सपा, बसपा और गोंगपा ने खो दी अपनी विरासत
मध्यप्रदेश की चुनावी राजनीति में कभी दखल रखने वाले छोटे और क्षेत्रीय दल अब हासिए पर चले गए हैं। साल-दर-साल इनका प्रभाव खत्म होता जा रहा है। 2003 के बाद के परिणाम देखें तो ये दल अपना वजूद खोते जा रहे हैं। याने अपनी जो विरासत थी उसे खो चुके हैं। बहुजन समाज पार्टी हो या फिर समाजवादी पार्टी आज प्रदेश में अपने ही प्रभाव वाले क्षेत्र में शून्य वाली स्थिति में नजर आ रही है। जबकि 2003 में अचानक उभरी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी बिखर कर वर्तमान अपना अस्तित्व खो चुकी है।
मध्यप्रदेश की राजनीति में 2003 का विधानसभा चुनाव एक तरह से बड़ा बदलाव लेकर आया था। लंबे समय से प्रदेश में राज कर रही कांग्रेस को भाजपा ने उमा भारती के नेतृत्व में कड़ी टक्कर देते हुए 37 सीटों पर ला खड़ा किया था। कांग्रेस की इस तरह हार होगी, यह किसी ने सोचा नहीं था।
यह बदलाव कुछ ऐसा हुआ कि इसके बाद से अब तक कांग्रेस सरकार बनाने के लिए झटपटा रही है। 2018 के विधानसभा चुनाव में जरूर कांग्रेस को एक अवसर सरकार बनाने का मिला था और जोड़-तोड़ क रवह सरकार बनाने में सफल भी रही थी, मगर करीब 18 माह में ही सरकार गिर गई और वापस वह विपक्ष की भूमिका में आ गई। इसी तरह 2003 का विधानसभा चुनाव देखें तो यहां पर छोटे और क्षेत्रीय दलों बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी के अलावा अन्य दलों की स्थिति अच्छी थी। 2003 के चुनाव परिणामों के अनुसार समाजवादी पार्टी को सात, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) को तीन, राष्ट्रीय समानता दल (आरएसएमडी) को दो सीटों पर जीत मिली थी. वहीं, बसपा को दो, सीपीएम को एक, एनसीपी को एक, जेडीयू को एक और दो निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2008 के चुनाव में सारे समीकरण बिगड़ते नजर आए।
2008 के चुनाव में बसपा एक बार फिर ताकत दिखाती नजर आई। इस चुनाव में बसपा को 7, भारतीय जन शक्ति (बीजेएसएच) को 5, समाजवादी पार्टी को 1 और निर्दलीय प्रत्याशियों को 3 सीटों पर जीत मिली थी। 2013 में बसपा को 4 सीट और 3 निर्दलीय प्रत्याशियों को जीत मिली थी। इस चनाव में सपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई थीं। वहीं 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 2, सपा को 1 और चार निर्दलीय चुनाव जीते थे। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का प्रभाव इस चुनाव में भी लगातार गिरता गया। इसके पीछे मूल वजह थी पार्टी के विभाजन होने की। पार्टी तीन भागों विभाजित हो गई थी।
क्षेत्रों में खोता जा रहा प्रभाव
वैसे तो मध्यप्रदेश की राजनीति में देखा जाए तो शुरू से ही दो दलीय स्थिति रही है। सरकार बनाने में हमेशा
कांग्रेस और भाजपा को ही सफलता मिलती रही है। गठजोड़ का इतिहास भी यहां कम ही नजर आया है। सिर्फ 2018 के चुनाव में ही यह स्थिति बनी थी कि कांग्रेस को निर्दलीय उम्मीदवारों का सहारा लेकर सरकार बनानी पड़ी थी। चुनाव राजनीति में छोटे और क्षेत्रीय दलों की स्थिति देखी जाए तो कुल मिलाकर 20 सीटों के अंदर ही ये दल सिमटते नजर आए हैं। पिछले चुनाव याने 2018 में तो इनकी स्थिति 10 सीटों के अंदर ही सिमट गई। इसके पीछे मूल कारण यह भी रहा कि ये दल अपने क्षेत्रों में अपना जनाधार नहीं बचा पाए। बसपा और सपा का जनाधार वाला क्षेत्र प्रदेश में विंध्य, बुंदेलखंड और ग्वालियर-चंबल अंचल रहा है। वहीं गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का जनाधार रहा था। मगर धीरे-धीरे विभाजन की कगार पर पहुंचकर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी अपना जनाधार खो चुकी है। वर्तमान हालात यह है कि यह पार्टी वोट काटने वाले दल के रूप में नजर आ रही है।
दल बदल भी रहा हासिए पर जाने का कारण
बसपा और सपा की स्थिति अगर देखें तो इनके प्रभाव कम होने का एक बड़ा कारण यह भी रहा है कि इन दलों के विधायक जीतकर आने के बाद सत्ताधारी दल के साथ होते नजर आते है। साथ ही इन दलों से उनके सांगठनिक कैडर का व्यक्ति नहीं जीत पाया जो मूलतः सपा या बसपा का हो। बल्कि दूसरे दलों से टिकट न मिलने के चलते आने वाले प्रत्याशी इन दलों के चुनाव चिन्ह पर जीतते रहे हैं। जिनकी आस्थाएं हमेशा से अपनी मातृ संस्था से जुड़ी रही जो जीतने के बाद सत्ताधारी दल के पक्ष में ही नजर आए।



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