शनिवार, 5 मई 2018

तेंदू पत्ता नीति खत्म कर व्यापारियों को पहुंचाया फायदा

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प्रदेश कांग्रेस मीडिया प्रभाग के अध्यक्ष मानक अग्रवाल ने कहा है कि मजदूरों को ठेकेदारों के शोषण से बचाने के लिए कांग्रेस सरकार में बनाई गयी तेन्दू पत्ता नीति अपरोक्ष रूप से धीरे-ध्ीारे खत्म कर भाजपा सरकार व्यापारियों को फायदा पहुंचाने की कूटरचना कर रही   है . इस नीति में धीरे-धीरे सेंध लगा दी गई है. अपनी विज्ञप्ति में अग्रवाल ने बताया कि तेन्दू पत्ता बिक्री से आने वाला पैसा सहकारी बैंक के बजाए अब निजी बैंकों में जमा किया जा रहा है. इस कारण समितियों को वर्ष 2017 के सीजन का भुगतान आज तक रूका हुआ है . प्राथमिक सहकारी समितियों को मिलने वाला कमीशन विगत कई वर्षों से लंबित है . यह दस से पन्द्रह लाख रूपये प्रति समिति है . यह राशि नियमानुसार  समिति के बचत खाते में जमा होना चाहिए . बोनस की राशि तीन-चार वर्षों बाद वितरित की जाती  है. समितियों की  यह राशि आखिर किस खाते में रहती है और उसका ब्याज कहां जाता है ?
अग्रवाल ने कहा कि क्या प्राथमिक वनोपज समितियों को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाकर कमजोर बनाना भाजपा सरकार का उद्देश्य है? उन्होंने कहा कि फिर से ठेकेदारी प्रथा शुरू होने से लक्ष्य से आधा पत्ता ही संग्रह हो रहा है . पहले एक बीड़ी बनने लायक छोटा पत्ता भी खरीदा जाता था, लेकिन अब व्यापारी बड़ा पत्ता ही लेते है ताकि उससे तीन या चार बीड़ी बन जाएं . समिति में एक मात्र कर्मचारी, प्रबंधक ही होता है. उसे शुद्ध लाभ का दस प्रतिशत  बोनस के रूप में देने का प्रावधान है . किन्तु यह राशि वर्ष 2005 से नहीं दी गई है . उसे केवल छः हजार रूपये वेतन मिलता  है . इसमें से भी एक हजार रूपये बीमा के नाम पर काट लिया जाता है, जबकि बीमा प्रमाण पत्र किसी को भी नहीं दिए गए हैं . सरकार बताए कि जीवन बीमा निगम से बीमा कराया गया है या फिर अन्य बीमा कंपनियों से . यह भी बताया जाये कि अब तक कितने लोगों को बीमा का लाभ मिला . इस तरह का  कृत्य शोषण नहीं तो और क्या है ?
अग्रवाल ने कहा कि वनों में विकास कार्यों के नाम पर करोड़ों रूपये खर्च किए जा रहे हैं . श्रमिकों को रोजगार देने के लिये उर्जा-वन प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं . लेकिन इसका नब्बे प्रतिशत पैसा सिर्फ खम्बे और  वायर खरीदने में ही खर्च कर दिया गया. अब बचे हुए दस प्रतिशत पैसे से मजदूरों को क्या खाक रोजगार मिलेगा ? प्रश्न यह है कि यह राशि ठेकेदारों का विकास करने के लिए थी या वन और वनवासियों के विकास के लिए ?

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