विज्ञान से मानव का नाता पुरानाविज्ञान और मानव का नाता उतना पुराना है, जितना की मनुष्य. पहले उसकी वैज्ञानिक खोजे वर्तमान सार्इंस की तरह नहीं थी, लेकिन अपने समय में वही तत्कालीन समाज की समस्याओं का समाधान करने के लिए उपयुक्त थी, पर आज तकनीक अपने चरम पर है. हमने विज्ञान के उस मुकाम को प्राप्त कर लिया है जहां मनुष्य का जीवन ही नहीं, समूची प्रकृति उसकी मुट्ठी में आ गई है.
उक्त उद्गार भोज मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रविन्द्र कान्हेरे ने अटलबिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय में आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किए. उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में वैज्ञानिक सोच रखने वाले अनेक ऋषिमुनि हुए जिन्होंने कई वैज्ञानिक ग्रंथों की रचना की, लेकिन उनसे आगे आनेवाली पीढ़ी को चाहिए था कि उस वैज्ञानिक सोच को वे आगे बढ़ाते, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. जैसे कि आयुर्वेद में कई प्रकार की औषधियों का वर्णन है पर उनका आदर्श पैमाना क्या होना चाहिए, यह तय नहीं हुआ जिसके कारण से सबसे प्राचीन विज्ञानिक खोजे होने के बाद भी उस भारतीय ज्ञान को जहां पहुंचना चाहिए था वह वहां नहीं पहुंच सका. प्रो. कान्हेरे ने कई उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात सिद्ध की. उनका कहना था कि भले ही हमने विज्ञान के चलते अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादकता प्राप्त कर ली हो, लेकिन उत्पादकता बढ़ाने की भी एक सीमा है इसके लिए जनसंख्या नियंत्रण होना, जल का पुनर्चक्रीकरण करना, कम पानी की फसलों को लेना जैसे कार्य अति आवश्यक है. वहीं संगोष्ठी में डॉ. ए.के. चौधरी ने कहा कि पहले चिकित्सा आध्यात्म एवं विश्वास पर आधारित होती थी लेकिन वर्तमान में यह इंवेस्टीगेशन आधारित हो चुकी है. मरीज इलाज लेने के पहले गूगल पर सर्च करके आता है कि उसको क्या बीमारी होगी और उसको दिए जानेवाले चिकित्सकीय परामर्श से उस पर क्या-क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ेंगे. जिसके कारण आज परस्पर अविश्वास की भावना बढ़ती जा रही है. बरकतउल्लाह विवि के पूर्व प्राद्यापक प्रो. राजपाल सिंह ने कहा कि हम रोजमर्रा की जिंदगी में कई प्रकार के रसायनों का प्रयोग करते हैं जिनका मानव शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव होता है. जिसके चलते मानव औसत आयु घटी तो नही पर जीवन लगातार बिमारियों से घिरा रहता है. कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विवि के कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज ने कहा कि वर्तमान में विज्ञान का दखल हमारे दैनंदिन जीवन में जरूरत से ज्यादा हो गया है. विज्ञान ने मानव को व्यवहारिक विकृति के अतिरिक्त कुछ नहीं दिया. अभियांत्रिकी के कारण मानव इतना यंत्रवत हो गया है कि वह मानवता ही भूल गया है. इसलिए आवश्यक है कि धर्म, आध्यात्म और विज्ञान को साथ लेकर चला जाए, जिससे कि उतनी ही वैज्ञानिकता मानव जीवन में प्रवेश कर सके जिससे भावनाओं का क्षरण न हो. आपने कहा कि रामायण काल से लेकर द्वितीय युद्ध तक मानव ने बहुत कुछ सीखा है, जिसमें कि विज्ञान न केवल प्रगति लेकर आता है, अपितु यदि इसका उपयोग नकारात्मक रूप से किया जाए तो यह भयंकर विनाश को आमंत्रण देता है, इसलिए सर्वप्रथम समाज से क्रोध, ईर्ष्या और नकारात्मकता को कम करना होगा. इस संगोष्ठी में जैव विविधता विभाग द्वारा एक विज्ञान प्रदर्शनी भी रखी गई. वहीं आभार प्रदर्शन आधारभूत विज्ञान संकाय एवं जीवन विज्ञान संकाय अध्यक्ष प्रो. एसडी मिश्रा द्वारा किया गया. संचालन डॉ. निवेदिता शर्मा द्वारा किया गया.
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