रविवार, 7 जनवरी 2018

सनातन संस्कृति को बनाए रखना जरुरी

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर कार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने कहा कि हमारी सनातन संस्कृति की हो रही विस्मृति को बनाए रखने के प्रयास हमें करने होंगे. प्रयास ऐसे किए जाएं कि हमारी संस्कृति अनंतकाल तक बनी रहे. भैयाजी जोशी ने यह बात आज उज्जैन में चल रहे तीन दिवसीय शैव महोत्सव में कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रुप में कही. उन्होंने कहा कि हम सभी बड़े भाग्यशाली हैं कि पवित्र भारतभूमि में हम सबका जन्म हुआ. यह भूमि देवताओं, पुण्य और मोक्ष की भूमि है. यहां हर कंकड़ में भी शंकर विद्यमान हैं. नमस्कार करने की परंपरा भारत के अलावा और किसी अन्य देश में नहीं है, क्योंकि हमारे यहां प्रत्येक जीव में परमात्मा का निवास माना जाता है, इसलिए हम सभी को आदरपूर्वक नमस्कार करते हैं. यही बात भारतियों को औरों से अलग करती है. यह संस्कृति हमें विरासत में प्राप्त हुई है. सम्पूर्ण मानव जाति को हम अपना मानते हैं.   उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय से हमारी सनातन संस्कृति की विस्मृति हो रही है, अत: इसे बचाने की और अनंतकाल तक बनाये रखने का प्रयास हम सभी को करना है.
माखनसिंह चौहान ने  कहा कि वर्तमान में हमें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, परन्तु भारतवासी पूर्ण शांति और संयम के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं. ये भावना हमारी सनातन संस्कृति और ऋषियों के द्वारा प्रदाय की गई पूंजी है. तत्वज्ञान को चरितार्थ करने की आज के समय में आवश्यकता है. इसके लिए प्रत्येक घर और प्रत्येक जन को सक्षम बनकर एक देशव्यापी आंदोलन को चलाना होगा, तभी हम पूर्ण विश्व को शान्ति और मानव मूल्यों का पाठ पढ़ा सकेंगे. इस तरह के आयोजन लगातार करने होंगे, तभी जन-जन के हृदय में सनातन संस्कृति और परमेश्वर के प्रति आस्था की पुनजार्गृति संभव हो सकेगी.
खतरा आने पर संतों ने भी उठाया है शस्त्र
विशिष्ट अतिथि और केन्द्रीय मंत्री उमा भारती ने कहा कि हमारा देश इसी संस्कृति के कारण चल रहा है. भारत एकमात्र देश है, जिसने प्राचीन समय से लेकर अभी तक अपनी संस्कृति को संभालकर रखा है. भारतीयों के मन पर केवल और एकमात्र यहां की संस्कृति ही राज करती है. संस्कृति पर किसी तरह का खतरा आने पर पूजा-पाठ करने वाले पुरोहितों को भी शस्त्र उठाते हुए लोगों ने देखा है. अब भारतीय संस्कृति के पुनरूत्थान का समय आ गया है. इस देश में बसने वाले लोग संत, सती और शूरवीर हैं और इसी वजह से आत्मबल में पूरी दुनिया को भारत से ही शिक्षा लेनी होगी. शैव महोत्सव का आयोजन इसी पुनरूत्थान की ओर बढ़ने का सार्थक प्रयास है.

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