लेखक: के.डी. शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल
98930201398
करीब तेरह वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का दायित्व संभालने वाले शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली, आचरण और व्यवहार देखकर मध्यप्रदेश के लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार स्वर्गीय मदन मोहन जोशी ने टिप्पणी की थी कि शिवराज मध्यप्रदेश के ज्योति बसु साबित होंगे. बसु ने निरन्तर 27 वर्ष तक वामपंथ का ध्वज लहराते हुए पश्चिम बंगाल में निष्कंटक राज किया था. यह टिप्पणी जोशी ने तब की थी जब शिवराज के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी दोबारा मध्यप्रदेश में सत्तासीन हो चुकी थी. वर्ष 2005 में विधानसभा के मध्यकाल में मुख्यमंत्री का दायित्व संभालने वाले चौहान को सत्ता अवश्य मिली थी लेकिन मध्यप्रदेश में चुनावी समर साध्वी और फायर ब्राण्ड नेता उमा भारती के नेतृत्व में जीता गया था. इसलिए श्रेय साध्वी के ही नाम था. विपरीत राजनीतिक परिस्थियों में चौहान मुख्यमंत्री बने थे और भाजपा को प्रदेश में सत्ता दिलाने वाली साध्वी अब विरोध में थीं. यहां तक कि वर्ष 2008 का चुनाव आते-आते साधवी ने संत स्वभाव के विपरीत भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन कर लिया था और शिवराज के समक्ष कांग्रेस के साथ-साथ स्वयं भाजपा से टूटे एक महत्वपूर्ण धड़े की चुनौती भी थी, लेकिन शिवराज सिंह चौहान ने लो प्रोफाइल रहते हुए विनम्रता, सहज उपलब्धता और जनता से जुड़ने की अपनी विशिष्ट कार्यशैली के चलते न सिर्फ सत्ता हासिल की बल्कि स्वयं का जनाधार भी खूब बढ़ाया. कमोबेश ऐसी ही स्थिति वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में रही. हां, इतना अवश्य था कि इस दौर में साध्वी उमाश्री भारती के तेवर अब तक ढीले पड़ चुके थे वहीं केन्द्र में सरदार मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार लगातार घपले और घोटालों के चलते अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही थी और भारतीय जनता पार्टी सुनियोजित रूप से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोेजेक्ट कर रही थी और देश मोदी की सुनामी में घिरता चला जा रहा था. निश्चित ही उसका लाभ मध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी को भी चुनाव में मिला, लेकिन यह श्रेय शिवराज सिंह चौहान को ही जाता है कि व्यापम जैसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति वाले घोटाले की आंच चुनाव पर विपरीत असर नहीं डाल सकी. कुल मिलाकर दो चुनाव लगातार शिवराज के लिए वन मैन शो साबित हुए.
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सफलताओं और मध्यप्रदेश का सबसे लंबे समय तक लगातार मुख्यमंत्री रहने के कीर्तिमान के पीछे उनकी लाड़ली लक्ष्मी, भारत दर्शन सहित अनेक किसान एवं जन हितैषी योजनाएं भी रहीं जिन्होंने जनता को सीधे शिवराज से जोड़ा. जनता से जुड़ी योजनाएं भी शिवराज के जनाधार का एक महत्वपूर्ण कारक साबित हुर्इं. इस बीच अनेक बार विपरीत हालात निर्मित हुए जिनमें शिवराज रात भर सो भी नहीं सके. लेकिन इस तरह के हालात और दुरभि संधियों से भी शिवराज बखूबी निखर कर बाहर आए. अब एक बार फिर विधानसभा चुनाव सन्निकट हैं. इस बार हालात भी अनुकूल नहीं दिख रहे हैं. मध्यप्रदेश से कहीं अधिक विपरीत स्थितियां राजस्थान और छत्तीसगढ़ राज्य में दिखाई दे रही है जहां चुनाव एक साथ होने हैं और पड़ोस का असर प्रदेश पर भी निश्चित ही पड़ेगा. उधर गुजरात जो मोदी का पर्याय बन चुका है, बीते चुनाव में पार्टी वहां बमुश्किल अपनी साख बचा पाई है. ये सारी परिस्थितियां भी मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ दल को भयाक्रांत कर रही हैं. पिछले कुछ उप चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन भी प्रदेश में कमजोर रहा है. इस सब के बावजूद कि न सिर्फ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं भरपूर समय दिया बल्कि संगठन के अलावा सत्ता से जुड़े मंत्री और विधायक तथा केन्द्रीय नेतागण भी उप चुनाव के समर में जूझते नजर आए. इस तरह की घटनाएं पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं दे रही है.
