गैस त्रासदी के तीन दशक बीत गए, मगर पीड़ितों के जख्म आज भी हरे हैं. बीमारियों के आगोश में आकर बच्चे और बूढ़े लोगों के साथ-साथ युवा वर्ग भी परेशान हो रहा हैं. गैस पीड़ित लंबे समय से सहायता को लेकर जूझ रहे हैं, मगर सरकारों ने उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ नहीं दिया. 33 साल पहले 2-3 दिसंबर 1984 की रात को यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से मिथाइल आइसो साइनाइड गैस का रिसाव शुरू हुआ और इसके बाद भोपाल की हवा में घुले जहर ने हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया था. इस हादसे में जो बचे वो त्रासदी से आज तक जूझ रहे हैं. गैस त्रासदी कितनी भयावह थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गैस प्रभावित कई लोगों के यहां जन्म लेने वाले बच्चे नि:शक्तता का दंश झेल रहे हैं. वर्षों बाद भी गैस पीड़ित उचित न्याय और सहायता की आस लगाए बैठे हैं. गैस केदुष्प्रभाव से कई लोग टीबी, कैंसर, लकवा, प्रजजन संबंधी परेशानियों, बच्चों की शारीरिक और मानसिक परेशानियां बढ़ गई. इतने वर्षों बाद, जब पीड़ितों के परिवारों की तीसरी और चौथी पीढ़ियां तक जन्म लेकर जीवन व्यतीत कर रही हैं. पानी को प्रभावित कर रहा रसायन
फैक्ट्री परिसर के समीप के रहवासी क्षेत्रों में सप्लाई होने वाला पानी आज भी, इस रिसाव के प्रभाव से दूषित हो गया है. जब इस तरह के जल की जांच की गई तो कई हानिकारक तत्व पानी में घुले हुए पाए गए, जिनमें बेंजीन ,आॅक्सीबिस, डाइक्लोरोबेंजीन ,ट्राइक्लोरोबेंजीन, फ्लथैलेट्स, पॉलीन्यूक्लियर एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन, नेफ्थालेनॉल व ट्राइमिथाइल ट्राइएंजिन्ट्रॉएन पाया गया है. जानकारों का मानना है कि, ये रसायन बेहद हानिकारक हैं, जो कि लीवर व किडनी को प्रभावित करते हैं.
जहरीले कचरे के निष्पादन का नहीं हो रहा फैसला
दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक हादसों में शुमार भोपाल गैस कांड के 33 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड कारखाने में 346 टन जहरीला कचरा मौजूद है. इस जहरीले केमिकल को नष्ट करने का निर्णय ही नहीं हो पा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इंदौर के पास पीथमपुर में 10 टन कचरे का निष्पादन प्रयोग के बतौर किया गया, लेकिन इस कवायद का पर्यावरण पर कितना दुष्प्रभाव हुआ, इसकी रिपोर्ट का खुलासा होना बाकी है. बचे हुए जहरीले कचरे को कैसे ठिकाने लगाया जाए, इसे लेकर सरकार आज भी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंच पाई है.
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