पशुपालन आज के बदलते हुए पर्यावरण को देखते हुए खेती-किसानी के लिए स्थायी आय का स्त्रोत है. मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले की सीतामउ तहसील के ग्राम राजनगर में रहने वाले कमलेश पिता प्रभुलाल राठोर ने पशुपालन के व्यवसाय को अपनाया और साथ ही साथ इसे लाभ का धंधा भी बनाया है. राठौड ने पशुपालन का कार्य सर्वप्रथम वर्ष 2003 में 1 गाय व 1 देशी भैंस के साथ प्रारम्भ किया. धीरे-धीरे इनके द्वारा अन्य नस्ल की गायों का पशुपालन किया जाने लगा जिससे दूध में वृद्धि होने लगी, किन्तु दूध को इन्हें दुसरे ग्राम की डेयरी में देने के लिये जाना पडता था. इस समस्या से निजाद पाने के लिए राठौर ने वर्ष 2015-16 में पशुपालन विभाग मंदसौर व पशु चिकित्सालय सीतामउ से सम्पर्क कर ग्राम में महिला दुग्ध समिति स्थापित की. अब इनका व दुसरे ग्राम वासियों का दूध इनकी अपनी दुग्ध सहकारी समिति में दिया जाता है व उसका उचित मूल्य भी प्राप्त होता है. राठौर ने पशुपालन विभाग द्वारा आयोजित गोकुल महोत्सव के माध्यम से पशुपालन के लिए चलाई जा रही आचार्य विद्यासागर गो-संवर्धन योजना के बारे में जानकारी ली गई. इसके बाद इनके द्वारा आचार्य विद्यासागर गोसंवर्धन योजना के अन्तर्गत वर्ष 2017-18 में पांच भैंसों के लिए लोन लिया गया व लोन द्वारा राजस्थान से उन्नत नस्ल कि ग्रेडेड मुर्रा भैंस का क्रय किया गया. कुछ समय बाद श्री राठौर द्वारा नस्ल सुधार के लिये पशुपालन विभाग से सम्पर्क कर एक मुर्रा नस्ल का पाडा भी लिया गया. राठौड द्वारा बताया गया कि उन्हें पशुओं से बहुत लाभ मिल रहा हैं जिसमें दुग्ध उत्पादन व गौबर उत्पादन प्रमुख है, इनके द्वारा गोबर का देशी खाद के रुप में उपयोग किया जाता है और एक पशु से एक साल में 1500 किलो ग्राम के करीब खाद प्राप्त हो जाता है. योजना का लाभ लेने के पूर्व इनको लगभग 4000 रुपए प्रति माह पशुपालन से आय प्राप्त होती थी लेकिन योजना के बाद इनको दुध से 60000 रुपए प्रतिमाह का लाभ पशुपालन से हो रहा है. दूसरे किसानों को पशुपालन का स्थिर व स्थायी व्यवसाय के रुप में अपनाने का सुझाव व संदेश दिया है. अपनी इस उपलब्धि के लिए वे आचार्य विद्यासागर गोसंवर्धन डेयरी विकास योजना दिल से आभारी है एवं सरकार की इस योजना का तहेदिल से शुक्रिया अदा करते है.

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