सत्ता पर हावी है संगठन का सुरुर
बहरहाल वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर गौर किया जाए तो आगामी विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए कड़ी अग्नि परीक्षा साबित होंगे और यदि चौहान अपनी सत्ता का साकेत बचाने में कामयाब रहे तो यह उनकी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. क्योंकि डेढ़ दशक की सत्ता का सुरूर संगठन पर हावी है. लगातार मिली सफलताओं ने नेताओं के तेवर बदल दिए हैं. वहीं कार्यकर्ताओं का एक बड़ा समूह स्वयं की निरन्तर उपेक्षा से दुखी और आहत है. यहां तक कि उसके बगावती तेवर भी यदाकदा सामने आ ही जाते है. यही नहीं स्वयं मुख्यमंत्री भी मुंगावली और कोलारस के उप चुनाव में यह व्यवहारिक समस्या महसूस कर ही चुके हैं. क्योंकि प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री की सभाओं और रैलियों में भी वैसा कुछ महसूस नहीं हुआ, जैसा शिवराज सिंह चौहान पूर्ववर्ती चुनावों में महसूस करते रहे हैं.
कर्मचारियों में असंतोष
इधर विभिन्न कर्मचारी संगठन और शिक्षक व प्राध्यापक वर्ग भी निरन्तर आंदोलनरत है. कर्मचारी संगठन कई अन्य मांगों के अलावा सातवें वेतनमान के मुद्दे पर स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहे हैं. सातवां वेतनमान दरअसल सेवारत से लेकर पेंशनर्स तक सभी के लिए असंतोष का कारण सिद्ध हो रहा है. वैसे तो हर चुनाव से पूर्व धरना, प्रदर्शन और आंदोलनों की बाढ़ सी आ ही जाती है, लेकिन इस बार असंतोष का ज्वार सुनामी का रूप लेता दिखाई दे रहा है.
बेसुरा संगीत ही सुना रहा कार्यपालिका और प्रशासन का तालमेल
दलित प्रेम के पाखण्ड ने सवर्णो में भी असंतोष का बीज अंकुरित कर दिया है तो व्यापारी वर्ग भी नोटबंदी और जीएसटी के बाद बहुत प्रसन्न नहीं है. जबकि भाजपा सदैव से ब्राम्हण और बनियों की पार्टी मानी जाती रही है. विपरीत परिस्थितियों में उद्योग और व्यापार तो प्रभावी हुए ही हैं, रोजगार के अपेक्षित अवसर भी उपलब्ध नहीं हो सके हैं. ऐसे में युवा वर्ग भी अपना असंतोष वोट के माध्यम से व्यक्त कर सकता है. चौहान की एक बड़ी समस्या प्रशासनिक कमजोरी भी है, क्योंकि सरकार की अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं और जन कल्याणकारी कार्यक्रम प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ते रहे है. ऐसे ही दौर में कभी शिवराज यह कह उठते है कि अफसर मेरी सुनते नहीं है तो कभी आक्रोश में वे उल्टा लटकाने की अथवा डंडा लेकर निकलने की धमकी भी दे डालते हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि कार्यपालिका और प्रशासन का कदमताल एकता की स्वर लहरी नहीं बल्कि बेसुरा संगीत ही सुना रहा है.
कठिन है इसलिए तो करने योग्य है
कुल मिलाकर देखा जाए तो कारण और समस्याएं बहुत सी हैं और इन समस्याओं के समंदर को पार करते हुए यदि शिवराज एक बार फिर भगवा परचम लहराते हैं तो ज्योति बसु का तमगा उन पर सटीक साबित होगा, क्योंकि दर्शन शास्त्र के उत्कृष्ट छात्र रहे शिवराज सिंह चौहान के ही शब्दों में कहा जाए तो काम कठिन है इसीलिए तो करने योग्य है. साधारण काम तो सभी कर लेते हैं. अब देखना यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव की वैतरणी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किस कला-कौशल के बल पर पार करते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार, भोपाल
98930201398
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| शिवराज सिंह चौहान |
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सफलताओं और मध्यप्रदेश का सबसे लंबे समय तक लगातार मुख्यमंत्री रहने के कीर्तिमान के पीछे उनकी लाड़ली लक्ष्मी, भारत दर्शन सहित अनेक किसान एवं जन हितैषी योजनाएं भी रहीं जिन्होंने जनता को सीधे शिवराज से जोड़ा. जनता से जुड़ी योजनाएं भी शिवराज के जनाधार का एक महत्वपूर्ण कारक साबित हुर्इं. इस बीच अनेक बार विपरीत हालात निर्मित हुए जिनमें शिवराज रात भर सो भी नहीं सके. लेकिन इस तरह के हालात और दुरभि संधियों से भी शिवराज बखूबी निखर कर बाहर आए. अब एक बार फिर विधानसभा चुनाव सन्निकट हैं. इस बार हालात भी अनुकूल नहीं दिख रहे हैं. मध्यप्रदेश से कहीं अधिक विपरीत स्थितियां राजस्थान और छत्तीसगढ़ राज्य में दिखाई दे रही है जहां चुनाव एक साथ होने हैं और पड़ोस का असर प्रदेश पर भी निश्चित ही पड़ेगा. उधर गुजरात जो मोदी का पर्याय बन चुका है, बीते चुनाव में पार्टी वहां बमुश्किल अपनी साख बचा पाई है. ये सारी परिस्थितियां भी मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ दल को भयाक्रांत कर रही हैं. पिछले कुछ उप चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन भी प्रदेश में कमजोर रहा है. इस सब के बावजूद कि न सिर्फ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं भरपूर समय दिया बल्कि संगठन के अलावा सत्ता से जुड़े मंत्री और विधायक तथा केन्द्रीय नेतागण भी उप चुनाव के समर में जूझते नजर आए. इस तरह की घटनाएं पार्टी के लिए शुभ संकेत नहीं दे रही है.
