शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

प्रधानमंत्री-आशा है किसानों को निराश करने की योजना

समाजवादी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता ने  प्रधानमंत्री द्वारा की गई आशा संबंधी घोषणा को किसानों के कृषि उत्पादों का दाना-दाना समर्थन मूल्य पर खरीदने के पुराने चुनावी वायदे को ध्वस्त करने वाली योजना बताया है.
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने फसल खरीदने के लिए जो राशि उपलब्ध कराई है उससे 25 अनाज भी नहीं खरीदा जा सकेगा. सरकार के द्वारा आवंटित राशि ऊंट के मुह में जीरा साबित होगी. यह सर्वविदित है कि समर्थन मूल्य पर खरीद की योजना इस बात पर निर्भर है कि सरकार कितनी खरीदी करेगी, केंद्र सरकार किसान की फसल का केवल एक चौथाई खरीद कर हाथ झाड़ लेगी,बाकी जिम्मेवारी राज्य सरकारों पर छोड़ दी गई है. 
सपा प्रवक्ता ने कहा कि मध्यप्रदेश में भावांतर योजना फ्लाप रही है. भावन्तर योजना किसानों की आंख में धूल झोंकने की योजना है ,मध्यप्रदेश में किसानों को न तो मंडी रेट और समर्थन मूल्य का अंतर दिया गया, न ही किसानों से पूरे माल की खरीदी ही की गई, पिछली बार केवल 4 फसलों की खरीद की गई वह भी आधी आधूरी वास्तविक अंतर जो भी रहा किसानों को प्रति क्विंटल 150 - 200 प्रति क्विंटल से अधिक नहीं दिया गया. मिशाल के तौर पर मक्का गत वर्ष 600 से 800 रुपए क्विंटल बिका जबकि समर्थन मूल्य 1425 था. सरकार ने औसत प्रति हेक्टर 60 क्विंटल उत्पादन की जगह किसानों से 19 क्विंटल 54 किलो के औसत पर खरीद की यानी प्रति हेक्टर किसानों को 40 क्विंटल बाजार में बेचनी पड़ी जिसका कोई भावन्तर नहीं मिला, जो मिला वह भी 200 रुपए की दर पर मिला जबकि प्रति क्विंटल 625 से 825 रुपए  क्विंटल तक मिलना था. 
डा सुनीलम ने कहा कि मध्यप्रदेश में फ्लाप योजना को देश पर थोपना कोई उचित नहीं ठहरा सकता. भावांतर योजना का सर्वाधिक लाभ व्यापारियों को हुआ था अब देश के स्तर पर यह लाभ व्यापारियों को दिया जाने का सडयंत्र रचा गया है.  यदि वास्तव में सरकार किसानों को लाभ देना चाहती तो वह पंजीयन का नाटक करने की बजाए किसानों के रकबे के हिसाब से सभी कृषि उत्पादो को समर्थन मूल्य पर खरीदने की योजना सरकार को बनानी चाहिए थी. 
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की योजना में ठेके और बटाई पर खेती करने वाले किसानों के लिए अपनी फसल समर्थन मुख्य पर बेचने का कोई प्रावधान नहीं किया गया है.   उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने जिस तरह पहले प्रधानमंत्री फसल बीमा के नाम पर बाद में डेढ़ गुना समर्थन मूल्य पर खरीद की घोषणा कर किसानों की आंखों में धूल झोंकी वही काम आशा के नाम पर फिर एक बार किसानों के साथ किया गया है. 

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