भोपाल। विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस नेताओं की मैदानी सक्रियता और एकजुटता ने भाजपा के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है। भाजपा पहले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को लेकर हमले करती थी, वह अब प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ को निशाने पर ले रही है। भाजपा ने बड़े से छोटे नेताओं को देखें तो सभी दिग्विजय सिंह से ज्यादा कमलनाथ पर हमले बोल रहे हैं। इसके पीछे मूल कारण है कि कमलनाथ ने जिस तरह से अपनी पार्टी के नेताओं को साधकर मैदान में सक्रिय किया है, वह भाजपा के लिए चुनौती खड़ी कर सकते हैं। कुछ माह पूर्व अलग-अलग दिखाई देने वाले नेता अरूण यादव, अजय सिंह, सुरेश पचौरी जैसे नेता अब मैदान में नजर आ रहे हैं।
मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर कुछ माह ही बचे हैं। इसके पहले कांग्रेस नेताओं में सक्रियता और मैदानी कसावट भी नजर आ रही है। कमलनाथ लगातार बूथ स्तर पर फोकस करते हुए कार्यक्रम कर रहे हैं, तो दिग्विजय सिंह लंबे समय से हारती आ रही सीटों पर पहुंचकर वहां पर इस बार परिणाम बदलने का प्रयास कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह सभाओं से दूरी बनाए रखना चाहते हैं। इसके चलते वे बैठकों को ज्यादा जोर दे रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कमलनाथ बैठकों के साथ सभाएं भी कर रहे हैं। हाल ही में कमलनाथ ने अपने निवास पर प्रदेश से आने वाले कार्यकर्ताओं से मेल जोल भी बढ़ा दिया है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस के सभी क्षत्रपों को एकजुट करते हुए मैदानी जिम्मेदारी भी सौंप दी है। पहले जहां बयानबाजी में नेताओं के बीच गुटबाजी झलकती थी वह अब नजर नहीं आ रही है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरूण यादव, पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, नेता प्रतिपक्ष डा गोविंद सिंह और कमलनाथ के निकट के पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के बयानों में अब विरोध कम और एकजुटता ज्यादा नजर आ रही है। यही एकजुटता भाजपा के लिए चुनौती बन गई है।
दिल्ली के नेताओं की बढ़ने लगी सक्रियता
कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी जे पी अग्रवाल तो प्रदेश में सक्रिय थे ही अब राहुल गांधी के खास माने जाने वाले कांग्रेस महासचिव के सी वेणुगोपाल ने भी प्रदेश में सक्रियता बढ़ाई है। वे प्रदेश दौरे पर आए और कमलनाथ के निवास पर बैठक की। इस बैठक में चुनाव को लेकर रणनीति तय की है। कुछ फैसले भी लिए गए हैं, जिन पर जल्द ही मोहर भी लगेगी। बताया जा रहा है कि बैठक में सभी अंचलों में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की सभाएं कराने पर जोर दिया गया है। प्रियंका गांधी महाकौलश के जबलपुर में सभा कर चुकी है। वे 22 जुलाई को ग्वालियर में ग्वालियर-चंबल अंचल पर फोकस कर सभा करेंगी। इसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका की मालवा-निमाड़ में लगातार सभाएं होंगी। ये सभाएं अलग-अलग होंगी। राहुल और प्रियंका एक साथ एक मंच पर नजर नहीं आएंगे।
मालवा-निमाड में रणनीति के तहत कांग्रेस ऐसा कर रही है। पूर्व में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में भी इसी अंचल से गुजरी थी। इस यात्रा का रूट पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा विधानसभा सीटों पर फोकस करते हुए तैयार किया गया था। इस अंचल में भी दिग्विजय सिंह की सक्रियता नजर आएगी, मगर बैठकों में। वे सभाओं से यहां भी दूरी बनाते नजर आएंगे। सिंह को यह मालूम है कि उनके भाशणों से भाजपा को मुद्दा मिल जाता है, इसके चलते वे पार्टी को नुकसान नहीं होना देना चाहते हैं। यही वजह है कि वे लंबे समय से बड़ी सभाओं से दूरी बनाते रहे हैं। दूसरी ओर कमलनाथ भी मालवा-निमाड़ में सक्रियता दिखाएंगे, वे बूथ को मजबूत करने का काम करते हुए सभाएं करेंगे। इस अंचल में पिछडे़ वर्ग के नेता अरूण यादव को भी कांग्रेस सक्रिय किए हुए हैं।
महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार पर फोकस
कांग्रेस नेताओं की बैठक में यह भी साफ हो गया कि प्रदेश में महंगाई, भ्रश्टाचार और बेरोजगारी के अलावा स्थानीय मुद्दों को लेकर ही चुनाव मैदान में उतरना है। वैसे जबलपुर में हुई सभा में प्रियंका गांधी ने भी घोटालों को लेकर जिस तरह से सरकार पर हमला बोला था उससे यह साफ हो गया था कि कांग्रेस इस बार भाजपा को उसी के मुद्दे याने घोटालों के मुद्दे पर घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस नेताओं ने बैठक के बाद साफ संकेत भी दिए हैं कि चुनाव में महंगाई, बेरोजगारी और भ्रश्टाचार ही कांग्रेस का मुख्य मुद्दा होगा।
मालवा-निमाड़ में भाजपा, संघ के भरोसे
मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ में हमेशा से ही संघ भाजपा की स्थिति को मजबूत करता रहा है। इसे संघ का गढ़ भी माना जाता है। हर चुनाव में यहां भाजपा की कमान एक तरह से संघ के हाथों की रहती है। इस बार भी संघ की सक्रियता इस अंचल में काफी पहले
से बढ़ी हुई है। पिछले चुनाव में भाजपा की कम हुई सीटों ने यहां संघ और भाजपा की चिंता को बढ़ाया है। यही वजह है कि भाजपा संगठन से ज्यादा यहां पर संघ की सक्रियता नजर आ रही है। वैसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी डी शर्मा आदिवासी अंचलों में लगातार पहुंचकर मतदाता को आकर्शित करते हुए सभाएं कर रहे हैं।
नेताओं की नाराजगी भाजपा की बढ़ाएगी परेशानी
कार्यकर्ता और नेताओं की नाराजगी को लेकर प्रदेश में कांग्रेस की मुसीबत बना करती थी। कांग्रेस के लिए अपने ही नेता और कार्यकर्ता संकट खड़ा करते थे। मगर इस बार हालात कुछ बदलते नजर आ रहे हैं। भाजपा को इस संकट का सामना ज्यादा करना पड़ सकता है। चुनाव के पहले ही कई नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी ने उसकी चिंता को बढ़ा दिया है। कुछ को मनाने में भाजपा संगठन सफल रहा है, तो कई नेता और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता अब भी रूठे हैं। यह संकट भाजपा के लिए सबसे बड़ा है। इसे वह किस तरह निपटती है, यह समय बताएगी। अगर नेताओं की नाराजगी को समय रहते दूर कर लिया तो भाजपा के लिए यह फायदेमंद होगा।




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