सत्ता पर हावी है संगठन का सुरुर
बहरहाल वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर गौर किया जाए तो आगामी विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए कड़ी अग्नि परीक्षा साबित होंगे और यदि चौहान अपनी सत्ता का साकेत बचाने में कामयाब रहे तो यह उनकी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. क्योंकि डेढ़ दशक की सत्ता का सुरूर संगठन पर हावी है. लगातार मिली सफलताओं ने नेताओं के तेवर बदल दिए हैं. वहीं कार्यकर्ताओं का एक बड़ा समूह स्वयं की निरन्तर उपेक्षा से दुखी और आहत है. यहां तक कि उसके बगावती तेवर भी यदाकदा सामने आ ही जाते है. यही नहीं स्वयं मुख्यमंत्री भी मुंगावली और कोलारस के उप चुनाव में यह व्यवहारिक समस्या महसूस कर ही चुके हैं. क्योंकि प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री की सभाओं और रैलियों में भी वैसा कुछ महसूस नहीं हुआ, जैसा शिवराज सिंह चौहान पूर्ववर्ती चुनावों में महसूस करते रहे हैं.
कर्मचारियों में असंतोष
इधर विभिन्न कर्मचारी संगठन और शिक्षक व प्राध्यापक वर्ग भी निरन्तर आंदोलनरत है. कर्मचारी संगठन कई अन्य मांगों के अलावा सातवें वेतनमान के मुद्दे पर स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहे हैं. सातवां वेतनमान दरअसल सेवारत से लेकर पेंशनर्स तक सभी के लिए असंतोष का कारण सिद्ध हो रहा है. वैसे तो हर चुनाव से पूर्व धरना, प्रदर्शन और आंदोलनों की बाढ़ सी आ ही जाती है, लेकिन इस बार असंतोष का ज्वार सुनामी का रूप लेता दिखाई दे रहा है.
बेसुरा संगीत ही सुना रहा कार्यपालिका और प्रशासन का तालमेल
दलित प्रेम के पाखण्ड ने सवर्णो में भी असंतोष का बीज अंकुरित कर दिया है तो व्यापारी वर्ग भी नोटबंदी और जीएसटी के बाद बहुत प्रसन्न नहीं है. जबकि भाजपा सदैव से ब्राम्हण और बनियों की पार्टी मानी जाती रही है. विपरीत परिस्थितियों में उद्योग और व्यापार तो प्रभावी हुए ही हैं, रोजगार के अपेक्षित अवसर भी उपलब्ध नहीं हो सके हैं. ऐसे में युवा वर्ग भी अपना असंतोष वोट के माध्यम से व्यक्त कर सकता है. चौहान की एक बड़ी समस्या प्रशासनिक कमजोरी भी है, क्योंकि सरकार की अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं और जन कल्याणकारी कार्यक्रम प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ते रहे है. ऐसे ही दौर में कभी शिवराज यह कह उठते है कि अफसर मेरी सुनते नहीं है तो कभी आक्रोश में वे उल्टा लटकाने की अथवा डंडा लेकर निकलने की धमकी भी दे डालते हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि कार्यपालिका और प्रशासन का कदमताल एकता की स्वर लहरी नहीं बल्कि बेसुरा संगीत ही सुना रहा है.
कठिन है इसलिए तो करने योग्य है
कुल मिलाकर देखा जाए तो कारण और समस्याएं बहुत सी हैं और इन समस्याओं के समंदर को पार करते हुए यदि शिवराज एक बार फिर भगवा परचम लहराते हैं तो ज्योति बसु का तमगा उन पर सटीक साबित होगा, क्योंकि दर्शन शास्त्र के उत्कृष्ट छात्र रहे शिवराज सिंह चौहान के ही शब्दों में कहा जाए तो काम कठिन है इसीलिए तो करने योग्य है. साधारण काम तो सभी कर लेते हैं. अब देखना यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव की वैतरणी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किस कला-कौशल के बल पर पार करते हैं.

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