पीटीआरआई जहांगीराबाद में अनुसूचित जातिध्जनजाति वर्गों के प्रति संवेदनशीलता विषय पर आयोजित दो दिवसीय सेमीनार का पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला एवं विशेष पुलिस महानिदेशक के. एन. तिवारी ने शुभारंभ किया. इस अवसर पर पुलिस महानिदेशक शुक्ना ने कहा कि पुलिस अधिकारी एससीध्एसटी वर्ग के पीडि़तों की शिकायत धैर्य एवं संवेदनशीलता के साथ सुनें और उन्हें ये एहसास करायें कि वे सही जगह आए हैं उनकी बात सुनी जाएगी तथा न्याय मिलेगा. पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारी द्वारा शिकायतकर्ता की बात धैर्य एवं विनम्रता से सुनने से ही उसकी पीड़ा बहुत हद तक कम हो जाती है एवं त्वरित न्याय की संभावना बढ़ जाती है. पुलिस समाज को जोड़ने की बहुत अहम कड़ी है अतरू इस महत्वपूर्ण भूमिका को निष्ठा के साथ निभायें. अपराध की विवेचना प्रक्रिया कानून के अनुसार समय सीमा में पूरी करें. पुलिस समाज के तनाव को दूर करने में सक्रिय होकर कार्य करे. पुलिस अधिकारी एससीध्एसटी वर्ग से संबंधित सभी कानून एवं इसमें किए गए संसोधनों से अद्यतन होकर कार्य करें. संवेदनशीलता एवं विनम्रता को व्यवहार में लाने से सकारात्मक परिणाम मिलेंगे. श्री शुक्ला ने कहा कि समय-समय पर ऐसे सेमीनार आयोजित कर पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों की व्यावसायिक दक्षता को बढ़ाया जाता है. यह सेमीनार इस उद्देश्य को पूरा करेगा.
इस अवसर पर विशेष महानिदेशक के.एन. तिवारी ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में संसद एवं न्यायालय ने सर्वाधिक चिंतन इसी विषय पर किया है तथा एससीध्एसटी वर्ग के लोगों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए अधिनियमों को और अधिक युक्तियुक्त बनाया गया है. पुलिस को इस विषय पर अधिक संवेदनशीलता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है. शासन-प्रशासन की तरफ से भी इन वर्गों को त्वरित न्याय दिलाने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं. विशेष अभियोजक, विशेष न्यायालय सहित कई प्रक्रियाओं की समय सीमा भी तय की गई है. उन्होंने कहा कि कई प्रकरणों में तो जान-बूझकर देर करने अथवा हीलाहवाली करने पर विभागीय जांच तथा अवमानना के तहत कार्यवाही का भी प्रावधान किया गया है. सभी पुलिस अधिकारी कानूनों एवं संशोधनों से अद्यतन होकर संवेदनशीलता के साथ कार्य करें. यह सेमीनार मील का पत्थर साबित होगा.
कलेक्टर सुदाम खाड़े ने कहा कि त्वरित न्याय एवं राहत हेतु जाति प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होती है जिसमें कई व्यावहारिक कठिनाइयां भी हैं. शासन द्वारा इस संदर्भ में नियमों का सरलीकरण किया गया है. अब अनुसूचित जातिध्जनजाति प्रमाण-पत्र लोकसेवा केंद्रो द्वारा बनाये जाते हैं. समय-सीमा में प्रमाण-पत्र नहीं देने पर संबंधित अधिकारी को 250 से अधिकतम 5000रु. तक के दण्ड का प्रावधान है. जाति प्रमाण-पत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन भी किया जा सकता है अगर फरियादी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवा पाता है तो सरपंच, पार्षद द्वारा लिखित दिए गए प्रमाण-पत्र से भी काम चल जाता है. इस अवसर पर विशेष न्यायाधीश एससीध्एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम एडीजे एस.सी. उपाध्याय ने कहा कि विवेचना के दौरान एसटीध्एससी एवं अन्य सभी वर्गों के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए क्योंकि सभी जातियां मानवजनित हैं. किसी भी प्रकरण में विवेचक को तटस्थ होकर कार्य करना चाहिए. विवेचक को कानून की मूल भावनाओं को समझते हुए कार्य करना चाहिए.
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (अजाक) प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव ने सेमीनार की रूपरेखा रखी. उन्होंने कहा कि इस सेमीनार को अधिक रुचिकर एवं परिणामोत्पादक बनाने के लिए परिचर्चाओं के अधिक सेशन रखे गए हैं. विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षणार्थियों की शंकाओं का अधिकाधिक समाधान किया जायेगा.
इस अवसर पर विशेष महानिदेशक के.एन. तिवारी ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में संसद एवं न्यायालय ने सर्वाधिक चिंतन इसी विषय पर किया है तथा एससीध्एसटी वर्ग के लोगों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए अधिनियमों को और अधिक युक्तियुक्त बनाया गया है. पुलिस को इस विषय पर अधिक संवेदनशीलता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है. शासन-प्रशासन की तरफ से भी इन वर्गों को त्वरित न्याय दिलाने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं. विशेष अभियोजक, विशेष न्यायालय सहित कई प्रक्रियाओं की समय सीमा भी तय की गई है. उन्होंने कहा कि कई प्रकरणों में तो जान-बूझकर देर करने अथवा हीलाहवाली करने पर विभागीय जांच तथा अवमानना के तहत कार्यवाही का भी प्रावधान किया गया है. सभी पुलिस अधिकारी कानूनों एवं संशोधनों से अद्यतन होकर संवेदनशीलता के साथ कार्य करें. यह सेमीनार मील का पत्थर साबित होगा.
कलेक्टर सुदाम खाड़े ने कहा कि त्वरित न्याय एवं राहत हेतु जाति प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होती है जिसमें कई व्यावहारिक कठिनाइयां भी हैं. शासन द्वारा इस संदर्भ में नियमों का सरलीकरण किया गया है. अब अनुसूचित जातिध्जनजाति प्रमाण-पत्र लोकसेवा केंद्रो द्वारा बनाये जाते हैं. समय-सीमा में प्रमाण-पत्र नहीं देने पर संबंधित अधिकारी को 250 से अधिकतम 5000रु. तक के दण्ड का प्रावधान है. जाति प्रमाण-पत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन भी किया जा सकता है अगर फरियादी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवा पाता है तो सरपंच, पार्षद द्वारा लिखित दिए गए प्रमाण-पत्र से भी काम चल जाता है. इस अवसर पर विशेष न्यायाधीश एससीध्एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम एडीजे एस.सी. उपाध्याय ने कहा कि विवेचना के दौरान एसटीध्एससी एवं अन्य सभी वर्गों के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए क्योंकि सभी जातियां मानवजनित हैं. किसी भी प्रकरण में विवेचक को तटस्थ होकर कार्य करना चाहिए. विवेचक को कानून की मूल भावनाओं को समझते हुए कार्य करना चाहिए.
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (अजाक) प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव ने सेमीनार की रूपरेखा रखी. उन्होंने कहा कि इस सेमीनार को अधिक रुचिकर एवं परिणामोत्पादक बनाने के लिए परिचर्चाओं के अधिक सेशन रखे गए हैं. विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षणार्थियों की शंकाओं का अधिकाधिक समाधान किया जायेगा.
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