क दिवस पर अनेक वर्ष दिल्ली में पदस्थ रहीं इंदिरा स्वरूप के साथ ही मध्यप्रदेश में रहे स्वर्गीय संतोष कुमार शुक्ल, स्वर्गीय के.जी. माहेश्वरी, स्व. एन.के. तिवारी और स्व.धगट जैसे अधिकारियों का स्मरण स्वाभाविक है जिन्होंने अपनी कार्यकुशलता से जनसम्पर्क के महत्व को बढ़ाने में योगदान दिया. अपने जूनियर अधिकारियों को भी इस कार्य में दक्ष बनाया.गत एक दशक में जनसम्पर्क विभाग को नए आयाम भी मिले हैं.यह महकमा अपनी नई पहचान बनाने में सफल हुआ है.आज विभाग के आला अफसरों के साथ ही समस्त प्रचार अधिकारियों को इसका श्रेय है.
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