मंगलवार, 28 अगस्त 2018

जूते-चप्पलों की खरीदी में हुआ भ्रष्टाचार

 सरकार बताये कि कौन से केंद्रीय मंत्री का पुत्र सप्लाई में शामिल है?

प्रदेश कांगे्रस मीडिया विभाग की अध्यक्ष शोभा ओझा और उपाध्यक्ष भूपेन्द्र गुप्ता ने प्रदेश कांगे्रस कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में कहा कि मुख्यमंत्री चरण पादुका योजना के अंतर्गत आदिवासी तेंदूपत्ता संग्राहकों को खतरनाक रसायन लगे जो जूते-चप्पल बांटे गये हैं, उनसे कैंसर का खतरा तो बना ही हुआ है, साथ ही खरीदी में एक बड़े भ्रष्टाचार से भी इंकार नहीं किया जा सकता. 
शोभा ओझा ने आरोप लगाया कि घटिया जूते-चप्पलों की सप्लाई में एक केंद्रीय मंत्री के पुत्र का नाम भी आ रहा है. शिवराज सरकार इस तथ्य की जांच करें कि वे कौन से केंद्रीय मंत्री हैं? वस्तुस्थिति जनता के सामने उजागर करें, ताकि भ्रम की स्थिति न रहे. लघु वनोपज संघ द्वारा कहा जा रहा है कि अगर गड़बड़ी हुई है तो अधिकारियों पर कार्यवाही की जाएगी. क्या इससे किया गया भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा. सरकार खरीदी की पूरी प्रक्रिया को भी उजागर करे, ताकि पता चले कि वह कितनी पारदर्शी थी? शिवराजसिंह बताएं कि इस पूरे प्रकरण का जवाबदार कौन हैं?
ओझा और गुप्ता ने कहा कि केंद्र सरकार ने जब 1997 से डाई पर प्रतिबंध लगा दिया था तो शिवराज सरकार ने खतरनाक रसायन लगे जूते-चप्पल खरीदे ही क्यों? जाहिर है बिना जांचे-परखे जूते-चप्पल खरीद लिए गए. यही कारण है कि खरीदी के बाद जांच में जूते के इनर सोल में खतरनाक रसायन एजेडओ पाया गया, जिससे त्वचा कैंसर का खतरा रहता है. स्पष्ट है कि खरीदी के लिए जिम्मेदार लोग भ्रष्टाचार में लिप्त थे और उन्होंने जांच में लापरवाही की. यह तो एक उदाहरण है, सरकार की हर योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी. लेकिन भ्रष्ट व्यवस्था सुधारने में शिवराजसिंह की कोई रूचि नहीं है. उन्होंने आदिवासियों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया है.
सरकार आदिवासियों को दिए  गए जूते-चप्पल वापस ले और उन्हें अच्छी गुणवत्ता के जूते-चप्पल दिए जाएं. ये जूते-चप्पल पहनने के कारण आदिवासियों के पैरों में खुजली शुरू हो गयी है. इनमें से कुछ आदिवासी आये भी हैं. इन्होंने खुजली होने की शिकायत की है. मालवा निमाड़ क्षेत्र के आदिवासी तो अपने-अपने जिले के कलेक्टर कार्यालय में ये जूते-चप्पल जमा भी करवाएंगे. मुख्यमंत्री को गरीब आदिवासियों के स्वास्थ्य की कोई चिंता नहीं है. वे आदिवासी गरीब हैं, उनके पास तो इलाज के लिए पैसे भी नहीं हैं, कहां से अपना इलाज कराएंगे.

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