शनिवार, 1 जुलाई 2023

खूब हो रही घोषणाएं, कर्ज में डूबता जा रहा प्रदेश

आने वाली सरकार कर्ज उतारेगी या करेगी विकास

मध्यप्रदेश में इस साल विधानसभा चुनाव होने है। इसे लेकर भाजपा और


कांग्रेस दोनों ही दलों  का पूरा फोकस घोशणाओं के जरिए मतदाता को लुभाना है। दोनों ही दल सक्रिय हैं और घोषणाओं की बारिश करते जा रहे हैं। भाजपा सरकार में है, इसके चलते सरकार ने कुछ योजनाओं को चुनाव के पहले ही अमलीजामा पहनाकर उनके क्रियांवयन पर जोर देना शुरू कर दिया है। कांग्रेस सिर्फ घोषणाएं करती जा रही है। सरकार द्वारा लागू की जाने वाली योजनाओं के लिए प्रदेश के बजट में कोई प्रावधान नहीं रखा था, अतः सरकार का पूरा फोकस बाजार से उधार लेकर योजनाओं के क्रियांवयन पर है। पिछले छह माह में सरकार ने चुनावी रेवड़ियां बांटने के लिए हर माह कई बार करोड़ों का कर्ज ले रखा है। हालात यह है कि प्रति व्यक्ति कर्ज भी बढ़ता जा रहा है। इससे न तो भाजपा को कोई चिंता है और न ही प्रदेश की सरकार को। चिंता है तो सिर्फ चुनाव जीतने की। हालात यह है कि चुनाव जीतने के बाद जिसकी सरकार बनेगी, उसके लिए मुसीबत खड़ी होगी। चुनाव के बाद वर्तमान में शुरू हुई इन घोशणाओं में से कितनी निरंतर चलती रहेंगी, यह कुछ कहा नहीं जा सकता, मगर सरकार में आने वाले दल के लिए अगले पांच साल के लिए ये योजनाएं मुसीबत जरूर खड़ी करती रहेंगी। 

भाजपा सरकार में है, इसके लिए प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने इस बार घोषणाए करने के साथ ही चुनाव के पहले उनके क्रियांवयन पर फोकस किया है। हाल ही में उन्होंने महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए लाड़ली बहना योजना लागू कर दी। इस योजना के तहत करीब सवा करोड़ हितग्राहियों के खातें में सरकार ने एक हजार रूपए पहुंचा भी दिए। योजना के तहत यह राशि प्रतिमाह की 10 तारीख को महिलाओं के खातें जाती रहेगी। याने की चुनाव तक महिलाओं को करीब-करीब छह से सात किस्तों का भुगतान हो चुकेगा। इसी तरह अब मुख्यमंत्री सीखो, कमाओ योजना के जरिए सरकार का फोकस युवा मतदाता हैं। इस योजना की शुरूआत 4 जुलाई से हो रही है। इसके अलावा अन्य वर्गों को आकर्षित करने के लिए भी कई घोषणाएं की गई है। इसके अलावा शिवराज सरकार किसानों और आदिवासी वर्ग को अलावा पिछड़े वर्ग के लिए भी कई घोषणाएं कर चुकी है, जिनके अमल होने पर करोड़ों रूपए खर्च होना तय है। दूसरी और कांग्रेस भी घोषणा करने में पीछे नहीं है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ यह जानते हैं कि अगर सरकार में आए तो ये घोषणाएं उनके लिए मुसीबत बनेंगी, मगर वे भी इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से पीछे नहीं रहना चाहते हैं। आखिर चुनाव जो जीतना है। 

लगातार बढ़ रहा है प्रदेश पर कर्ज 

30 मई 2023 की स्थिति में राज्य सरकार पर तीन लाख 31 हजार करोड़ रुपये का कर्ज था, जो वर्ष 2023-24 के बजट तीन लाख 14 हजार करोड़ रुपए से अधिक है। इस साल जनवरी माह स ेअब तक सरकार ने  जनवरी 2023 में 2 हजार करोड़, फरवरी 2023 में 12 हजार करोड़ (अलग अलग तारीख पर 4 बार),  मार्च 2023- में 9 हजार करोड़ (अलग अलग तारीख पर 3 बार) और मई 2023 में 2000 करोड़ रूपए का कर्ज लिया है। इस तरह इन पांच महीनों में सरकार ने 25 हजार करोड़ रूपए का कर्ज लिया है। बता दें कि 30 मई 2023 की स्थिति में राज्य सरकार पर तीन लाख 31 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है, जो वर्ष 2023-24 के बजट तीन लाख 14 हजार करोड़ रूपए से अधिक है।

2018 में भी बनी थी ऐसी स्थिति


2018 के विधानसभा चुनाव में भी इसी तरह की स्थिति निर्मित हुई थी। तब भी शिवराज सरकार ने जमकर कर्ज लिया था। चुनाव जीतकर जब कमलनाथ ने सरकार बनाई थी तो यह कहना शुरू कर दिया था कि पहले की सरकार ने खजाना खाली कर दिया है। प्रदेश कर्ज में डूबा है। इसके चलते वे उस वक्त जतना से किए वादे के अनुरूप खरे नहीं उतरे थे। हालांकि 18 माह तक ही कमलनाथ सरकार चला पाए थे, मगर इस दौरान किसान कर्ज माफी का बड़ा मुद्दा जिसे लेकर कांग्रेस सरकार में आई थी, उसे वे पूरा नहीं कर पाए थे। कुछ किसानों को जरूर इसका लाभ मिला, मगर घोषणा के अनुसार वे सभी किसानों का कर्ज माफ नहीं कर पाए और सरकार उनके हाथों से चली गई। इस अनुभव के बाद भी कमलनाथ हैं कि वे भी सरकार बनने पर महिलाओं, युवाओं से वादे करने में पीछे नहीं है। उन्हें यह मालूम है कि सरकार बनी तो क्या स्थिति होगी, मगर क्या करें, वे शिवराज सिंह चौहान से पीछे भी तो नहीं रह सकते हैं। आखिर चुनाव जो जीतना है। 

आखिर होगा क्या ?

यहां प्रश्न यह उठता है कि प्रदेश में चुनाव के बाद जब नई सरकार का गठन होगा तो आने वाली सरकार आखिर करेगी क्या? प्रदेश के विकास पर फोकस करेगी, योजनाओं को अमलीजामा पहनाएगी या फिर प्रदेश से कर्ज उतारने के लिए काम करेगी। यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है, मगर प्रदेश पर बढ़ता कर्ज और प्रति व्यक्ति बढ़ता कर्ज एक बार फिर आम नागरिक के लिए मुसीबत जरूर खड़ी करेगा। वह मुसीबत किस रूप में सामने आएगी यह कहना मुश्किल है, मगर तय है कि पिसना मतदाता को ही है। हो सब कुछ सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए रहा है।  वहीं ऐसी योजनाएं लाने वाले कहते हैं कि इसका मकसद गरीब जनता को महंगाई से राहत दिलाना है। सुप्रीम कोर्ट भी इसे गंभीर मुद्दा बता चुका है, मगर गंभीर नहीं है तो राजनीतिक दल।  


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें